बिजनेस स्टैंडर्ड - वैश्विक नगरी को हिंदी अखरी...
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वैश्विक नगरी को हिंदी अखरी...

निकिता पुरी /  08 17, 2017

भाषा की कशमकश

आईटी के गढ़ के तौर पर दुनिया भर में अपनी खास पहचान बनाने वाले बेंगलूरु शहर की फितरत तालमेल बिठाने की रही है। लेकिन हाल में हिंदी-कन्नड़ को लेकर पैदा हुए भाषाई विवाद ने इस छवि को धूमिल किया है। पेश है निकिता पुरी की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट 

बिजनेस स्टैंडर्ड वैश्विक नगरी को हिंदी अखरी...बेंगलूरु काव्य समारोह के पिछले संस्करण में लेखिका प्रतिभा नंदकुमार के साथ संवाद का सत्र बेहद आकर्षण का केंद्र साबित हुआ था। कन्नड़ भाषा की कवयित्री और नाटककार प्रतिभा करीब चार दशकों से साहित्य सृजन में लगी हुई हैं। लेकिन जब उन्होंने काव्य समारोह के उस सत्र में शिरकत की तो लोगों की प्रतिक्रिया सुनकर उनको थोड़ा अटपटा लगा। वह कहती हैं, 'वहां मौजूद अधिकतर लोगों की बातें सुनकर ऐसा लगा कि वह मुझे अधिक उम्र में लिखना शुरू करने वाली एक उम्रदराज महिला के तौर पर देख रहे थे।' प्रतिभा के मुताबिक इस तरह के वाकयों से पता चलता है कि कई वर्षों से बेंगलूरु में रहने के बावजूद  'बाहरी' लोगों ने अभी तक स्थानीय संस्कृति से खुद को आत्मसात नहीं किया है। 

लिहाजा जब बेंगलूरु के नम्मा मेट्रो के साइनबोर्ड हिंदी में लिखे हुए नजर आए तो बहुत लोगों को यह एक राजनीतिक फैसला महसूस हुआ। बेंगलूरु की स्थानीय भाषा कन्नड़ की वकालत करने वाले समूहों ने मेट्रो के साइनबोर्ड हिंदी में लिखे जाने को अपनी भाषा पर प्रहार करार दिया। जुलाई के अंतिम दिनों में कर्नाटक रक्षण वेदिके संगठन के सदस्यों ने हिंदी में लिखे कई साइनबोर्ड पर कालिख पोतने का भी काम किया।

ऐसा विरोध देखकर बहुत सारे लोग अचरज में पड़ गए। उनका मानना है कि एक कॉस्मोपॉलिटन शहर के रूप में बेंगलूरु की खास पहचान स्थापित करने में हिंदी और अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं की भी एक खास भूमिका रही है। बेंगलूरु में फास्ट फूड बेचने वाली दुकानों को दर्शिनी कहा जाता है। इन दुकानों पर रवा और रागी डोसा के साथ रोटी और पनीर बटर मसाला भी बिकता है। इसी तरह बेकरी की दुकानों पर सामान्य बेकरी उत्पादों के साथ कचौड़ी भी मिलती है। शहर के इंदिरानगर जैसे महंगे इलाकों में स्थित पबों में बॉलीवुड के गाने भी बखूबी बजते हैं। अब भी इन पबों में काला चश्मा गीत के साथ हम्मा हम्मा का रीमिक्स संस्करण लोगों को नाचने के लिए मजबूर कर देता है।

इंदिरानगर में स्थित ग्लोकल पब के मैनेजर अमित सिंह रावत एक साल पहले ही बेंगलूरु शहर पहुंचे थे। हालांकि जब वह काम के सिलसिले में यहां रहने के लिए आए तो उनके मन में कई आशंकाएं भी थीं। मूलत: उत्तराखंड के रहने वाले रावत कहते हैं, 'मैं यह मानकर चल रहा था कि यहां पर कोई भी हिंदी नहीं बोलता होगा लेकिन यहां आने के बाद मुझे शायद ही कभी कोई दिक्कत हुई हो।'

