बिजनेस स?टैंडर?ड - जो कभी थे सिरमौर, आज हो गए कमजोर
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जो कभी थे सिरमौर, आज हो गए कमजोर

निवेदिता मुखर्जी /  04 12, 2017

रियल एस्टेट क्षेत्र की दिग्गज कंपनी रही यूनिटेक कर्ज का बोझ कम करने की कोशिश कर रही है लेकिन अब शायद हो गई है देर

बिजनेस स?टैंडर?ड जो कभी थे सिरमौर, आज हो गए कमजोरयूनिटेक के प्रबंध निदेशक संजय चंद्रा वर्ष 2012 में जब दिल्ली की तिहाड़ जेल से बाहर निकले तो कई लोग उन्हें दूसरा मौका देने को तैयार थे। 2जी घोटाले में संलिप्तता के आरोप में उन्हें जेल भेजा गया था। दूरसंचार क्षेत्र में यूनिटेक को सफलता नहीं मिली और रियल एस्टेट क्षेत्र का गुब्बारा भी फूट चुका था। लेकिन कंपनी के पास बहुत सारी जमीन थी और संजय जैसा चतुर आदमी इसका फायदा उठा सकता था।

लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। यूनिटेक का रियल एस्टेट कारोबार कभी पटरी पर नहीं लौट पाया। इस साल 31 मार्च को संजय और उनके बड़े भाई अजय चंद्रा को दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने गिरफ्तार कर लिया। चंद्रा बंधुओं पर गुरुग्राम में एक परियोजना के खरीदारों को चूना लगाने का आरोप है। 44 साल के संजय ने पिछले 10 साल में जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। वर्ष 2007 में चंद्रा परिवार, दोनों भाई और उनके पिता रमेश चंद्रा, बिज़नेस स्टैंडर्ड की अरबपतियों की सालाना सूची में 7वें नंबर पर था। तब इस परिवार की संपत्ति 30,000 करोड़ रुपये से अधिक थी। रियल एस्टेट का कारोबार उस समय अपने चरम पर था और यूनिटेक इस क्षेत्र का चमकता हुआ सितारा था।

चंद्रा परिवार डीएलएफ के कुशल पाल सिंह के बाद देश का सबसे समृद्ध डेवलपर था। वर्ष 2009 से रियल एस्टेट का पतन शुरू हुआ। यूनिटेक के पास उस समय देशभर में 14,000 एकड़ जमीन थी। कंपनी की योजना अपनी कुछ संपत्तियों को सिंगापुर में एक रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट में सूचीबद्ध करके 1.5 अरब डॉलर जुटाने की थी। साथ ही उसने निवेशकों से भी एक अरब डॉलर जुटाने की योजना बना रखी थी।

इससे पहले कि अपनी इन योजनाओं को अमली जामा पहना पाती, रियल एस्टेट का बाजार मंद पड़ने लगा और कंपनी को पैसा जुटाने की अपनी योजना छोड़नी पड़ी। कंपनी पर 8,000 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया। हालांकि सितंबर 2016 तक यह 5,818 करोड़ रुपये रह गया। यूनिटेक के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि संजय की अति महत्त्वाकांक्षा के कारण कंपनी का यह हाल हुआ। उन्होंने कहा, 'उस समय बाजार अच्छी स्थिति में था और उनकी तेजी से बढऩे की महत्त्वाकांक्षा को रोकने वाला कोई नहीं था।'

2जी का बोझ

बिजनेस स?टैंडर?ड जो कभी थे सिरमौर, आज हो गए कमजोरसंजय ने स्थिति को संभालने की पूरी कोशिश की। उन्होंने कुछ संपत्तियों को बिक्री के लिए रखा (उन्होंने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा था कि हम संपत्तियों को बेचने के कारोबार में हैं), कुछ परियोजनाओं से पल्ला झाड़ा और कीमतों में भारी कटौती की। उन्होंने पैसा जुटाने के लिए बैंकों और निजी इक्विटी निवेशकों से बात की और किफायती मकान बनाने की अनुमति लेने के लिए राज्य सरकारों के साथ लॉबिंग की।

