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निजता का अधिकार बदल देगा सूरत !

सायन घोषाल /  August 27, 2017

उच्चतम न्यायालय के नौ-सदस्यीय पीठ ने हाल ही में सुनाए गए एक फैसले में निजता के अधिकार को संविधान के तीसरे खंड के तहत एक नैसर्गिक, अंतर्निहित और अहस्तांतरणीय मौलिक अधिकार बताया है। माना जा रहा है कि इस फैसले के बाद निजता से संबंधित कई लंबित मुद्दों पर न्यायपालिका का नया दृष्टिकोण देखा जा सकता है। इसके अलावा पहले तय किए जा चुके मामलों की समीक्षा का भी नया दौर शुरू हो सकता है। 

 
विशेषज्ञों का मानना है कि निजता पर आया यह फैसला भारत के लोकतांत्रिक सफर का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ साबित होगा और संवैधानिक विधिशास्त्र के नए युग का सूत्रपात करेगा। इस फैसले से भारत में मानवाधिकार संबंधी सार्वभौम उद्घोषणा,1948 और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र, 1966 को सही अर्थों में क्रियान्वित किए जाने की भी उम्मीद बढ़ी है। यह निर्णय निजता को मानवीय स्वतंत्रता एवं गरिमा का संवैधानिक मर्म का हिस्सा मानने के साथ ही निजता के बारे में व्यापक सिद्धांतों का आधार भी तैयार करता है। हालांकि इस फैसले में निजता को सुनिश्चित करने वाली विशिष्ट पात्रता या अभिरुचि का जिक्र नहीं किया गया है। वैसे न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि निजता के अधिकार पर फैसला हरेक मामले के अपने गुण-दोषों के आधार पर अलग-अलग किया जाएगा। वैसे सभी मौलिक अधिकारों की तरह निजता का अधिकार भी समुचित परिस्थितियों में सरकार द्वारा लगाए जा सकने वाले तर्कसंगत प्रतिबंधों के अधीन होगा। कानूनी सलाहकार फर्म खेतान ऐंड कंपनी के एसोसिएट पार्टनर सुप्रतिम चक्रवर्ती कहते हैं, 'निजता से संबंधित कानून एवं नियमों को तय करते समय निजता से संबंधित इस फैसले में निहित सिद्धांतों को लेकर सरकार द्वारा अपनाए जा रहे रवैये से यह तय होगा कि नए कानूनों का स्वरूप कैसा होगा?' चक्रवर्ती कहते हैं कि उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के आलोक में सरकार को नए कानून बनाते समय निजता के पहलू को ध्यान में जरूर रखना चाहिए। 
 
निजता के अधिकार पर आए इस फैसले से सूचना प्रौद्योगिकी (परिसीमित सुरक्षा व्यवहार) कानून, 2011 को लेकर कई सवाल  उपजे हैं। टेकलीगिस के पार्टनर सलमान वारिस का कहना है कि इस निर्णय का निजता से संबंधित हरेक मामले पर दूरगामी प्रभाव पडऩे की संभावना है। वारिस कहते हैं, 'इस ऐतिहासिक फैसले में अंतर्निहित सिद्धांतों के नजरिये से अब इस तरह के सभी मामलों को नए सिरे से परखा जाएगा।'
 
इस तरह का एक मामला सोशल मीडिया साइट फेसबुक और व्हाट्सऐप पर उपभोक्ता की निजी जानकारियों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। कर्मण्य सिंह सरीन बनाम भारत संघ वाद में उठाया गया मामला अब भी उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। यह मामला पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में आया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि व्हाट्सऐप उपभोक्ताओं से जुड़ी जानकारियां अपनी ही सहयोगी कंपनी फेसबुक के साथ साझा कर रही है। उच्च न्यायालय ने व्हाट्सऐप के उस दावे पर सवाल उठाया था जिसमें कहा गया था कि कोई भी उपभोक्ता उसकी सेवा लेते समय निजता संबंधी शर्तों को अपनी स्वीकृति प्रदान करता है। लेकिन न्यायालय ने डेटा की निजता को सुरक्षित रखने से संबंधित नीति के अभाव का जिक्र करते हुए सरकार से इस बारे में एक व्यापक नीति बनाने को कहा था। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने व्हाट्सऐप को यह निर्देश दिया था कि वह 25 सितंबर, 2016 से पहले के आंकड़े साझा न करे। गौरतलब है कि इसी तारीख को डेटा साझा करने संबंधी नीति लागू हुई थी। 
 
बहरहाल विशेषज्ञों को लगता है कि निजता के अधिकार पर आए उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से निजी डेटा की सुरक्षा संबंधी मामले को भी अलग नजरिये से देखा जाएगा। यही वजह है कि फेसबुक-व्हाट्सऐप मामले को अभी तक अलग रखा गया था। चक्रवर्ती कहते हैं, 'फेसबुक-व्हाट्सऐप मामले को अब निजता का अधिकार फैसले में वर्णित सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में तौला जाएगा। इस तरह के मामलों में अब जानकारी-आधारित सहमति और निजता की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नियामकीय प्रणाली जैसे मुद्दे प्रमुखता से उभरकर सामने आ सकते हैं।' निजता पर आए फैसले के बाद आधार अधिनियम, 2016 की वैधता को चुनौती देने वाले मामले में भी नया नजरिया दिखाई दे सकता है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष सेवानिवृत्त न्यायाधीश के एस पुत्तस्वामी ने इस कानून को चुनौती दी हुई है। नितिन देसाई एसोसिएट्स के एम एस अनंत कहते हैं कि इस मामले में अब यह साबित करना होगा कि आधार अधिनियम मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन कर रहा है और इसमें लगाई गई पाबंदियां अतार्किक हैं या अनुच्छेद 21 के तहत निर्धारित उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। अनंत ने कहा, 'सरकार को इस कानून के प्रति अपना स्पष्ट उद्देश्य प्रदर्शित करना होगा। साथ ही उसे अदालत को भी यह भरोसा दिलाना होगा कि कानून में लगाई गई पाबंदियां संवैधानिक हैं।' यह नजरिया काफी हद तक निजता का अधिकार फैसले में उल्लिखित टिप्पणियों से मेल खाता है। इस फैसले में कहा गया है कि सरकार को नागरिकों के बारे में आंकड़े जुटाने के अधिकार के साथ नागरिकों की निजता के अधिकार का संतुलन बनाने की जरूरत है। 
 
निजता के अधिकार संबंधी फैसले का असर सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन वाद और महाराष्ट्र राज्य बनाम शेख जाहिद मुख्तार वाद पर भी पडऩे की संभावना जताई जा रही है। नाज़ फाउंडेशन ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को गैरकानूनी ठहराए जाने को चुनौती दी हुई है। उसका कहना है कि किसी भी तरह का यौन आग्रह किसी व्यक्ति का निजी मामला है। दूसरा मामला महाराष्ट्र में गोमांस पर लगाई गई पाबंदी को निजी पसंद का उल्लंघन बताए जाने से संबंधित है। इन दोनों मामलों में कई अहम सामाजिक एवं निजता संबंधी आग्रह हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि निजता के मामले में आए फैसले के परिप्रेक्ष्य में इन मामलों पर भी नए नजरिये से विचार किया जा सकता है।
Keyword: supreme court, high court, privacy,,
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