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ऑनलाइन खरीदारी पड़ न जाए भारी

तिनेश भसीन /  June 25, 2017

 आजकल खरीदार ऑनलाइन वेबसाइट पर जाकर सस्ते से सस्ता सामान खरीदने के फेर में पड़े हुए हैंं और धोखाधड़ी करने वाले उनका फायदा उठाने की फिराक में लगे हुए हैं। ये धोखेबाज बेहद लुभावने ऑफर और भारी-भरकम छूट के जरिये इन खरीदारों को फंसाते हैं। खरीदार को धोखाधड़ी होने का पता तब लगता है, जब या तो उसके हाथ नकली सामान आता है या सामान उस तक पहुंचता ही नहीं है। 29 साल के उद्यमी अभ्युदय अग्रवाल के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। उन्हें एक सोशल नेटवर्क साइट पर एक विज्ञापन नजर आया, जिसमें रॉलेक्स की घडिय़ों पर भरी छूट थी। इन घडिय़ों की कीमत 70,000 रुपये से 1.50 लाख रुपये के बीच थी और उन पर 65 फीसदी से भी अधिक की छूट दी जा रही थी। अग्रवाल ने बताया, 'खरीदार को किसी तरह का शक न हो, इसके लिए विक्रेता ने ऐलान किया था कि ये घडिय़ां पुराने स्टॉक की हैं, जिन्हें अमेरिका में दुकानों से खरीदा गया है।'

 
इसके बाद शक के लिए बहुत गुंजाइश नहीं बचती थी। घड़ी देखने के बाद शक बिल्कुल काफूर हो गया क्योंकि घड़ी एकदम असली दिख रही थी। उसमें लोगो एकदम सही जगह लगा था, 3डी होलोग्राम भी लगा था, साथ में वारंटी कार्ड था और एकदम सही बिल भी दिया गया था। लेकिन जब अग्रवाल ने उसे अधिकृत डीलर को दिखाया तो उसने बताया कि घड़ी नकली है। अग्रवाल तो पहले वकील रह चुके हैं, इसीलिए उन्होंने सही तरीका अपनाया और उनका पैसा उनके पास वापस आ गया। लेकिन अग्रवाल की तरह ही बाकी लोगों की भी किस्मत अच्छी हो और उन्हें अपना पैसा वापस मिल जाए, इसकी संभावना बहुत कम होती है। उच्चतम न्यायालय में वकील और साइबर कानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, 'ऐेसे मामलों में खरीदार को न्याय मिलने के आसार बहुत कम होते हैं। यदि बिक्री करने वाला अपना धंधा बंद कर दे तब तो और भी कम। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम से भी खास मदद नहीं मिलती और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम तो उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े ज्यादातर मसलों पर पूरी तरह मौन ही है।' इसीलिए अगर आपको किसी उत्पाद पर भारी-भरकम छूट दी जा रही है या कोई ऐसी योजना आपके सामने रखी जा रही है, जिस पर पहली बार में शायद आप भरोसा ही नहीं करें तो उसके लिए हां कहने से पहले या रकम फंसाने से पहले अच्छी तरह से जांच-पड़ताल कर लें। यहां कुछ आम हथकंडों का जिक्र किया जा रहा है, जिन्हें धोखेबाज खरीदारों को ठगने में इस्तेममाल करते हैं : 
 
अनजान वेबसाइट से खरीदारी
 
इन साइटों को बड़ी ऑनलाइन रिटेलर साइटों की तरह पूरे पेशेवर तरीके से बनाया जाता है और पेमेंट गेटवे भी दिया होता है। वे असली उत्पादों की तस्वीरें इस्तेमाल करती हैं और संपर्क सूत्र के तौर पर फोन नंबर भी देती हैं। सामान वापस करने की नीति यानी रिफंड पॉलिसी भी उनमें लिखी होती है। ऐसे में झांसे में आने की बहुत अधिक संभावना होती है। जिन्हें शिकार बनाया जा सकता है, उन्हें फंसाने के लिए वे विज्ञापन करती हैं या या जानी-मानी वेबसाइटों के वर्तमान खरीदारों का ब्योरा अवैध रूप से जुटाकर ग्राहकों से व्यक्तिगत तौर पर संपर्क करती हैं।
 
