बिजनेस स्टैंडर्ड - स्टार्टअप का बदलता अंदाज
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स्टार्टअप का बदलता अंदाज

ध्रुव मुंजाल, निकिता पुरी और रंजीता गणेशन /  08 13, 2017

जल्द कामयाब होने की धुन में स्टार्टअप कंपनियां स्थापित मानदंडों का ध्यान रखने में कोताही कर रही हैं। पेश है ध्रुव मुंजाल, निकिता पुरी और रंजीता गणेशन की रिपोर्ट

बिजनेस स्टैंडर्ड स्टार्टअप का बदलता अंदाजअपने मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) ट्रेविस कलानिक को बाहर का रास्ता दिखाने के एक महीने बाद ही उबर को 'अमेरिका का सबसे सुधरा ब्रांड' घोषित किया गया। लोगों से बातचीत के आधार पर अपने सर्वेक्षण के नतीजे देने वाली अनुसंधान फर्म यूगव ब्रांडइंडेक्स की रिपोर्ट में उबर को यह रुतबा मिला है। खास बात यह है कि उबर ने इस मुकाम को हासिल कर ऐपल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज कंपनियों को भी पीछे छोड़ दिया है। इन तीनों कंपनियों को तो शीर्ष 20 कंपनियों की सूची में भी जगह नहीं मिल पाई। वैसे कलानिक को बाहर का रास्ता दिखाए जाने के पहले यह सर्वेक्षण किए जाने का भी उबर को निश्चित तौर पर फायदा मिला।

अमेरिकी लोगों की नजर में उबर को इतना बड़ा स्थान मिलने की कुछ खास वजहें भी हैं। उबर अपने ग्राहकों को जो सुविधा और सहूलियतें मुहैया कराती है वह इसे बेमिसाल बना देता है। मोबाइल ऐप आधारित कैब सेवा देने के कारोबार में उबर न सिर्फ अपने ग्राहकों बल्कि अपने साथ जुड़ने वाले कैब ड्राइवरों को भी मुनाफा देने में यकीन करता है। इस साल की शुरुआत में किए गए एक अन्य सर्वेक्षण में शामिल हजारों अमेरिकी तो उबर का इस्तेमाल बंद करने के बारे में सोचने तक को तैयार नहीं दिखे। 

वजूद में आने के आठ वर्षों में ही उबर का बाजार मूल्यांकन बड़ी तेजी से बढ़ते हुए 70 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। कलानिक ने शुरुआत में लग्जरी कैब सेवा के रूप में देखी जा रही उबर को अपनी कोशिशों से आम लोगों के इस्तेमाल वाली कैब सेवा में तब्दील कर दिया। लेकिन उबर को इस शानदार सफर की कीमत भी चुकानी पड़ी है। यौन उत्‍पीड़ने और संदिग्ध कारोबारी गतिविधियों के आरोपों को लेकर उबर को बचाव की मुद्रा अपनानी पड़ी। इस बीच ऐसा लगने लगा कि एक अरब डॉलर के शुरुआती निवेश से शुरू हुई यह स्टार्टअप कंपनी अब नकारात्मक प्रचार के दौर में अपनी आभा खोने लगी है।

उबर के साथ पिछले एक साल में जो कुछ हुआ है उससे स्टार्टअप कंपनियों की एक अनूठी संस्कृति का भी पता चलता है। इन कंपनियों में जल्दबाजी वाला माहौल हावी दिखता है और वहां का स्टाफ 'सब कुछ चलता है' वाला रवैया अपनाए होता है। यह सारा कुछ स्थापित परंपराओं को तोडऩे और नवाचार के नाम पर सही ठहराने की कोशिश का नतीजा होता है। इसके अलावा स्टार्टअप कंपनियां बड़ी तेजी से विकास भी करना चाहती हैं।