हालांकि जब उनके पब में आया कोई मेहमान अधिक शराब पी लेता है या कोई ऑटोरिक्शा वाला अधिक पैसे मांगता है तब उन्हें थोड़ी दिक्कत जरूर महसूस होती है। (हालांकि कन्नड़ भाषी लोगों को भी ऑटो वालों के साथ ऐसी ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।) कर्नाटक के शहरों और कस्बों में कन्नड़ समुदाय की शादियों में अब दूल्हे और उसके घरवालों को शेरवानी में देखा जाना अब असामान्य नहीं रह गया है। शादी की दावतों में मेहमानों को कन्नड़ संस्कृति के लोकप्रिय पकवानों के साथ चाट, पनीर और नान जैसे उत्तर भारतीय व्यंजन भी परोसे जाते हैं। पिछले 10-15 वर्षों से टेलीविजन चैलनों पर एकता कपूर के सीरियल कन्नड़ में डब होकर प्रसारित होते रहे हैं जिससे उत्तर भारतीय संस्कृति के पारिवारिक मूल्यों से भी स्थानीय लोग काफी हद परिचित हो चुके हैं। सेंट मार्क रोड पर स्थित नॉर्दर्न रूट रेस्टोरेंट में राजमा-चावल और पंजाबी शैली में बने पराठे खाने के लिए इंजीनियरों की अच्छी खासी भीड़ जुटती है जिनमें से बहुत सारे दक्षिण भारतीय भी हैं।

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर चंदन गौड़ा कहते हैं, 'यह देखना काफी रोचक अहसास है कि बाहरी संस्कृति की कितनी सारी बातों को अब अपना लिया गया है। लोग इसे अपनी संस्कृति में दखल नहीं मानते हैं और आसानी से स्वीकार करने लगे हैं।' हालांकि जब किसी शहर के कॉस्मोपॉलिटन चरित्र की बात उठती है तो आम तौर पर यही देखा जाता है कि वहां के स्थानीय निवासी कितनी उदारता से बाहरी लोगों के अंगीकार करते हैं।

गौड़ा कहते हैं, 'लेकिन बेंगलूरु के मामले में उलटा लग रहा है। यहां के निवासी बाहरी लोगों के चलते खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। ऐसे में हमें कॉस्मोपॉलिटन शहर की अवधारणा को लेकर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। इसी के साथ हम जिस शहर में रह रहे हैं उसके साथ जुड़ाव के सवाल पर भी गौर करना होगा।' दशकों पहले राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से आए लोगों ने बेंगलूरु में अपना कामकाज शुरू किया था। कारोबार को बेहतर तरीके से संचालित करने के लिए उन लोगों ने बाकायदा कन्नड़ भाषा भी सीखी थी। 

गौड़ा कहते हैं कि कन्नडिगा समुदाय में कोई भी समूह व्यापार करने वाला नहीं रहा है। ऐसे में अन्य राज्यों से आए लोग ही व्यापार में लगे और अपने पांव जमाने के लिए उन्होंने कन्नड़ भाषा भी सीख ली थी। वह अपने दावे के समर्थन में चिकपेट जैसे कई बाजारों का उदाहरण देते हैं। गौड़ा कहते हैं कि अन्य राज्यों से आए लोगों ने इन बाजारों में कारोबार करते हुए कन्नड़ के साथ-साथ अपनी मातृभाषा का भी इस्तेमाल जारी रखा।

बिजनेस स्टैंडर्ड वैश्विक नगरी को हिंदी अखरी...लेकिन हालात काफी हद तक बदल चुके हैं। आज के समय में शापिंग मॉल और सड़क किनारे मौजूद दुकानों में भी लोग बांग्ला, उडिय़ा, तमिल, मलयालम और हिंदी बोलते हुए अधिक दिखते हैं। कन्नड़ बोलने वाले लोग कम ही नजर आते हैं, बशर्ते कि आपका वास्ता स्थानीय पुलिस से न पड़े। कई भाषाओं में अपने कार्यक्रम पेश करने वाले संगीत बैंड रघु दीक्षित प्रोजेक्ट के प्रमुख रघु दीक्षित ने जब कुछ समय पहले बेंगलूरु में अपना कार्यक्रम पेश किया था तो कुछ दर्शकों ने कन्नड़ में भी गानों की प्रस्तुति पर उनकी काफी तारीफ की थी। हालांकि दीक्षित कहते हैं कि दुनिया के कई कॉस्मोपॉलिटन शहरों में इस तरह की स्थिति पैदा हो चुकी है। लोग अपने शहर में ही अपनी संस्कृति को खोजते हुए नजर आते हैं।

वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक बेंगलूरु में कन्नड़भाषी लोगों (41.54 फीसदी) के बाद सबसे अधिक तमिल (18.43 फीसदी) और तेलुगू (15.47 फीसदी) भाषा बोलने वाले लोग मौजूद थे। उस समय हिंदीभाषी लोगों की तादाद केवल 3.41 फीसदी थी। लेकिन नई सदी में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति होने के बाद बेंगलूरु में उत्तरी राज्यों से बड़ी संख्या में लोग यहां आने लगे। इसका नतीजा यह हुआ कि कर्नाटक में बाहर से आने वाले लोगों की संख्या काफी बढ़ गई। प्रवासी लोगों की संख्या वर्ष 2001 के 1.66 करोड़ की तुलना में वर्ष 2011 में बढ़कर 2.5 करोड़ हो गई।

टीजेएस जॉर्ज ने अपनी किताब एस्क्यू: अ शॉर्ट बायोग्राफी ऑफ बेंगलूरु में भी इस पहलू को उठाया है। जॉर्ज कहते हैं, 'आईटी क्रांति से पहले बेंगलूरु में बसने वाले लोगों ने स्थानीय संस्कृति के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश की थी लेकिन नए निवासी यह कोशिश करने के लिए भी राजी नहीं थे। बेंगलूरु में कई वर्षों तक रहने के बाद भी ये लोग पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, बिहारी या यूपी वाले बने रहे।'

यहां तक कि हिंदीभाषी राज्यों से नहीं आने वाले लोग भी बेंगलूरु में अपना कामकाज चलाने के लिए हिंदी का ही इस्तेमाल करते हुए नजर आते हैं। इनमें पूर्वोत्तर राज्यों, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के अलावा नेपाल से आने वाले प्रवासी भी शामिल हैं। हालांकि कुछ कन्नड़भाषियों का मानना है कि हरेक 'स्थानीय' मुद्दे पर भावनाओं का ख्याल नहीं रखने के आरोप लगाने की प्रवृत्ति भी रही है। रंगमंच अभिनेता और कार्यकर्ता प्रकाश बेलावाडी कहते हैं, 'यह भावना नई नहीं है। लंबे समय से अंसतोष की झगड़ालू और हिंसात्मक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती रही हैं। 1991 में तमिलों के खिलाफ हिंसा, डीडी बेंगलूर से उर्दू खबरों का प्रसारण होने पर हिंसा होना और दूसरी भाषाओं की बड़ी फिल्मों की रिलीज रोकने की कोशिश इसके कुछ उदाहरण रहे हैं।' वह कहते हैं कि कन्नड़ समर्थक संगठनों का वजूद काफी पुराना है।

गौड़ा कहते हैं कि इसी बात को लेकर कन्नड़ समर्थकों में काफी रोष का भाव देखने को मिलता है। वह कहते हैं, 'आखिर एक दशक से भी लंबे समय से किसी स्थान पर रह रहा कोई व्यक्ति वहां की भाषा कैसे नहीं जान सकता है? इस पूरी बहस के केंद्र में यह विचार है कि बाहर से आया कोई व्यक्ति उस शहर की भाषा को जानने-समझने के लिए आखिर कितनी कोशिश कर रहा है?'