संजय प्रसाद को पिछले महीने एक ई-कॉमर्स वेबसाइट से एक ऐसी ही कॉल आई, जिसने यह दावा किया कि वह स्टार्टअप है और भारी छूट पर माल बेच रही है। एक बटुआ और बेल्ट खरीदने के बाद उन्हें बताया गया कि उन्होंने 60,000 रुपये कीमत का आईफोन 6एस जीता है। लेकिन उन्हें बताया गया कि यह फोन पाने के लिए उन्हें ऐपल की वारंटी के लिए 7,200 रुपये चुकाने होंगे। प्रसाद ने ऐसा ही किया, लेकिन सामान उन तक नहीं पहुंचा। कई बार संपर्क करने के बाद वेबसाइट ने बेल्ट तो भेज दी, लेकिन आईफोन अभी तक नहीं भेजा है और न ही वारंटी के लिए चुकाई गई रकम लौटाई है। पेशे से वकील और और अंतरराष्ट्रीय साइबर कानून तथा साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ प्रशांत माली कहते हैं, 'खरीदारों को उन वेबसाइटों से खरीदारी करते समय सावधानी बरतनी चाहिए, जो जानी-मानी नहीं हैं। ऐसी किसी वेबसाइट के बारे में पता करने का सबसे आसान तरीका यह है कि उस वेबसाइट का नाम टाइप कर सामान्य सी जांच-पड़ताल कर ली जाए। अगर उस वेबसाइट ने अन्य लोगों के साथ भी धोखाधड़ी की है तो आपको खरीदारों की शिकायतों का पता चल जाएगा।' 
 
जिन लोगों के साथ धोखाधड़ी हुई है, उन्हें अपना पैसा वापस लेने के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए। अगर आपने कार्ड से भुगतान किया है तो कार्डधारक से जुड़े विवाद का मसला उठाइए और शुल्क की वापसी का दावा कीजिए। आम तौर पर भारतीय पेमेंट गेटवे विक्रेताओं के लिए कुछ शर्तें रखते हैं। अगर किसी ग्राहक ने बैंक के जरिये रिफंड का दावा यह कहते हुए कहा है कि उसे मिला उत्पाद वायदे के मुताबिक नहीं है तो पूरी जिम्मेदारी विक्रेता की होती है। शिकायत करने वाले व्यक्ति को पेमेंट गेटवे के खिलाफ पत्र लिखना चाहिए और उसे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को भेजना चाहिए। उसमें लिखना चाहिए कि ये गेटवे फर्जी वेबसाइटों से भी जुड़े हुए हैं। ग्राहक इंटरनेट डोमेन रजिस्ट्री से भी संपर्क कर सकते हैं और उसके पास धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराकर वेबसाइट के अकाउंट को स्थगित करने का आग्रह कर सकते हैं। 
 
वकीलों के मुताबिक इस बात की पूरी संभावना है कि पुलिस इस तरह के मामले दर्ज नहीं करेगी और उसे दीवानी या उपभोक्ता से जुड़ा विवाद बताकर शिकायतकर्ता को वापस लौटा देगी। इसलिए आप जो प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराते हैं, उसमें आपको यह साबित करना होगा कि विक्रेता शुरू से ही आपको ठगने का इरादा रखता था। आप उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत भी विक्रेता को नोटिस भेज सकते हैं। फर्जी विक्रेता पर चोट का सबसे प्रभावी तरीका इंटरनेट का इस्तेमाल है। इंटरनेट पर ऐसे कई मंच यानी फोरम हैं, जहां फर्जीवाड़े या धोखाधड़ी या घटिया उत्पादों/सेवाओं की शिकायत की जाती है। आप भी यहीं पर जाइए। यदि अन्य लोग भी उस वेबसाइट की धोखाधड़ी के शिकार हैं तो वे आपसे जुड़ जाएंगे। इसके साथ ही दूसरे लोग भी उस वेबसाइट के प्रति सतर्क हो जाएंगे। अग्रवाल का कहना है कि यह तरीका आजमाने से उन्हें अपना पैसा वापस हासिल करने में बहुत मदद मिली।
 
