बिजनेस स?टैंडर?ड - स्मार्ट सिटी योजना के आड़े आ रही पुरानी बाधाएं
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स्मार्ट सिटी योजना के आड़े आ रही पुरानी बाधाएं

साहिल मक्कड़ /  05 25, 2017

पड़ताल : स्मार्ट सिटी योजना की धीमी चाल

सरकार की स्मार्ट सिटी योजना को निजी कंपनियों से मिल रही ठंडी प्रतिक्रिया के मद्देनजर कई परियोजनाओं पर अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने जून 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया था। इस मिशन का लक्ष्य 100 शहरों को स्मार्ट सिटी में बदलना है

बिजनेस स?टैंडर?ड स्मार्ट सिटी योजना के आड़े आ रही पुरानी बाधाएंप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी योजना को शुरू हुए दो साल हो चुके हैं लेकिन यह रुक-रुककर चल रही है। निजी कंपनियों से मिली ठंडी प्रतिक्रिया और सरकारी एजेंसियों की आपसी खींचतान से यह योजना प्रभावित हुई है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने जून 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया था। इसका मिशन का लक्ष्य 100 शहरों को स्मार्ट सिटी में बदलना है और वहां पर्याप्त जल और बिजली आपूर्ति, सफाई, सार्वजनिक यातायात, ठोस कचरा प्रबंधन, सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, आधुनिक यातायात प्रबंधन व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी और ई-प्रशासन के जरिये जीवन स्तर को बेहतर बनाना है।

इसके पीछे सोच शहर के एक हिस्से में आधुनिक सुख सुविधाएं विकसित करना है। इसके लिए शहर में कम से कम 500 एकड़ के हिस्से को नए रंगरूप में ढाला जा सकता है या फिर 25 एकड़ हिस्से को नए सिरे से विकसित किया जा सकता है। साथ ही स्मार्ट सिटी के लिए चुने गए शहर में कम से कम एक ऐसा स्मार्ट फीचर होना चाहिए जो शहर के सभी निवासियों की जिंदगी से जुड़ा हो।

शहरी विकास मंत्रालय ने इस परियोजना के लिए 20 शहरों की पहली सूची जनवरी 2016 में घोषित की थी और राज्यों को इसके लिए विशेष कंपनी (एसपीवी) बनाने को कहा था। इस कंपनी में शहरी स्थानीय निकाय की बराबर भागीदारी होनी चाहिए। कंपनी में निजी भागीदारी को अनुमति दी गई थी लेकिन इसमें शर्त यह है कि प्रबंधन नियंत्रण सरकार के पास ही रहेगा। फिलहाल कोई भी निजी कंपनी अब तक किसी भी एसपीवी में शामिल नहीं हुई है। 

बिजनेस स?टैंडर?ड स्मार्ट सिटी योजना के आड़े आ रही पुरानी बाधाएं

स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए विकसित की जाने वाली भूमि और इसके क्रियान्वयन का विशेष अधिकार एसपीवी के पास है। साथ ही कंपनी का काम शहर के विकास में शामिल सभी एजेंसियों और स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व के बीच तालमेल सुनिश्चित करना है ताकि लालफीताशाही इसके आड़े न आए। शहरी विकास मंत्रालय को कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में मदद करने वाली संस्था नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स के निदेशक जगन शाह कहते हैं, 'एसपीवी को कंपनी कानून के तहत बनाया गया है ताकि पेशेवर क्षमता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। बाजार से पेशेवरों की सेवाएं लेकर इस तरह की जवाबदेही की सबसे अच्छे ढंग से सुनिश्चित किया जा सकता है।' उनका सुझाव है कि एसपीवी बोर्डों में स्वतंत्र निवेशकों को आमंत्रित कर उन्हें और रचनाशील बनाया जा सकता है क्योंकि उनका नजरिया अलग होगा। उनकी मौजूदगी से बोर्ड के फैसले ज्यादा सारगर्भित होंगे। उन्होंने कहा कि व्यापक विकेंद्रीकरण से एसपीवी को फायदा होना चाहिए।

