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राजनीति के अखाड़े में भाषायी द्वंद्व

रघु कृष्णन और निकिता पुरी /  August 03, 2017

पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म ट्विटर पर 'प्तस्टॉपहिंदीइम्पोजिशन' टॉप ट्रेंड में शामिल था। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर अरुण जवागल सभी भाषाओं की समानता के लिए जोर दे रहे थे और वह भी उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने इस पर संदेश पोस्ट करने के लिए ट्विटर का इस्तेमाल किया। पिछले महीने जवागल और उनके समूह के करीब 400 कार्यकर्ताओं ने बेंगलूरु मेट्रो रेल पर हिंदी की एक सूचनापट्टïी के खिलाफ अभियान चलाया 'प्तनम्मामेट्रोहिंदीबेडा' (यानी हमें मेट्रो में हिंदी की जरूरत नहीं)  और करीब 150 करोड़ लोगों ने इस विषय को टैग किया और इस पर टिप्पणी की। हैरानी की बात यह है कि इस अभियान को हिंदी भाषी क्षेत्रों मसलन बिहार और राजस्थान से भी समर्थन मिला। जवागल करीब आठ सालों से संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 में संशोधन की बात कर रहे हैं जिसके तहत हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला है। वह कहते हैं, 'लोग भोजपुरी और राजस्थानी को आधिकारिक दर्जा देने की बात कर रहे हैं।' यह अनुच्छेद केंद्र को पूरे देश भर में हिंदी के प्रचार के लिए अधिकृत करता है। बैंक या रेलवे की परीक्षा हो या डाक घर हो हिंदी के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जाता है। जो लोग हिंदी नहीं जानते हैं उन्हें इन मौकों से वंचित किया जा रहा है जिसकी वजह से असंतुष्टि बढ़ी है। जवागल का मानना है कि हिंदी को लागू करने के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान पर कर्नाटक के नेताओं ने भी सक्रियता दिखाई है जो एक सकारात्मक कदम है। उनका कहना है, 'हम सामान्य लोग हैं और हम केवल इन मुद्दों पर जोर ही दे सकते हैं। नेता ही संसद में चर्चा कर सकते हैं और सभी भाषाओं के समान अधिकार के लिए संविधान में संशोधन करा सकते हैं।'

 
सिद्धरमैया का राजनीतिक कदम
 
कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने में एक साल हैं जो कांग्रेस के लिए आखिरी गढ़ है। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का सामना करने के लिए एक सकारात्मक मुद्दा पा लिया है क्योंकि भाजपा भी सत्ता हासिल के लिए तैयारी कर रही है। सिद्धरमैया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह बेंगलूरु मेट्रो में हिंदी लागू किए जाने की अनुमति नहीं देंगे और उन्होंने यह अध्ययन करने को कहा है कि दूसरे शहरों में ऐसा किस तरह किया जा रहा है। कन्नड़ भाषी कार्यकर्ताओं ने मेट्रो स्टेशनों के हिंदी बोर्ड को काला कर दिया है। 
 
हालांकि इसकी आलोचना की जा रही है। इसकी एक वजह यह है कि सार्वजनिक परिवहन तंत्र के लिए केंद्रीय फंड का इस्तेमाल किया जाता है। हिंदी के लिए दूसरा तर्क यह है कि उत्तर भारत की एक बड़ी आबादी इस शहर में करीब एक दशक से भी ज्यादा वक्त से सॉफ्टवेयर या दूसरी कंपनियों के काम के लिए रहती है। शुक्रवार को सिद्धरमैया ने केंद्र सरकार को पत्र लिखा। उन्होंने इस पत्र में बताया कि राज्य मेट्रो परियोजनाओं के बड़े हिस्से के खर्च का वहन करती है और इसमें परिचालन घाटे से लेकर ऋणों का पुनर्भुगतान भी शामिल है, ऐसे में स्थानीय नीतियों को अपनाना ही उचित होगा। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी लागू किए जाने की वजह से व्यापक विरोध हो रहा है ऐसे में कन्नड़भाषी लोगों का सम्मान किया जाना चाहिए जो मुख्यतौर पर मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने मेट्रो अधिकारियों को सूचनापट्टïी को भी अंग्रेजी और कन्नड़ में बदलने के लिए निर्देश दिया। 
 
अभिनेता और मीडिया शख्सियत प्रकाश बेलावाड़ी कहते हैं, 'विरोध हिंदी भाषा के विरोध में नहीं है बल्कि अचानक ही किसी चीज को थोपे जाने से परेशानी है। केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने इस कदम को गलत आधार पर सही ठहराया कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है।' इस महीने की शुरुआत में 'कन्नड़ रक्षा वेदिके' के कार्यकर्ताओं ने एक सम्मेलन का आयोजन कराया जिसमें क्षेत्रीय समूहों और दलों के लोगों मसलन महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस ने भागीदारी की थी। द्रविण मुन्नेत्र कषगम ने तमिलनाडु में 1965 में हिंदी भाषा के खिलाफ आंदोलन किया था। इस पार्टी के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और केरल के समूह ने भी इस कदम का समर्थन किया।  केंद्र ने इस मसले को कम करके आंकने की कोशिश की। गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजु ने कहा है कि किसी भी भाषा के साथ कोई भेदभाव नहीं है। उन्होंने इस हफ्ते की शुरुआत में राज्य सभा में कहा था, 'किसी दूसरी भाषा पर हिंदी को थोपे जाने का कोई सवाल ही नहीं है। हिंदी आधिकारिक भाषा है। कोई भी ऐसी भाषा नहीं है जो राष्ट्रीय भाषा हो।' सिद्धरमैया ने क्षेत्रवाद की भावना को आगे बढ़ाते हुए एक नौ सदस्यीय पैनल का गठन किया है ताकि कर्नाटक के लिए एक अलग झंडा डिजाइन किया जा सके। उनका तर्क था कि राज्य का अपना एक गीत है ऐसे में झंडा भी एक तार्किक कदम है और इसका मकसद राष्ट्रीय झंडे की महत्ता को नकारना कत्तई नहीं है। इससे भाजपा को एक मुद्दा मिल गया और इसने इसे विभाजनकारी बताते हुए झंडे का विरोध किया है। पार्टी के राज्य महासचिव सी टी रवि ने कहा कि हरेक राज्य के लिए अलग झंडे का सिद्धांत स्वीकार्य नहीं है क्योंकि देश का एक राष्ट्रीय झंडा है। चुनाव से पहले आक्रामक हुई कांग्रेस ने भाजपा को हिंदी केंद्रित पार्टी कहा है। पार्टी की राज्य इकाई के प्रभारी अध्यक्ष दिनेश गुंडु राव ने कहा कि भाजपा हैं कि देश में एकरूपता चाहती है। वह दूसरे लोगों पर भरोसा नहीं करती है और न ही वह विविधता का सम्मान करती है। 
Keyword: hindi, language,,
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