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पिंजरा खुलने की आहट: पोल्ट्री उद्योग में घबराहट

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली September 08, 2017

आप बाजार में अंडे खरीदने जाएं और दुकानदार आपसे पूछे कि 'पिंजरे के भीतर वाली मुर्गी के अंडे चाहिए या बाहर वाली के' तो आपको हैरत हो सकती है। और अगर दुकानदार आपसे कहे कि पिंजरे से बाहर घूमने वाली मुर्गी के अंडे खाने के लिए आपको जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी तो आपकी हैरत और भी बढ़ सकती है या हो सकता है कि इसे मजाक मानकर आप हंसना शुरू कर दें। लेकिन अगर विधि आयोग की सिफारिशें लागू कर दी गईं तो यह मजाक हकीकत बन सकता है।
 
अवैध बूचडख़ानों के बाद अब 1 लाख करोड़ रुपये के मुर्गीपालन (पोल्ट्री) उद्योग पर सरकार का डंडा चल सकता है। विधि आयोग ने पिंजरे (बैटरी केज) में बंद मुर्गियों और खुली मुर्गियों के अंडों के बीच अंतर की सिफारिश की है, जिसका पोल्ट्री उद्योग जमकर विरोध कर रहा है। आयोग ने प्राणियों (अंडे देने वाली मुर्गी) पर अत्याचार रोकने के लिए नियमों का एक मसौदा तैयार किया है। इसके मुताबिक जानवरों पर अत्याचार कम करने के लिए पिंजरे में बंद मुर्गियों और खुले में रहने वाली मुर्गियों के उत्पादों के बीच अंतर करना जरूरी है। आयोग ने यह सुझाव भी दिया है कि मुर्गियों को पिंजरे से बाहर ही रखकर अंडे हासिल करने की व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए और इसके लिए राज्य पशुपालन विभाग उन्हें मान्यता दे।
 
आयोग का कहना है कि इससे उपभोक्ताओं को पशुपालन की स्वस्थ और अत्याचार रहित प्रणाली में तैयार उत्पाद चुनने का मौका मिलेगा और मुर्गियों को पिंजरे में रखने का चलन भी कम हो जाएगा। आयोग की सिफारिशें अंडा देने वाली मुर्गियों और मांस के लिए इस्तेमाल होने वाली मुर्गियों (ब्रॉयलर) के लिए है। आयोग ने मुर्गीपालन केंद्रों में मुर्गियों को रखने के बारे में भी नियम बनाए हैं।
 
विधि आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करने के लिए सरकार मजबूर तो नहीं होती है, लेकिन सिफारिशें पढऩे भर से पोल्ट्री उद्योग में हड़कंप मच गया है। उसे परेशानी इस बात से है कि आयोग ने नियमों का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ पशु अत्याचार निरोधक कानून के तहत कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की है। इसके अलावा मुर्गीपालन केंद्रों की नियमित निगरानी और जांच की बात है तथा कानून का उल्लंघन करने पर मुर्गियों को जब्त किए जाने का भी प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार ने देश में पशु बाजारों को नियंत्रित करने के लिए कुछ महीने पहले नए नियम अधिसूचित किए थे। इनके तहत पशुओं के साथ-साथ मुर्गियों की गर्दन, पंजा तथा पंख बांधने तथा उन्हें बिक्री के लिए उल्टा पकड़कर ले जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। अलबत्ता इन नियमों का क्रियान्वयन रोक दिया गया है।
 
बैटरी केज छोटे पिंजरे होते हैं जिनमें मुर्गियों को अंडे देने के लिए रखा जाता है। भारत में 90 फीसदी पिंजरे इसी प्रकार के हैं। इनमें बड़े और संगठित मुर्गीपालन केंद्र भी शामिल हैं। आयोग का कहना है कि ये पिंजरे इतने छोटे होते हैं कि इनमें मुर्गियां न तो सीधी खड़ी रह सकती हैं और न ही पूरी तरह अपने पंख फैला सकती हैं। आयोग के मुताबिक देश में आमतौर पर किसी मुर्गीपालन केंद्र में हजारों मुर्गियों को बहुत छोटी जगह में रख दिया जाता है। इससे मुर्गियों को बहुत परेशानी होती है। आयोग ने विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुरोध पर ये सिफारिशें दी हैं। आयोग का कहना है कि मुर्गीपालन केंद्र में मुर्गियों की संख्या उनके वजन के हिसाब से तय होनी चाहिए। अलबत्ता पोल्ट्री उद्योग ने आयोग की सिफारिशों को हास्यास्पद बताया है क्योंकि देश में लगभग बड़े मुर्गीपालन केंद्रों में दोनों प्रकार की मुर्गियों को बैटरी केज में रखा जाता है। 
 
बैटरी केज का इस्तेमाल रोकने से न केवल उत्पादन घटेगा, बल्कि बीमारी का भी खतरा बढ़ेगा। खुले में घूमती मुर्गियां जमीन के पास रहेंगी और खाद तथा बीट के संपर्क में आने से उनके लिए खतरा पैदा होगा।पोल्ट्री इंडिया के अध्यक्ष और मुर्गीपालन में काम आने वाले उपकरण बनाने वाली प्रमुख कंपनी गारटेक इक्विपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक हरीश गरवारे ने कहा, 'मुर्गियों को जमीन से उठे हुए पिंजरे में रखने का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस तरह वे खाद से दूर स्वस्थ माहौल में रहती हैं। अन्यथा हम उन्हें किस तरह पालेंगे।' 
 
उन्होंने कहा कि अगर आयोग की सिफारिशें मानी गई तो इसके लिए अरबों डॉलर निवेश की जरूरत होगी और देश के पोल्ट्री क्षेत्र में उत्पादन के तरीके में बेवजह बदलाव होगा। पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया के कोषाध्यक्ष रिकी थापर ने कहा कि यूरोप के देशों में मुर्गियों को पिंजरे में नहीं रखा जाता है। लेकिन हमारे पोल्ट्री उद्योग के आकार को देखते हुए इस तरह की व्यवस्था यहां संभव नहीं है।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में अंडों का कुल उत्पादन 2015-16 में 27.33 अरब था जो 6.42 फीसदी बढ़त के साथ 29.09 अरब पहुंच गया। कुल अंडा उत्पादन में व्यावसायिक मुर्गीपालन केंद्रों की हिस्सेदारी करीब 75.75 फीसदी है। बाकी अंडे घरों में पलने वाली मुर्गियों से आते हैं।
Keyword: poultry, farm, chicken,,
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