शाह का कहना है कि निजी भागीदारी के लिए महानगरों की बड़ी सलाहकार संस्थाओं और कंपनियों पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय कंपनियों और तकनीकी संस्थाओं के साथ साझेदारी की संभावनाएं तलाशी जानी चाहिए। वह कहते हैं, 'हमें सबसे ज्यादा जरूरत शहरी स्थानीय निकायों की क्षमताओं का निर्माण करने और उपलब्ध संसाधनों को विकसित करने की है। ऐसा करना स्मार्ट बात होगी।' शाह का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से सस्ते नवाचार की भावना भी झलकती जिसे स्मार्ट सिटी मिशन के दिशानिर्देशों में बढ़ावा दिया गया है। अलबत्ता एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी का कहना है कि स्मार्ट मिशन के दिशानिर्देशों में एसपीवी में निजी कंपनियों की भागीदारी अनिवार्य नहीं है और अगर जरूरी हुआ तो भविष्य में निजी कंपनियों को साथ लिया जाएगा। अधिकारी ने कहा, 'सलाहकार पहले से ही स्वच्छ भारत मिशन जैसी कई योजनाओं पर काम कर रहे हैं।'

अधिकारी ने स्वीकार किया कि स्मार्ट सिटी मिशन की शुरुआत धीमी रही है क्योंकि एसपीवी बनाने, मुख्य कार्याधिकारी नियुक्त करने और परियोजना प्रबंधन समितियों के गठन में समय लग गया। उन्होंने कहा, 'परियोजना की टेंडर प्रक्रिया में भी कुछ समय लग गया। अब इस योजना पर तेजी से काम हो रहा है।' बिज़नेस स्टैंडर्ड ने इस योजना के आंकड़ों का अध्ययन करने पर पाया कि पहले चरण में केंद्र सरकार द्वारा मंजूर 20 शहरों में अभी केवल 4 फीसदी काम ही पूरा हो पाया है। 43,548 करोड़ रुपये की 810 परियोजनाओं में से केवल 503 करोड़ रुपये की 32 परियोजनाएं ही पूरी हो पाई हैं। 3,500 करोड़ रुपये की 72 अन्य परियोजनाओं पर भी काम शुरू हो चुका है। आंकड़ों के मुताबिक अधिकांश काम भाजपा शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में हुआ है।

हालांकि कुछ परियोजनाओं में समय लगना लाजमी है। डेलॉयट टच तोहमात्सू में पार्टनर अरिंदम गुहा ने कहा, 'स्मार्ट सिटी योजना में दो तरह की परियोजनाएं बननी हैं। एक शहरी बुनियादी ढांचे से संबंधित है और दूसरी सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीक से। खासकर पुराने शहर में बुनियादी ढांचे के विकास में समय लगने की संभावना है।' गुहा कहते हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीक से जुड़ी सुविधाओं जैसे शहरी निकाय की सेवाओं की आपूर्ति, स्मार्ट खंभों के जरिये सेंसर आधारित आंकड़ों का संग्रह, इंटेलीजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट, स्मार्ट ठोस कचरा प्रबंधन और जला आपूर्ति में जल्दी परिणाम दिखाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि 20 शहरों में से अधिकांश ने इन परियोजनाओं पर काम शुरू कर दिया है और जल्दी ही इसके परिणाम दिखने चाहिए।

जो काम सार्वजनिक-निजी साझेदारी के तहत होने हैं उन पर भी काम बहुत धीमे चल रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक1,357.47 करोड़ रुपये की 19 परियोजनाओं पर ही काम शुरू हुआ है और 3,930.77 करोड़ रुपये की 46 परियोजनाएं टेंडर प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि निजी कंपनियां इसलिए स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं क्योंकि उनके लिए कोई खास वित्तीय या कर प्रोत्साहन का प्रावधान नहीं है।

स्मार्ट सिटी मिशन के लिए भविष्य में वित्त पोषण भी एक समस्या हो सकती है। फिलहाल केंद्र और राज्य सरकारों ने अगले 5 साल तक 100-100 करोड़ रुपये देने का संकल्प जताया है। सरकारी अधिकारी ने कहा, 'हर स्मार्ट सिटी ने अपनी परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए बिजनेस प्लान बनाया है। कम से कम 14 शहरी निकाय 100 करोड़ से 400 करोड़ रुपये जुटाने के लिए बॉन्ड जारी करने की प्रक्रिया में हैं।'
Keyword: SMART CITY, NARENDRA MODI, GOVERNMENT, SWACHH BHARAT, URBAN, E-GOVERNANCE, PUBLIC TRANSPORT, SPVS, CURRENT AFFAIRS,
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