हालांकि उबर इस तरह की अकेली स्टार्टअप नहीं है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि सारी स्टार्टअप कार्य संस्कृति के मामले में ऐसे ही हैं। कुछ स्टार्टअप ने तो नैतिकता और कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानदंडों पर कोई समझौता किए बगैर ही खासा उत्साहजनक माहौल बनाने में सफलता हासिल की है। लेकिन सिलिकन वैली की यह आदत भारतीय स्टार्टअप में भी काफी हद तक नजर आती है। कुछ महीने पहले भारत में भी ऑनलाइन मनोरंजन देने वाली एक कंपनी और एक इंटरनेट मीडिया फर्म के संस्थापकों के खिलाफ यौन उत्पीडऩ के आरोप लगे। लगभग सभी स्टार्टअप सहज और लचीली कार्य-संस्कृति का माहौल प्रदान करते हैं जो कि बड़ी कंपनियों में शायद ही मिलता है। इसके अलावा स्टार्टअप में कर्मचारियों को सीखने का भी काफी मौका मिलता है और अधिकारी-कर्मचारी का विभेद भी अधिक नहीं होता है। लेकिन जैसे ही ये स्टार्टअप आकार में बड़े होने लगती हैं अपने पीछे अपर्याप्त मानव संसाधन प्रबंधन, कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर कम ध्यान देने और स्त्री-पुरुष भेदभाव के आरोपों की कटुता छोड़ जाते हैं। 

बिजनेस स्टैंडर्ड स्टार्टअप का बदलता अंदाजकम्प्लाईकरो के सह-संस्थापक विक्रम केडिया कहते हैं, 'समस्या यह है कि इन स्टार्टअप को पता ही नहीं चलता है कि उनका 'कूल' अंदाज कब अपनी सीमा लांघ जाता है। वे इसे जीवनशैली का हिस्सा बताकर इनसे बचने की कोशिश करते हैं।' उनकी कंपनी कम्प्लाईकरो कानूनी प्रावधानों को लागू कराने में स्टार्टअप की मदद करती है। बड़ी कंपनियों के पास तो इस तरह के मामलों से निपटने के लिए बाकायदा एक मजबूत मानव संसाधन ढांचा और जन संपर्क विभाग होते हैं। कोई भी प्रतिकूल स्थिति आने पर ये विभाग मामले को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए जी-तोड़ कोशिशों में जुट जाते हैं। मानव संसाधन विभाग अगर किसी कर्मचारी से नाखुश होता है तो वह उसे चेतावनी भरी चिट्ठी लिखने के अलावा उसका बोनस या सालाना अप्रैजल रोकने जैसे कदम उठा सकता है। लेकिन स्टार्टअप कंपनियों में आम तौर पर इस तरह की मजबूत व्यवस्था मौजूद नहीं होती है। 

खास तौर पर जब किसी कंपनी का शुरुआती दौर होता है तो उसकी संस्कृति काफी हद तक उसके संस्थापक के रुझान से ही तय होती है। स्टार्टअप कंपनियों के साथ काम कर रही फर्म नोवोज्यूरिस लीगल की संस्थापक शारदा बालाजी कहती हैं कि स्टार्टअप संस्कृति उसके संस्थापक ही तय करते हैं। कुछ भारतीय स्टार्टअप कंपनियां जल्दी से कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के लिए उबर का रास्ता अपनाने की कोशिश कर रही हैं लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं है कि इसके साथ किसी भी कीमत पर जीत हासिल करने की खामी भी उनके साथ जुड़ती जा रही है। खुद कलानिक ने यह स्वीकार किया था कि उन्हें दूसरों को धक्का देकर आगे बढऩा पसंद रहा है। भारतीय उद्यमियों के बीच 'द स्टार्टअप गॉय' के रूप में चर्चित चेन्नई के विजय आनंद मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि अमूमन हरेक स्टार्टअप का संस्थापक कड़ी मेहनत करते हुए दिखना चाहता है और इसके लिए वह नहाने जैसे रोजमर्रा के जरूरी कामों को भी तिलांजलि देने से गुरेज नहीं करता। 

गूगल भले ही अपने कर्मचारियों को ऑफिस में ही रहने की सुविधाएं देने की पहल कर रही है और इसके लिए उसने कार्यस्थलों पर वाशिंग मशीन भी लगाना शुरू कर दिया है लेकिन यह हरेक को रास नहीं आएगा। नई टेक कंपनियों की मदद के लिए द स्टार्टअप सेंटर बनाने वाले आनंद कहते हैं कि काम की जगह पर रहना केवल जुनूनी लोगों को ही रास आ सकता है। वह कहते हैं, 'सेल्स एवं मार्केटिंग टीम के अलावा जिस संगठन में भी युवा कर्मचारियों की भरमार है वहां दफ्तर को ही अपनी पूरी दुनिया समझने की खतरनाक संस्कृति पनप रही है। इन संगठनों में जब किसी नई महिला कर्मचारी की ड्रेस की खुलकर तारीफ की जाती है तो उसे थोड़ा अटपटा लगता है।'