फिर कंपनी ने दूरसंचार के क्षेत्र में कदम रखा। यूनिटेक की सहयोगी कंपनी यूनिटेक वायरलेस को वर्ष 2008 की शुरुआत में पूरे देश के लिए लाइसेंस मिला। कंपनी को यह लाइसेंस पहले आओ, पहले पाओ की बदनाम नीति के तहत मिला और इसके लिए उसने सरकार को 1,658 करोड़ रुपये का भुगतान किया। उसी साल अक्टूबर में कंपनी ने 67.25 फीसदी भागीदारी नॉर्वे की कंपनी टेलीनॉर को 6,120 करोड़ रुपये में बेच दी। इस तरह कंपनी का मूल्यांकन 9,100 करोड़ रुपये था जो उसके द्वारा चुकाई गई एंट्री फीस का पांच गुना था। जिस समय कंपनी ने हिस्सेदारी बेची उस समय उसके पास कोई और संपत्ति नहीं थी इसलिए माना गया कि यह इसके लाइसेंस की कीमत है।

बाद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने 2जी घोटाले का पर्दाफाश करते हुए कहा कि स्पेक्ट्रम औने-पौने दामों में बेच दिए गए जिससे सरकारी खजाने को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ जबकि यूनिटेक जैसी निजी कंपनियों ने इसका फायदा उठाया। रिपोर्ट में कहा गया कि लाइसेंस देने में नियमों को तोड़ा मरोड़ा गया और दिशानिर्देशों की अनदेखी की गई। इससे जाहिर होता है कि लाइसेंस देने वालों और इसे हासिल करने वालों के बीच सांठगांठ थी। इस पर हुई कार्रवाई में कई नेता, अधिकारी, उद्योगपति और कंपनियों के अधिकारी गिरफ्तार हुए। संजय भी उनमें शामिल थे क्योंकि यूनिटेक की दूरसंचार इकाई की कमान उनके हाथों में थी।

जेल से रिहा होने के बाद संजय चंद्रा की पूरी ऊर्जा अदालती लड़ाई में लग गई और यूनिटेक का रियल एस्टेट का मुख्य कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ। दूरसंचार घोटाले से पहले दोनों भाई कारोबार में एकदूसरे की मदद कर रहे थे। अजय परियोजनाओं के क्रियान्वयन को देख रहे थे जबकि संजय वित्त पोषण और निवेशकों के साथ संबंधों पर ध्यान दे रहे थे। लेकिन संजय के जेल जाने के बाद यह तालमेल टूट गया।

शेयरों में गिरावट

बिजनेस स?टैंडर?ड जो कभी थे सिरमौर, आज हो गए कमजोरइस बीच यूनिटेक के शेयरों की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही थी। दिसंबर 2012 में चंद्रा परिवार की संपत्ति केवल 4,500 करोड़ रुपये रह गई जो उसकी पांच साल पहले की संपत्ति से 85 फीसदी कम थी। कुछ ही सालों में चंद्रा परिवार अरबपतियों की सूची से बाहर हो गया। यूनिटेक के शेयर की कीमत अपने चरम से 98 फीसदी गिरावट के साथ 5.84 रुपये पहुंच चुकी है। इसकी तुलना में डीएलएफ के शेयर की कीमत दिसंबर 2007 से 84 फीसदी गिरकर 154 रुपये पहुंच चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में रियल एस्टेट क्षेत्र में मंदी के कारण दोनों कंपनियों की हालत खस्ता हुई है। किसी नई बड़ी परियोजना के शुरू नहीं होने, मकान ग्राहकों को देने में देरी, भारी संख्या में मकान और मांग में कमी ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। यूनिटेक के एक अधिकारी का कहना है कि कंपनी में कहीं ज्यादा गलतियां हुई हैं।