बेंगलूरु के व्यावसायिक इलाकों में इस तरह की कोशिशों को खुलकर देखा जा सकता है। नागरपेट बाजार में हाथ से बना कागज बेचने वाले गोविंद भाई अपने ग्राहक को फर्राटेदार कन्नड़ में यह समझाते हैं कि बिल में किसी तरह की छूट क्यों नहीं मिल पाएगी? उस ग्राहक के जाते ही वह अपनी मातृभाषा मारवाड़ी में बोलने लगते हैं और अपने कर्मचारियों को दुकान संभालने का निर्देश देते हैं। स्टेशनरी सामान से लेकर रेडीमेड कपड़े की दुकानों तक में ऐसे ही नजारे दिखाई देते हैं। चिकपेट बाजार में भी दुकानदार धड़ल्ले से कन्नड़ और मारवाड़ी बोलते हुए दिख जाते हैं।

अहमदाबाद में जन्मे गोविंद भाई करीब 50 वर्षों से बेंगलूरु में ही बस गए हैं। जब उनसे यह पूछा गया कि उन्हें कन्नड़ सीखने में कितना वक्त लगा था तो वह कहते हैं, 'मैंने दो-तीन महीनों में ही यह भाषा सीख ली थी। इसी तरह जब मैं मुंबई में था तो मैंने मराठी भी सीखी थी।' इतना कहते हुए वह हाथ के बने कागज को अखबारी पन्ने में लपेटने लगते हैं। वह हिंदी भाषा के इस अखबार के नियमित पाठक भी हैं। एक अखबार विक्रेता की मानें तो बेंगलूरु के कारोबारी इलाकों में राजस्थान पत्रिका की उतनी ही प्रतियां बिकती हैं जितनी कन्नड़ अखबार विजय कर्नाटक की बिकती हैं। 

बिजनेस स्टैंडर्ड वैश्विक नगरी को हिंदी अखरी...राजस्थान पत्रिका मूलत: बेंगलूरु में रहने वाले प्रवासी राजस्थानी समुदाय पर केंद्रित खबरें प्रकाशित करता है। उसकी फिलहाल 55,000 प्रतियां प्रतिदिन छपती हैं। इस अखबार ने दिसंबर 2014 में जाकर यहां पर अपनी प्रिंटिंग प्रेस लगाई थी। हिंदी में लिखे साइनबोर्ड पर काली स्याही पोतने का मुद्दा कुछ अलग ही रूप लेता जा रहा है। लेखिका प्रतिभा इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहती हैं, 'हम हिंदी बोलते हैं, हिंदी फिल्में देखते हैं। लिहाजा हमें हिंदी के विरोधी नहीं हैं। हमारा विरोध केवल केंद्र सरकार की तरफ से हिंदी के राजनीतिक और जबरन इस्तेमाल को लेकर है।'

भाषा संरक्षण अभियान में लगे कार्यकर्ता वालिश कुमार एस का मानना है कि हिंदी को मिले विशेषाधिकार के चलते अन्य भारतीय भाषाओं के विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। वलीश कहते हैं, 'उत्तर भारत में भोजपुरी, संथाली और अवधी जैसी 49 भाषाएं अब हिंदी की बोलियां भर बनकर रह गई हैं। इसकी वजह से इन स्थानीय भाषाओं को सरकारी संरक्षण भी नहीं मिल पा रहा है।'

वलीश कहते हैं कि राष्ट्रभाषा नहीं होते हुए भी हिंदी को जो उच्च दर्जा दिए जाने से इसे अपनी मातृभाषा बताने वाले लोगों को एक अनुचित लाभ मिल जाता है। वह कहते हैं, 'साइनबोर्ड पर हिंदी का इस्तेमाल करना अपने आप में कोई बड़ी बात नहीं लग सकती है लेकिन इससे कुछ लोगों को विशेषाधिकार मिलने की स्थिति का पता चलता है। बेंगलूरु में अन्य समुदायों की तुलना में इस भाषा का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या काफी कम है।'

पिछले दो वर्षों से वलीश और कुछ अन्य भाषाई कार्यकर्ता हिंदी थोपने के खिलाफ ट्विटर पर अभियान चलाए हुए हैं। उनका दावा है कि इस दौरान हिंदी बोलने वाले भी अधिकतर लोग भाषाओं की समानता के पक्षधर नजर आए हैं। बेलावाडी का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में बेंगलूरु में कन्नड़ भाषी लोगों की संख्या बढ़ी है और आज प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन पर कन्नड़ भाषा में कहीं अधिक सामग्री उपलब्ध है। बेलावाडी के मुताबिक कर्नाटक के अन्य हिस्सों से बेंगलूरु आकर बसने वाले लोगों की संख्या बढऩे से कन्नड़ भाषी लोगों की संख्या बढ़ी है। इसका असर यह हुआ है कि कन्नड़ भाषा की सियासी अहमियत भी हाल के वर्षों में बढ़ गई है।