बेंगलूरु में दो साल पहले एक टेक स्टार्टअप में नौकरी शुरू करने वाली एक महिला कर्मचारी का अनुभव इससे काफी मिलता-जुलता है। उस महिला ने सोशल प्लेटफॉर्म कोरा पर अपना अनुभव साझा किया है। उसका कहना है, 'स्टार्टअप का एक संस्थापक हरेक महिला के साथ फ्लर्ट करता है। चाहे वह रिसेप्शनिस्ट हो, कॉफी शॉप में काम करने वाली वेट्रेस हो या उसी इमारत में मौजूद दूसरी कंपनियों की महिला कर्मचारी हों। जब मैंने सहकर्मी को यह बताया कि मुझे किराये पर एक अच्छा घर मिल गया है तो उसने कहा था कि हर कोई खूबसूरत महिलाओं को किराये पर घर देने के लिए तैयार होता है।' शारदा कहती हैं कि स्टार्टअप के क्षेत्र में महिला उद्यमी बहुत कम हैं और आम तौर पर शुरुआती कर्मचारियों में पुरुषों का ही वर्चस्व होता है। वह कहती हैं, 'कॉलेज से पढ़ाई कर हाल ही में निकले कुछ युवा एक अपार्टमेंट के भीतर दिन के 18 घंटे काम में लगे रहते हैं। लेकिन काम की तलाश कर रही किसी महिला के लिए ऐसा कर पाना सुविधाजनक नहीं होगा।'

इस तरह की मुश्किलों और काम में तल्लीनता बढ़ाने के लिए शराब के सेवन का सहारा भी स्थिति को जटिल बनाने का काम करता है। शराब का इस्तेमाल इन कंपनियों की पार्टियों तक ही सीमित नहीं रहता है, कुछ लोग तो दफ्तर में भी शराब पीने लगते हैं। शारदा कहती हैं कि अगर कोई कर्मचारी अपनी महिला सहकर्मी के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करता है तो स्टार्टअप कंपनी का उससे निपटने का रवैया काफी अहम है।

असमंजस होना किसी भी स्टार्टअप का एक बुनियादी लक्षण है और अधिकतर कर्मचारी इसे स्वेच्छा से स्वीकार भी कर लेते हैं। लेकिन प्रतिस्पर्धात्‍मकता और कंपनी की तीव्र वृद्धि एवं बाजार मूल्यांकन बढ़ाने के लिए अलग रास्ता अख्तियार करने से स्टार्टअप का कामकाजी माहौल नुकसानदायक होने लगता है। दिल्ली के एक डिजिटल मार्केटिंग स्टार्टअप में काम करने वाली शीतल मल्होत्रा बताती हैं कि जब तक कंपनी अपने लक्ष्य हासिल करती रहती है और फंड की सुचारु व्यवस्था बनी रहती है, तब तक उसके कर्ताधर्ता कर्मचारियों की चिंताओं और उनके मनोबल पर पडऩे वाले असर को लेकर बेफिक्र बने रहते हैं। वह कहती हैं, 'अगर आप बाकी लोगों से अलग राय रखते हैं तो आपको चिह्निïत कर लिया जाता है। अगर कैजुअल सेक्स जैसी बातें सुनकर आप परेशान हो जाती हैं तो फिर स्टार्टअप आपके लिए नहीं बना है।'

