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अनुभवहीन खट्टर का लचर शासन पड़ सकता है भाजपा पर भारी

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  September 01, 2017

हरियाणा के मुख्यमंत्री के तौर पर एक साल पूरा करने के बाद मनोहर लाल खट्टर ने कहा था, 'जब मैं मुख्यमंत्री बना था तो मेरे पास शासन का कोई भी अनुभव नहीं था। अब अगर कोई मुझसे पूछे तो मैं कहूंगा कि मेरे पास एक साल का अनुभव है। अब मैं किसी भी समस्या से संबंधित हरेक बात जानता हूं और उसे सुलझाने के तरीके भी मुझे पता हैं।' यह अक्टूबर 2015 का वाकया है। उनके उस बयान के करीब दो साल बाद की घटनाओं को देखकर आपके जेहन में यह विचार जरूर आएगा कि क्या वाकई में खट्टर को शासन चलाने से संबंधित हरेक बात पता है?
 
डेरा सच्चा सौदा संप्रदाय के प्रमुख गुरमीत राम रहीम के खिलाफ आए अदालती फैसले के बाद हरियाणा में हिंसा भड़की और करीब 40 लोगों की मौत हो गई। खट्टर के कार्यकाल में यह तीसरा ऐसा मौका है जब व्यापक पैमाने पर हिंसा की वारदात हुई हैं। हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार बनने के बाद उपद्रव का पहला मामला स्वयंभू धर्मगुरु रामपाल को लेकर सामने आया था। रामपाल के खिलाफ चल रहे दो मामलों में पेश होने के लिए अदालत उसे 43 बार समन भेज चुकी थी लेकिन वह कभी भी पेश नहीं हुआ था। ऐसे में पुलिस ने जब उसे उसके आश्रम से गिरफ्तार करने की कोशिश की तो उसके समर्थकों ने विरोध किया। हिसार स्थित सतलोक आश्रम में मौजूद हजारों अनुयायियों ने घेराबंदी कर दी थी। आखिरकार पुलिस ने आश्रम की बिजली एवं पानी आपूर्ति काट दी। दो सप्ताह तक चले टकराव के बाद जाकर रामपाल को नवंबर 2014 में गिरफ्तार किया जा सका था। 
 
उस समय आप यह कह सकते थे कि खट्टर की अनुभवहीनता के चलते ऐसा हुआ। लेकिन रामपाल प्रकरण के बाद जो कुछ हुआ उसने तो खट्टर सरकार, पुलिस-प्रशासन सबको शर्मसार कर दिया। वर्ष 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन में स्थिति काफी बिगड़ गई थी। हरियाणा का सर्वाधिक प्रभावशाली, संपन्न और असरदार जाट समुदाय नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आया था। जाटों को आरक्षण मिलने से ओबीसी कोटे में हिस्सा कम होने की आशंका के चलते सैनी समुदाय आमने-सामने हो गया था। कुरुक्षेत्र के भाजपा सांसद राजकुमार सैनी ने उस समय कई भड़काऊ भाषण दिए लेकिन सैनी पर लगाम तभी लगाई गई जब प्रदर्शन ने हिंसा का रूप ले लिया।
 
अगर राम रहीम विवाद से इसकी तुलना करें तो जाट आंदोलन भी उसी परिपाटी पर चला था। हरियाणा में जाट आंदोलन शुरू होने के करीब एक सप्ताह बाद हिंसात्मक हो गया था। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर जाट नेता बी एस हुड्डïा के गृह जिले रोहतक में इस आंदोलन की शुरुआत होना शायद ही अचरज पैदा करने वाला था। रोहतक से शुरू आंदोलन कुछ ही दिनों में सोनीपत, झज्जर और भिवानी तक फैल गया। जाटों ने भी हरियाणा और दिल्ली के रास्ते को अवरुद्ध करने के लिए पेड़ों को काटकर सड़कों पर गिरा दिया था। इससे ईंधन, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो गई और पूरा हरियाणा गृहयुद्ध की तरफ बढ़ता दिख रहा था।
 
खट्टर किसी समस्या के गंभीर रूप अख्तियार करने के बाद ही कदम उठाने में यकीन रखते हैं और जाट आंदोलन के समय भी वह हरकत में तभी आए थे जब जाट सभी रास्तों की घेराबंदी कर चुके थे और पुलिस को गोलियां चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। लेकिन जाटों ने प्रशासन की सख्ती का पुरजोर विरोध किया और अपने रास्ते में आने वाली चीज को आग के हवाले करते चले गए। हालत यह थी कि खट्टर मंत्रिमंडल भी जाट और गैर-जाट में बंंटा नजर आ रहा था। विरोधाभास के चलते मंत्रिमंडल यह तय ही नहीं कर पा रहा था कि हालात पर किस तरह से काबू पाया जाए। आखिरकार खट्टर को ही हथियार डालने पड़े तब जाकर हिंसा का वह दौर थम पाया था।
 
सवाल यह है कि खट्टर कहां पर चूक कर गए? जिम्मेदार पदों पर सक्षम अधिकारियों की नियुक्ति और उनके शासन की प्राथमिकता दोनों ही असफल रही। हरियाणा के सफल मुख्यमंत्रियों में शुमार किए जाने वाले बंसी लाल और भजन लाल एक मामले में काफी हद तक एक जैसे थे। वे अपने अधिकारियों की गलती को कभी भी बख्शते नहीं थे। हालांकि दोनों ही नेता अपने अधिकारियों को सशक्त करते थे लेकिन किसी भी गलती को बर्दाश्त नहीं करते थे।
 
खट्टर के कार्यकाल में कई ऐसे पुलिस अधिकारी दिखे जो भीड़ के डर से भागते हुए नजर आए। खास बात यह है कि जाट हिंसा के समय तैनात रहे ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं हुई। वैसे डेरा सच्चा सौदा हिंसा के मामले में कुछ कार्रवाई की गई है लेकिन यह भी देखना होगा कि सरकार इस पर टिकी रहती है या नहीं। हरियाणा में स्थानांतरण एवं नियुक्ति हमेशा से एक उद्योग रहा है। इससे आजिज आकर खट्टर ने इसके खात्मे को अपनी प्राथमिकता बताई थी। उन्होंने एक स्थानांतरण नीति की घोषणा भी की लेकिन उसके दायरे में केवल शिक्षा और बिजली विभाग ही आते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले हरियाणा भाजपा के 12 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व से मिलकर खट्टर के कामकाज की शिकायत की थी। उनका कहना था कि खट्टर नौकरशाही और विधायकों पर काबू ही नहीं रख पा रहे हैं। उस समय पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने तो उन्हें समझा-बुझाकर वापस भेज दिया था। लेकिन राम रहीम मामले के बाद खट्टर के विरोधी एक बार फिर से उनकी नाकामी का शोर मचाना शुरू कर सकते हैं। वे कह सकते हैं कि खट्टर के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने पर पार्टी को अगले चुनाव में तगड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। खट्टर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से मिलने के बाद दिल्ली से लौट भी चुके हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें थोड़ा-बहुत आश्वासन मिला है। सवाल है कि क्या यह उनके बाकी कार्यकाल का आखिरी मौका साबित होगा?
Keyword: haryana, manohar lal khattar,,
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