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अनुच्छेद 370 तात्कालिक प्रावधान, स्थायी बनाए जाने की है जरूरत: अंसारी

साहिल मक्कड़ /  08 21, 2017

बीएस बातचीत

कश्मीर घाटी में हिंसा और अशांति के बीच सभी संबद्ध पक्षों से बात करने के लिए पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने 2010 में तीन सदस्यीय वार्ताकार समिति गठित की थी। उस वार्ताकार समिति के सदस्य रहे पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एमएम अंसारी ने साहिल मक्कड़ से बातचीत में कहा कि अनुच्छेद 370 एक 'तात्कालिक' प्रावधान है और जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा सुनिश्चित करने के लिए उसे 'स्थायी' बना देना चाहिए।

संविधान की धारा 35ए को खत्म करने के मामले में एक गैर-सरकारी संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई अब सर्वोच्च न्यायालय का एक बड़ा पीठ करेगा। ऐसे में अब आपकी राय क्या होगी?

बिजनेस स्टैंडर्ड अनुच्छेद 370 तात्कालिक प्रावधान, स्थायी बनाए जाने की है जरूरत: अंसारीसंविधान के अनुच्छेद 370 के अनुसार, केंद्र सरकार केवल तीन विषयों- रक्षा, विदेशी मामलों और संचार- पर कानून बना सकती है। इसके अलावा राष्टï्रपति के आदेश के जरिये जम्मू-कश्मीर पर बनाए गए तमाम कानूनों के जरिये केंद्र सरकार के अधिकार को विस्तारित किया गया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 35ए को समाप्त करने पर केंद्र सरकार के ये सभी अधिकार अवैध हो जाएंगे। ऐसे में एक जबरदस्त राजनीतिक संकट पैदा होगा क्योंकि संसद जम्मू-कश्मीर के लिए उपयुक्त कानून बनाने में सक्षम नहीं है। राष्टï्रपति के आदेश के जरिये इस राज्य को शासित करने का मार्ग बंद हो जाएगा जिससे राज्य के विघटन की शुरुआत होगी। केंद्र और राज्य के बीच विश्वास खोने के कारण नैशनल कॉन्फ्रेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसी मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियां केंद्र सरकार का सहयोग नहीं करेंगी।

कई लोगों का कहना है कि यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चाल है क्योंकि उसने अपने चुनाव घोषणा पत्र में भी अनुच्छेद 370 को खत्म करने का वादा किया था। ऐसे में क्या आपको लगता है कि अदालत में केंद्र सरकार का रुख जम्मू-कश्मीर सरकार के रुख से अलग होगा?

भाजपा का पीडीपी के साथ गठबंधन है और वह अनुच्छेद 370 की मौजूदा स्थिति में कोई छेड़छाड़ न करने के लिए पहले से ही प्रतिबद्ध है। राज्य विधानसभा के समर्थन के बिना अकेले संसद कुछ नहीं कर सकती। राज्य अपनी स्वायत्तता से समझौता नहीं करेगा। कानूनी तौर पर उन प्रावधानों को संविधान में शामिल करने में कोई समस्या नहीं है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय इसे खारिज नहीं कर सकता। ऐसे में हमें तब तक अनुच्छेद 370 के साथ रहना होगा जब तक केंद्र और राज्य लोकतांत्रित प्रक्रिया के जरिये इसका कोई सर्वमान्य समाधान न निकाल ले।

आप जम्मू-कश्मीर में विभिन्न संबद्ध पक्षों से बातचीत के लिए संप्रग सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय वार्ताकार समिति के सदस्य थे। समिति के प्रमुख सुझाव क्या थे और सरकार ने कितने सुझाव स्वीकार किए?

हमारी समिति एवं अन्य समितियों की सिफारिशों पर केंद्र सरकार द्वारा शायद ही अमल किया गया क्योंकि गुणवत्तायुक्त शिक्षा एवं रोजगार के मामले में कश्मीरी खुद को पूरी तरह से विमुख एवं वंचित मानते हैं। हमारी एक प्रमुख सिफारिश अनुच्छेद 370 को समाप्त करने से संबंधित थी और हमने केंद्र एवं राज्य के बीच विवादास्पद मुद्दों को निपटाने के लिए एक रास्ता सुझाया था। लेकिन सरकार ने उस पर गौर नहीं किया जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