स्टार्टअप में काम करने वाले युवाओं के लिए दबाव यहीं पर खत्म नहीं होता है। कंपनी के सांस्कृतिक ढांचे में फिट नहीं हो पाने वाले कर्मचारियों को बाहर भी निकाल दिया जाता है। आम तौर पर इसके शिकार वे लोग होते हैं जो अंग्रेजी बोलने में कमजोर होते हैं या जो शहरी पृष्ठभूमि के 'सभ्य समाज' से नहीं आते हैं। स्टार्टअप कंपनियों की नौकरी देने के तरीके में भी इस तरह की नादानी साफ नजर आती है। किसी कंपनी के बुनियादी काम को अंजाम देने वाले कर्मचारी मशहूर प्रबंध संस्थानों और इंजीनियरिंग कॉलेजों से चुने जाते हैं। लेकिन मानव संसाधन विभाग में किसी को नौकरी पर रखना तो सामान्य तौर पर गैरजरूरी काम माना जाता है। गुरुग्राम के एक ट्रैवल सर्च इंजन स्टार्टअप के एक पुराने कर्मचारी कहते हैं, 'इन कंपनियों में माना जाता है कि कोई भी यह काम कर सकता है जबकि यह एक विशेषज्ञता वाला काम है।'

कार्यस्थल पर यौन उत्‍पीड़न को लेकर वर्ष 2013 में बने कानून के मुताबिक 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली सभी कंपनियों को अपने यहां महिला कर्मचारियों के उत्पीडऩ से संबंधित शिकायतें सुनने के लिए एक समिति बनानी होगी। यह एक कानूनी बाध्यता है लेकिन सभी स्टार्टअप कंपनियां इसका पालन नहीं करती हैं। हालांकि स्टार्टअप शुरू करने वाले लोगों का कहना है कि इस तरह के कानूनी प्रावधानों का पालन कर पाना उनके लिए खासा मुश्किल है। वे फंड की कमी का हवाला देते हुए कहते हैं कि कारोबार की अनिश्चितता के चलते उन्हें अपने भविष्य का ही अंदाजा नहीं होता है।  बिगबास्केट डॉट कॉम समेत कई ई-कॉमर्स कंपनियों के प्रवर्तक एवं रणनीतिक निवेशक के गणेश कहते हैं, 'जब आप कोई स्टार्टअप शुरू करते हैं तो आपको यह पता ही नहीं होता है कि वह कंपनी कितने दिन टिक पाएगी। ऐसे में आप किसी को काम पर रखते हैं और पसंद नहीं आने पर बाहर कर देते हैं। 

बिजनेस स्टैंडर्ड स्टार्टअप का बदलता अंदाजआपको पता नहीं होता है कि अगले कुछ महीनों में स्टार्टअप क्या शक्ल लेगी? ऐसे में इन बातों पर कोई भी ध्यान नहीं देता है। हालांकि इस प्रवृत्ति के लिए इसे बहाना नहीं बनाया जा सकता है।' तकनीक के जुनूनी लोगों के लिए कार्यक्रमों का आयोजन करने वाले हैजगीक के सह-संस्थापक किरण जोन्नालगड्डïा की भी कुछ ऐसी ही राय है। वह इस राय से इत्तेफाक रखते हैं कि स्टार्टअप के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना वजूद बनाए रखने की होती है। वह कहते हैं, 'स्टार्टअप सामान्य रूप से उन पहलुओं पर ही ध्यान देती हैं जिनके प्रति उनके निवेशक चिंतित होते हैं। लेकिन मैंने कभी भी किसी निवेशक को कंपनी के कर्मचारियों के साथ होने वाले बरताव को लेकर चिंतित नहीं देखा है।' 

वह कहते हैं कि यह मामला तभी संज्ञान में आता है जब कर्मचारियों के साथ बुरे बर्ताव से संबंधित कोई खबर मीडिया में आ जाती है। उबर के मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ। उबर के बड़े शेयरधारक बेंचमार्क के दो निवेशकों- मैट कोलर और पीटर फेंटन को जब यह अहसास हुआ कि कंपनी अपने अंशधारकों में फैली नाराजगी दूर करने में नाकाम रही है तो कलानिक को हटने के लिए कह दिया गया। वैसे किसी कंपनी की अंदरूनी समस्याओं के प्रति निवेशकों का ध्यान देना काफी अप्रत्याशित है। लेकिन कलानिक के मामले में जब पूंजी निवेशकों को बड़ी पूंजी दांव पर लगी दिखी तो उन्होंने दखल देने का फैसला किया ताकि नुकसान को कम किया जा सके। गणेश कहते हैं कि इस प्रवृत्ति में बदलाव होना चाहिए और निवेशकों को कर्मचारियों के साथ होने वाले बर्ताव को निवेश का पैमाना बनाना चाहिए। 