कर्नाटक की सिद्धरमैया सरकार भी केंद्र सरकार की तर्ज पर भाषाई राजनीति को प्रश्रय देने में पूरी शिद्दत से जुट गई है। उसने राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को अगले छह महीनों में कन्नड़ सीखने का अल्टीमेटम दे दिया है। इसके अलावा सरकारी कामकाज में कन्नड़ भाषा के इस्तेमाल को प्राथमिकता देने का भी निर्देश जारी किया गया है। सरकार की इन कोशिशों का ही नतीजा है कि पिछले कुछ वर्षों में प्रॉपर्टी से जुड़े दस्तावेज कन्नड़ में ही तैयार किए जाने लगे हैं। हालांकि एक दशक पहले तक ये सरकारी कागजात अंग्रेजी में भी बनाए जाते थे। 

ऐसी स्थिति में जब सरजापुर रेजीडेंट्स वेल्फेयर एसोसिएशन के प्रतिनिधियों से कन्नड़ साहित्य परिषद ने संपर्क साधा तो वे तत्काल कन्नड़ सीखने के लिए तैयार हो गए। एसोसिएशन के सचिव वी आर जॉय बताते हैं कि दो हफ्तों के भीतर ही करीब 200 निवासी कन्नड़ भाषा सीखने के लिए तैयार हो गए। इनमें से एक व्यक्ति की उम्र तो 70 साल से भी अधिक है। 

बिजनेस स्टैंडर्ड वैश्विक नगरी को हिंदी अखरी...जॉय कहते हैं, 'कन्नड़-समर्थक आंदोलन देखने में थोड़ा डरावना लग सकता है और बेंगलूरु शहर की छवि पर पड़ने वाले इसके असर को लेकर भी मैं फिक्रमंद हूं। लेकिन सरजापुर में जिस तरह सांस्कृतिक एकीकरण हो रहा है वह काफी बदलाव ला सकता है।' सरजापुर की तरह बेंगलूरु के अन्य इलाकों- एचएएल, इंदिरा नगर और व्हाइटफील्ड से भी कन्नड़ की कक्षाएं चलाने के अनुरोध आ रहे हैं। कन्नड़ सीखने के लिए तैयार लोगों की बढ़ती संख्या से जॉय काफी खुश हैं। 

कन्नड़ लेखिका प्रतिभा नंदकुमार कहती हैं कि बेंगलूरु में वर्षों से कन्नड़ में लिखे बोर्ड वाली बसें चलती आ रही हैं लेकिन उसका कोई विरोध नहीं हुआ। ऐसे में मेट्रो का साइनबोर्ड हिंदी में लिखने की जरूरत क्यों आ पड़ी? बहरहाल गौड़ा इस मुद्दे पर विश्लेषणात्मक रवैया अपनाते हुए कहते हैं कि यह पूरा विवाद पहचान के उभरते संकट से जुड़ा हुआ है। गौड़ा कहते हैं, 'भारत के कई शहर इस समय ऐसी स्थिति से गुजर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि उन शहरों में उप-पहचान की प्रवृत्ति उभर रही है। दरअसल यह एक प्रतीकात्मक संघर्ष है जिसके माध्यम से जुड़ाव के अहसास को बढ़ावा देने की कोशिश की जाती है।'

ऐसे में किसी भी शहर के कॉस्मोपॉलिटन चरित्र को बरकरार रखने का इकलौता तरीका यही है कि बाहर से आने वाले लोगों का भले ही दिल खोलकर स्वागत किया जाए लेकिन स्थानीय लोगों को अपने ही शहर में बाहरी नहीं महसूस होने दिया जाए। बेंगलूरु शहर तो वैसे भी थोड़ा समायोजन करने के लिए तैयार रहा है। इस भाषाई विवाद का हल इस सोच में ही दिखता है। 

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