संप्रग सरकार द्वारा आपकी रिपोर्ट को पूरी तरह लागू न करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? मैं नहीं बता सकता कि संप्रग सरकार ने हमारी रिपोर्ट को क्यों लागू नहीं किया। साल 2010 में जम्मू-कश्मीर का दौरा करने वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की सिफारिशों के आधार पर हमारी समिति गठित की गई थी। इन राजनीतिक दलों में संप्रग और राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के घटक दल थे। लेकिन किसी भी राजनीतिक पार्टी ने उस रिपोर्ट को लागू करने की मांग नहीं की जिसे हमने प्रतिनिधिमंडल में शामिल सभी राजनीतिक दलों से करीबी बातचीत के आधार पर तैयार किया था। इस प्रकार की निष्क्रियता से केंद्र और राज्य के बीच अविश्वास की झलक मिलती है।

आपकी समिति ने 1952 के बाद बनाए गए सभी कानूनों की समीक्षा के लिए एक संवैधानिक समिति गठित करने का भी सुझाव दिया था। क्या आपको लगता है कि कानूनों की समीक्षा करना सही रास्ता होगा?

बिल्कुल। आम लोगों एवं राजनीतिक दलों के नेताओं से बातचीत के दौरान इस सुझाव को व्यापक स्वीकृति मिली थी।

आपकी रिपोर्ट (2011) के बाद जम्मू-कश्मीर में परिस्थिति कैसे बदली? जम्मू-कश्मीर के बारे में राजग सरकार का नजरिया संप्रग सरकार से किस प्रकार अलग है?

समय के साथ-साथ परिस्थिति और खराब हो गई। भाजपा-पीडीपी के बीच गठबंधन के एजेंडे को उत्साह के साथ लागू नहीं किया गया है। कई स्वीकार्य योजनाओं को प्रभावी तरीके से कार्यान्वित नहीं किया जा रहा है और इसलिए कश्मीरी लोग राज्य के भीतर और बाहर दोनों मोर्चे पर प्रभावित हो रहे हैं। कश्मीरी छात्रों को विश्वविद्यालयों से बाहर किया जा रहा है क्योंकि मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय उनकी छात्रवृत्ति जारी नहीं की।

क्या आप मानते हैं कि वर्तमान सरकार के तहत जम्मू-कश्मीर में स्थिति कहीं अधिक खराब हुई है?

समाधान प्रक्रिया में सभी संबद्ध पक्षों को शामिल करने की पहल का अभाव दिख रहा है। कश्मीरियों का अलगाव बढ़ा है जबकि मानव अधिकारों के हनन और इससे संबंधित समस्याओं में इजाफा हुआ है। वहां के युवा देश के अन्य भागों में रहने वाले युवाओं की तरह सामाजिक जीवन का आनंद नहीं ले पा रहे हैं। इसलिए वे काफी कुंठित और निराश हैं।

जम्मू-कश्मीर में लोगों का विश्वास जीतने के लिए राजग सरकार को तत्काल क्या उपाय करने चाहिए? विभिन्न समितियों की सभी सिफारिशों को प्रभावी पूर्वक लागू किया जाना चाहिए। ऐसा सभी प्रमुख राजनीति दलों के प्रतिनिधित्व वाली एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति की देखरेख में अवश्य किया जाना चाहिए। सभी विवादास्पद मुद्दों को निपटाने के लिए सभी संबद्ध पक्षों से बातचीत की नई पहल की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री का हालिया बयान हमारे सामने है कि कश्मीरियों को गोली नहीं, गले लगाने की जरूरत है। आइये हम इस पर केवल भाषण नहीं, बल्कि अमल भी कर दिखाएं।

कश्मीर मुद्दे का स्थायी समाधान क्या हो सकता है?

अनुच्छेद 370 एक 'तात्कालिक' प्रावधान है जिसे 'स्थायी' बनाया जाना चाहिए ताकि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा सुनिश्चित हो सके। यह राज्य के लोगों के निवास की आकांक्षाओं के जरिये संभव हो सकता है। वास्तव में यह कठिन काम है लेकिन यह असंभव नहीं है क्योंकि जनतांत्रिक एवं संघीय व्यवस्था के तहत विविध सामाजिक-आर्थिक समूहों के बीच सुलह और सह-अस्तित्व की व्यवस्था संभव है। जैसे ही हम कश्मीरियों को गले लगाने की बात पर अमल करने के लिए आगे बढ़ेंगे, आतंक का माहौल कम होगा क्योंकि कश्मीर के लोग लंबे समय से शांति के लिए तड़प रहे हैं।   

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Comments
 
Anupam Upadhyay
05-Sep-17
 
किसी भी वर्ग, जाति, धर्म, और राज्य को किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार समानता के अधिकार का हनन है। संविधान की आत्मा का अपमान है और लोकतंत्र पर आघात है। देश की चतुर्दिक उन्नति के लिए त्रुष्टिकरण वाली विशेषाधिकारों की व्यवस्था समाप्त होनी चाहिए।
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