वह कहते हैं, 'उबर का मामला स्टार्टअप से जुड़े लोगों की आंख खोलने के लिए काफी है। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि आपके कारोबार का आकार कितना है, आपको यह तय करना होगा कि कंपनी के भीतर क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं? इस पर निवेशकों को भी ध्यान देना होगा।' लेकिन हालात यह है कि कुछ निवेशकों को भी आलोचना का सामना करना पड़ता है।

कुछ साल पहले जब कलारी कैपिटल की प्रबंध निदेशक वाणी कोला ने एक बड़े बिक्री सौदे पर मुहर लगाई तो उनके एक सहकर्मी ने यह कहते हुए फैसला लेने की उनकी क्षमता पर सवाल उठाया था कि क्या वह ग्राहक के साथ सोई थीं? वाणी उस घटना के बारे में कहती हैं, 'ऐसी बातों को नुकसानदायक न मानते हुए अक्सर नकार दिया जाता है लेकिन उनसे पूर्वाग्रह और गहरा पक्षपात जाहिर होता है। अगर कंपनी इस पर चुप्पी साध लेती है तो उससे ऐसे बर्ताव की स्वीकृति की पुष्टि हो जाती है।' लाइटबॉक्स वेंचर्स के सिद्धार्थ तलवार कहते हैं कि मानव संसाधन पेशेवरों पर किया जाने वाला खर्च असल में एक निवेश है। आगे चलकर इससे संगठन का जोखिम भी कम होता है। 

कुछ स्टार्टअप को अपने कर्मचारियों का लगाव कम होने की समस्या का सामना करना पड़ता है। सिलिकन वैली में काम करने के बाद भारत लौटे सुशांत रेड्डी ने आस्कअर्वी डॉट कॉम नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया था। बीमा पॉलिसी चुनने में ग्राहकों की मदद करने वाली इस कंपनी के कर्मचारी अब काम को लेकर लगाव महसूस नहीं करते हैं और न ही उनमें कंपनी के लक्ष्यों को लेकर कोई खास उत्साह दिखता है। आईआईटी के पूर्व छात्र सुशांत कहते हैं कि लोग भले ही दिन में 15 घंटे काम करते हैं लेकिन उनका काम दिशाहीन रहता है। आईबीएम की इस साल आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि कई भारतीय स्टार्टअप कॉर्पोरेट गवर्नंस के खराब स्तर और उद्यमशीलता का अनुभव नहीं होने से नाकाम हो रहे हैं।

केपीएमजी में सलाहकार श्रीधर प्रसाद कहते हैं कि छोटी कंपनियां कॉर्पोरेट गवर्नंेस पर उतना ध्यान नहीं देती हैं जबकि बड़े निवेशकों के शामिल होने से बड़ी कंपनियां इन पर काफी तवज्जो देती हैं। वैसे कुछ स्टार्टअप हालात बदलने की कोशिश कर रहे हैं। मसलन, हैजगीक की सीईओ एक महिला हैं। एक साल पुराने स्टार्टअप आओ होस्टल्स के सह-संस्थापक महेंद्र पयाती एक महिला निदेशक को भी बोर्ड में लाना चाहते हैं। जोन्नालगड्डïा सुझाव देते हैं कि भारतीय स्टार्टअप में कारोबारी माहौल सुधारने के लिए प्रमाणन को अनिवार्य कर दिया जाए। अमेरिका में निवेशक बेहतर कारोबार ब्यूरो और उपभोक्ता रिपोर्ट को देखकर यह तय करते हैं कि कौन सी नई कंपनी कारोबार के लायक है? ऐसा होने से नई कंपनियां भी कामकाजी माहौल का ध्यान रखती हैं। भारत में भी निवेशक इसकी राह अपना सकते हैं। बहरहाल भारत में स्टार्टअप कंपनियों को अपनी छवि सुधारने के लिए जागरूकता पैदा करने और अधिक संवेदनशील रवैया अपनाने की जरूरत है। अगर ऐसा होता है तो स्टार्टअप की नई शुरुआत हो सकती है।
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