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अरविंद पानगड़‍िया : किए कुछ नए काम, कुछ में नाकाम

संजीव मुखर्जी /  08 02, 2017

अरविंद पानगड़‍िया

अपने कार्यकाल में पानगड़‍िया ने सुधार की कई पहल कीं। कुछ सुधारों पर सबका समर्थन हासिल हुआ तो कुछ पर सरकार सहित विभिन्न महकमों का साथ नहीं मिला

बिजनेस स्टैंडर्ड अरविंद पानगड़‍िया : किए कुछ नए काम, कुछ में नाकामनीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष और जाने-माने अर्थशास्त्री अरविंद पानगड़‍िया ने अपना पद छोड़कर शैक्षणिक कार्यों से जुड़ने का निर्णय लिया है। पानगड़‍िया तीन साल से भी कम समय इस पद पर रहे। उनका इस्तीफा अचानक आया, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके कार्यकारी संबंधों पर चर्चाएं छिड़ गईं। हालांकि उन्होंने सभी कयासों का खंडन किया और कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ उनके संबंध काफी मधुर रहे। पिछले दो साल और आठ महीने में पानगडिय़ा ने सुधार की कई पहल कीं। इनमें कुछ सुधारों सबका समर्थन हासिल हुआ तो कुछ पर उन्हें सरकार सहित विभिन्न महकमों का साथ नहीं मिला। बतौर उपाध्यक्ष उन्होंने कई सुधार कार्यक्रमों को मुकाम तक पहुंचाया जबकि कुछ योजनाएं अधूरी रह गईं।

जिनके लिए किए जाएंगे याद

► एयर इंडिया के निजीकरण की पहल

लंबे समय से एयर इंडिया सरकार के लिए एक आर्थिक बोझ साबित होती रही है। इसके बढ़ते घाटे को देख कई बार इसके निजीकरण के असफल प्रयास हुए, लेकिन नीति आयोग की सिफारिश पर राजग सरकार ने कंपनी के निजीकरण प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में एयर इंडिया पर एक कैबिनेट नोट आया था, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी भी मिल गई थी। 

पंच वर्षीय योजनाओं की जगह मोदी सरकार के लिए तैयार किया तीन साल का कार्यकारी एजेंडा, अल्पकालिक लक्ष्यों पर जोर 

कार्यकारी एजेंडा नीति आयोग का सर्वाधिक व्यापक दस्तावेज है, जिसमें विभिन्न कार्य बिंदुओं की चर्चा है। आर्थिक विषयों पर इस दस्तावेज में कई मुद्दे शामिल किए गए हैं। इसके साथ ही पहली बार पुलिस सुधार, प्रशासन आदि पर चर्चा हुई है। 

देश में उच्च शिक्षा में सुधार प्रक्रिया की शुरुआत। सबसे पहले भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) में सुधार की कवायद और बाद में यूजीसी और एआईसीटीई पर भी दिया ध्यान

भारतीय चिकित्सा परिषद जैसे राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान अपने कार्य करने के तरीकों के लिए आलोचनाओं के केंद्र में रहे हैं। नीति आयोग ने इनकी कार्य प्रणाली में पूर्ण बदलाव की सिफारिश की और इनके लिए पेशेवर रवैया अपनाए जाने पर जोर दिया। 

खस्ताहाल सार्वजनिक उपक्रम बंद करने एवं इनके विनिवेश की तैयार की सूची

आयोग ने संबंद्ध मंत्रालयों के साथ घाटे में चल रहे 44 सार्वजनिक उपक्रमों की सूची तैयार की। ये ऐसे उपक्रम रहे हैं जिन्हें बंद अधिक लाभकारी होगा। इनका रणनीतिक निवेश भी एक जरिया हो सकता है। सरकार ने कई ऐसे उपक्रमों से निपटने के लिए उपाय भी शुरू कर दिए हैं। 

राज्यों के साथ मिलकर उनके भूमि पट्टा कानून में बदलाव की मुहिम, केंद्र प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) का स्वरूप बदलने की कवायद

मुख्यमंत्रियों की एक विशिष्ट अधिकार प्राप्त समिति ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं में व्यापक बदलाव किए और इनकी संख्या 100 से घटाकर 27 कर दी। इस समिति के पीछे नीति आयोग पूरी तरह खड़ा था। 

जिनका रहा मलाल

चीन की तर्ज पर तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड) की संकल्पना पर नहीं मिला सरकार का साथ, परियोजना पर शुरू में किए कुछ काम, लेकिन कर छूट एवं रियायतों पर वित्त मंत्रालय से नहीं मिला अपेक्षित सहयोग

तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड) पानगडिय़ा का सपना था और पूरा होने पर यह चीन के शेनझेन विशेष आर्थिक क्षेत्र की तरह लगता। पानगडिय़ा के अनुसार ये क्षेत्र एक बड़े क्षेत्र में होने चाहिए जहां कुछ बुनियादी सुविधाएं पहले से मौजूदा होनी चाहिए और आर्थिक गतिविधियां भी चलनी चाहिए। उन्होंने कुछ मंत्रालयों से बात की, जिनमें कुछ ने सहमति भी दे दी। देश के दो तटीय राज्य गुजरात और आंध्र प्रदेश पानगडिय़ा की योजना के लिए मुफीद होते। हालांकि रियायतों की कमी और कर छूट नहीं मिलने जैसे मुद्दों के कारण मामला बीच में ही अटक गया। 

श्रम कानूनों में सुधार कर रोजगार सृजन वाले बड़े क्षेत्रों पर सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश 

बतौर नीति आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में पानगडिय़ा उन क्षेत्रों पर अधिक जोर देने के पैरोकार रहे, जिनमें रोजगार सृजन की खासी संभावनाएं हैं। इनमें चमड़ा, परिधान, रत्न एवं आभूषण आदि क्षेत्र हैं। वह हमेशा बड़ी विनिर्माण इकाइयां लगाने के पक्ष में थे, जिनसे काफी लोगों को रोजगार मिलता। उन्होंने एडीबी की एक रिपोर्ट का हमेशा जिक्र किया, जिसमें कहा गया कि भारत में 20 कर्मचारियों से कम संख्या वाली विनिर्माण इकाइयों ने करीब 73 प्रतिशत विनिर्माण श्रमिकों को रोजगार दिया, लेकिन 2010-11 में विनिर्माण उत्पादन में इनका योगदान महज 12 प्रतिशत ही रहा। 

15 साल के लिए दृष्टिकोण पत्र पर काम नहीं कर पाए पूरा

15 साल का दृष्टिकोण पत्र नीति आयोग का दीर्घ अवधि का दस्तावेज होता, लेकिन पानगडिय़ा के कार्यकाल में यह पूरा नहीं हो पाया।

गरीबी पर नहीं हो सकती रिपोर्ट जारी 

गरीबी आकलन और शहरी जनगणना पर पानगडिय़ा की रिपोर्ट भी पूरी नहीं हो पाई। गरीबी का लेखा-जोखा लेने के लिए वह बहु-आयामी रवैया अपनाने के पक्ष में थे। 

देश की अफसरशाही के पेचीदा ताने-बाने के साथ तालमेल स्थापित नहीं कर पाना सबसे बड़ी विफलता 

पानगडिय़ा को अफसरशाही से तालमेल बैठाने में दिक्कत हुई और संभवत: यह उनकी सबसे बड़ी असफलता थी। अफसरशाह के साथ उनके मतभेद हमेशा रहे, यह अलग बात रही कि ये कभी सार्वजनिक तौर पर नहीं दिखे। 
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