यही वजह है कि जहां डीएलएफ ने किराये से होने वाली आय (सालाना 2,500 करोड़ रुपये से ज्यादा) के जरिये अपने लैंड बैंक का सही इस्तेमाल किया वहीं यूनिटेक राजस्व जुटाने का कोई तरीका नहीं ढूंढ पाई। कंपनी के पास सोहना रोड और दूसरे स्थानों पर भारी लैंड बैंक है लेकिन फिलहाल कोई भी उसे पूछने वाला नहीं है। डॉयचे बैंक जैसे बैंकों के साथ अदालती लड़ाई ने यूनिटेक के लिए स्थिति बद से बदतर बना दी।

यूनिटेक की सहयोगी कंपनी यूनिटेक ग्लोबल द्वारा 15 करोड़ डॉलर का कर्ज नहीं चुकाने पर डॉयचे और कुछ अन्य बैंकों ने चार साल पहले यूनिटेक को अदालत में घसीटा था। इतना ही नहीं कंपनी की सावधि जमा योजना भी विवादों के घेरे में आ गई क्योंकि उसने जमाकर्ताओं का भुगतान नहीं किया। पिछले मार्च में कंपनी लॉ बोर्ड ने यूनिटेक को जमाकर्ताओं को 30 करोड़ रुपये का भुगतान करने को कहा। जब कंपनी भुगतान करने में नाकाम रही तो बोर्ड ने जमाकर्ताओं को अदालत में जाने को कहा। इसके बाद जमाकर्ता नैशनल कंपनी लॉ बोर्ड ट्रिब्यूनल में चले गए।

पहले कंपनी में एक परियोजना से दूसरे परियोजना में फंड आ रहा था जिससे चीजें सुगमता से चल रही थीं लेकिन अब कर्मचारियों का वेतन देने और कर्ज चुकाने से कंपनी की वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ रहा है। जब यूनिटेक के संस्थापक रमेश चंद्रा सक्रिय थे तो कंपनी की स्थिति स्थिर थी लेकिन अब स्थिति यह है कि कोई नहीं जानता कल क्या होगा। चंद्रा के कई वफादार संकट की इस स्थिति में कंपनी छोड़कर नहीं जाना चाहते लेकिन यह भी सच है कि बाजार में उनके लिए शायद ही कोई नौकरी है। 2016 में यूनिटेक के कर्मचारियों की संख्या 1,000 से भी कम रह गई।

एक सूत्र ने कहा कि गुरुग्राम से लेकर ग्रेटर नोएडा तक कंपनी की परियोजनाओं में फ्लैट मिलने में हो रही देरी के कारण खरीदार प्रदर्शन कर रहे हैं और उन्होंने अदालतों में मामले दर्ज कराए हैं। इससे हाल के दिनों में यूनिटेक की मुश्किलें बढ़ी हैं। संजय के भाई भी जेल में हैं। संजय चंद्रा ने मिलकर बात करने का वादा किया था लेकिन पिछले कई महीनों से वह साक्षात्कार के लिए उपलब्ध नहीं रहे। यूनिटेक ने एक बयान में कहा, 'प्रोजेक्ट पूरा होने में देरी के कारण कंपनी के प्रबंध निदेशकों को हिरासत में लिया गया है। यह ऐसा कारण है जो हमारे हाथ में नहीं है। रियल एस्टेट क्षेत्र मंदी के दौर से गुजर रहा है और किसी भी निवेशक के साथ कोई धोखा नहीं हुआ है।' कंपनी ने कहा कि कंपनी का दैनिक काम बदस्तूर चल रहा है।

कंपनी अपने कर्ज को कम करने और लोगों को घर देने के लिए पूरा प्रयास कर रही है लेकिन उसे अपनी पुरानी स्थिति में लौटने में शायद बहुत देर हो चुकी है। अलबत्ता रियल एस्टेट क्षेत्र में कोई चमत्कार हो और चंद्रा परिवार फिर किसी मुसीबत में न फंसे तो फिर कुछ भी हो सकता है।

Keyword: Unitech, real estate, sanjay chandra,
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