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अब फर्मों पर सरकार की निगाह

सुदीप्त दे / नई दिल्ली August 17, 2017

सरकार ने संदिग्ध मुखौटा (शेल) कंपनियों के खिलाफ अभियान छेडऩे के बाद अब सीमित दायित्व वाली साझेदारी (एलएलपी) कंपनियों की बढ़ती तादाद पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। पिछले दो-तीन सालों के दौरान एलएलपी कंपनियों की तादाद में काफी तेजी आई है ऐसे में नए कंपनी कानून के तहत अनुपालन जरूरतों के जरिये इन पर नियंत्रण बनाने की कोशिश की जा रही है। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक जून 2017 तक 94,304 सक्रिय एलएलपी थी। कॉरपोरेट वकीलों के मुताबिक हर महीने औसतन 2,500 से 3,000 एलएलपी पंजीकृत होते हैं। नांगिया ऐंड कंपनी के पार्टनर विकास गुप्ता कहते हैं, 'कंपनी रजिस्ट्रार अपनी पंजी से निष्क्रिय और पुराने एलएलपी को हटा रहे हैं।'
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर दिए गए अपने भाषण में कहा कि सरकार ने तीन लाख से अधिक मुखौटा कंपनियों की पहचान की है और ऐसी करीब 175,000 कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर दिया गया है। सरकार ने मुखौटा कंपनियों के जरिये काला धन को वैध बनाने के खिलाफ अभियान छेड़ा है। सरकार का ध्यान इस पर तब गया जब पिछले एक साल में एलएलपी की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हुई और इस साल मार्च में यह संख्या 3,518 के स्तर पर पहुंच गई। इस साल अप्रैल से जून तक एलएलपी कंपनियों के गठन में कोई कमी नहीं देखी गई और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के ुताबिक तीन महीने में ऐसी 8,019 कंपनियों का पंजीकरण हुआ। कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले साल नवंबर में ज्यादा मूल्य वाले नोटों की नोटबंदी से एलएलपी को प्रोत्साहन मिला है।
 
अप्रैल-जून अवधि में इन एलएलपी के कारोबार के एक विश्लेषण के मुताबिक इनमें से ज्यादातर कारोबारी सेवाएं (46 फीसदी), विनिर्माण और व्यापार (प्रत्येक 12 फीसदी), समुदाय, निजी और सामाजिक (9 फीसदी), निर्माण (8 फीसदी), रियल एस्टेट और किराया देने (6 फीसदी) आदि सेवाओं से जुड़ी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कारोबारों और दूसरी सेवाओं में एलएलपी के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। 
 
अप्रैल 2014 में कंपनी कानून, 2013 के प्रभावी होने के साथ ही मौजूदा कंपनियों को एलएलपी में बदलने और नई एलएलपी कंपनियों के गठन का रुझान बढ़ा है। इस साल जून तक करीब 6,000 कंपनियां एलएलपी कंपनी में तब्दील हुई हैं। कुछ कंपनियों के एलएलपी में बदलाव के लिए किसी सरकारी मंजूरी की जररूरत नहीं होती है।  न्यूनतम अनुपालन और नियाकीय जरूरतों की वजह से कारोबार मालिकों का एलएलपी के प्रति आकर्षण बढ़ा है। सालाना आधार पर एलएलपी को सालाना रिटर्न दाखिल करने के साथ ही अकाउंट और ऋण चुकाने की क्षमता का विवरण देना होता है। बाकी सारी फाइलिंग एलएलपी के साझेदारों में बदलाव, सेवानिवृति, इस्तीफा, पते आदि में बदलाव की स्थिति में होता है।
 
पिछले दो सालों में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एलएलपी में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की इजाजत देने के लिए नियमों को उदार बनाने के साथ ही विदेशी साझेदारों की नियुक्ति की अनुमति भी दी है जिसकी वजह से इसके लिए आकर्षण बढ़ा है। हाल ही में आरबीआई के संशोधन की वजह से एलएलपी के लिए बाह्य व्यावसायिक उधारियां (ईसीबी) की अनुमति भी मिली है जिनमें मसाला बॉन्ड भी शामिल है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य में एलएलपी को एफडीआई का एक बड़ा हिस्सा मिलने की उम्मीद है। सीमित दायित्व वाली साझेदारी कानून, 2008 की धारा 75 और नियमों के मुताबिक अगर एलएलपी दो सालों तक या इससे अधिक समय तक कोई कारोबार या पेशे की शुरुआत नहीं करते हैं तो कंपनी रजिस्ट्रार स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई कर सकता है।
Keyword: shell company, मुखौटा कंपनी,
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