बड़े ब्रांडों के नकली उत्पाद 
 
ज्यादातर नामचीन ई-कॉमर्स कंपनियां मार्केटप्लेस मॉडल अपनाती हैं। यह बाजार की तरह होता है, जिसमें कंपनियां बिचौलिये की तरह काम करती हैं। वे अपने प्लेटफॉर्म पर खरीदारों और विक्रेताओं की मुलाकात करा देती हैं। वे कंपनियां नकली उत्पादों पर रोक लगाने का पूरा प्रयास करती हैं, लेकिन किसी के लिए भी अपने प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले हरेक माल की गुणवत्ता जांचना मुमकिन नहीं होता।
 
ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें ग्राहकों को उत्पाद के बजाय खाली डिब्बों की डिलिवरी कर दी गई। टेक्नोपैक एडवाइजर्स के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अरविंद सिंघल कहते हैं, 'केवल लक्जरी ब्रांडों की ही नकल नहीं की जाती है, आपको छोटे ब्रांडों के भी नकली उत्पाद मिल सकते हैं। ग्राहकों को यह भी पता नहीं चल पाता है कि जो सामान वे खरीद रहे हैं, वह असली है या नकली। अगर उत्पाद ठीक नहीं निकलता है तो वे इसका दोष ब्रांड के मत्थे मढ़ देते हैं।' बड़ी और जानी-मानी वेबसाइट आसानी से सामान बदल देती हैं और रकम वापस करने को भी तैयार हो जाती हैं। लेकिन कभीकभार वे इस मामले में गेंद विक्रेता के पाले में फेंक देती हैं और वही फैसला करता है कि सामान खराब होने पर क्या करना है। इस सूरत में यदि आपको ग्राहक सेवा हेल्पलाइन से मदद नहीं मिलती है तो आपको सबसे पहले कंपनी के शिकायत अधिकारी से बातचीत करनी चाहिए। 
 
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत ऐसी सभी कंपनियों को शिकायत अधिकारी नियुक्त करना ही पड़ता है। यदि आपको फिर भी राहत नहीं मिलती है तो एफआईआर दर्ज कराएं और किसी उपभोक्ता अदालत से संपर्क करें। माली कहते हैं, 'व्यक्ति को इस मामले की शिकायत असली विनिर्माता यानी मूल ब्रांड को भी करनी चाहिए क्योंकि कॉपीराइट अधिनियम के अंतर्गत यह अपराध है। आप उस वेबसाइट के खिलाफ भी मामला दर्ज करा सकते हैं और उसमें विक्रेता को पक्ष बना सकते हैं।'
 
फर्जी संंदेशों से सावधान
 
जब कोई बड़ी ऑनलाइन खुदरा कंपनी अपनी सेल शुरू करती हैं तो व्हाट्सऐप पर फर्जी संदेश, एसएमएस और ईमेल आते रहते हैं। इनमें ऐसी छूट और पेशकश बताई जाती हैं, जिन पर पहली नजर में तो भरोसा ही नहीं होता। इनमें एक लिंक भी दिया जाता है, जिस पर बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी का नाम होता है जैसे डब्ल्यूडबल्यूडब्ल्यू फ्लिपकार्ट- बिगबिलियन सेल डॉट कॉम। 
 
दिलचस्प है कि कंपनी का इससे कोई भी ताल्लुक नहीं होता। ऐसे लिंक को क्लिक करने से आपके कंप्यूटर या डिवाइस की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और उसमें मालवेयर आ सकते हैं। ऐसे ऐप आपकी व्यक्तिगत और वित्तीय जानकारी चुरा सकते हैं। यूजरनेम और पासवर्ड, बैंक खाते की जानकारी या क्रेडिट कार्ड की जानकारी चोरी होने से आपका पैसा और निजी जानकारी चोरी हो सकती है। दुग्गल कहते हैं, 'चाहे कितने ही भरोसे वाला क्यों न भेजे, ई-मेल, एसएमएस और मैसेज से प्राप्त लिंक पर क्लिक करने से हमेशा बचना चाहिए। इसके बजाय डील्स और छूट की जानकारी हासिल करने के लिए कंपनी की वेबसाइट पर जाएं।'
Keyword: e commerce, snapdeal, स्नैपडील, फ्लिपकार्ट,
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