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'सार्वभौमिक बुनियादी आमदनी के लिए है जगह'

ईशान बख्शी / नई दिल्ली April 09, 2017

सार्वभौमिक बुनियादी आमदनी (यूबीआई) को लेकर सबसे ज्यादा बहस इसके राजकोषीय प्रभाव को लेकर होती रही है। सवाल उठता है कि इसके लिए धन कहां से आएगा? क्या इसे मौजूदा योजनाओं की कीमत पर किया जाएगा या यह मौजूदा योजनाओं से इतर होगा?
अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि नकदी के संकट से जूझ रही सरकार पहले से ही विभिन्न सब्सिडी को लेकर प्रतिबद्ध है, जिन्हें वापस लेना कठिन है। ऐसे में पर्याप्त स्तर पर बुनियादी आय की गारंटी देने के लिए राजकोष में जगह नहीं है।
लेकिन एक नए अध्ययन में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक सरकार प्राथमिकता वाली सब्सिडी जारी रख सकती है और यूबीआई भी जारी रख सकती है। सरकार को कथित गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी को खत्म करना होगा।
यह अध्ययन अर्थशास्त्री सुदीप्त मुंडले और शताद्रु सिकदर ने नैशनल इंस्टीट्यूट आफ पब्लिक फाइनैंस ऐंंड पॉलिसी ( आइडिया फार इंडिया डॉट कॉम में प्रकाशित) में किया है, जिसमें प्राथमिकता वाली सब्सिडी में खाद्य, प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, स्वास्थ्य और जलापूर्ति तथा साफ सफाई पर किए गए व्यय को दिखाया गया है। इसके अलावा शेष सब्सिडी को गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी में रखा गया है, जिसमें उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी को गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी माना गया है।
अध्ययन में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि केंद्र व राज्य सरकारों की मिलाकर सरकार की कुल सब्सिडी 1987-88 में जीडीपी के 13 प्रतिशत से घटकर 2011-12 में जीडीपी का 10.6 प्रतिशत रह गई है।
प्राथमिकता वाली सब्सिडी के पक्ष मेंं बाजार में हुए बदलाव की वजह से यह संभव हो पाया है। प्राथमिकता वाली सब्सिडी की हिस्सेदारी 1987-88 के 3.8 प्रतिशत से बढ़कर 2011-12 में 5.6 प्रतिशत हो गई। केंद्र सरकार के ज्यादा व्यय की वजह से ऐसा हुआ है। वहीं गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी में गिरावट आई है और यह 1987-88 में जीडीपी के 9.2 प्रतिशत से घटकर 2011-12 में जीडीपी का 5 प्रतिशत रह गई। गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी में आई यह गिरावट मुख्य रूप से केंद्र सरकार की ओर से इसके लिए किए गए खर्च में कटौती की वजह से हुई है। साथ ही पेट्रोलियम के दाम गिरने का भी इस पर असर पड़ा है।
लेकिन गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी में गिरावट के बावजूद आर्थिक सर्वे के आंकड़ोंं से लगता है कि यूबीआई के लिए अतिरिक्त धन की जरूरत होगी।
एनआईपीएफपी में मानद प्रोफेसर सुदीप्त मुंडले ने कहा, 'अगर आप सभी गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी में कटौती कर देते हैं तो यूबीआई के लिए राजकोषीय जगह बनती है।' हालांकि उन्होंने सावधानी बरतते हुए कहा कि इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा। इसकी वजह है कि गैर प्राथमिकता वाली ज्यादातर सब्सिडी का खर्च राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। जीडीपी का 5 प्रतिशत गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी पर खर्च होता है, 3.7 प्रतिशत खर्च राज्यों द्वारा जबकि शेष 1.3 प्रतिशत केंद्र सरकार खर्च करती है।
इस तरह से यूबीआई की ओर कदम बढ़ाने के लिे गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी में कटौती करने के लिए राज्य सरकारों को कदम उठाने होंगे। भारत के पूर्व सांख्यिकीविद प्रणव सेन ने कहा, 'इस तरह के किसी भी कदम के पहले केंद्र व राज्य सरकारों के बीच वस्तु एवं सेवा कर जैसा ही हिस्सेदारी समझौता करने की जरूरत होगी।' लेकिन गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी में कटौती करना आसान है। केंद्र के स्तर पर इन सब्सिडी में उर्वरक सब्सिडी शामिल है, जबकि राज्य स्तर पर बिजली सब्सिडी को गैर प्राथमिकता वाली सब्सिडी में शामिल किया जा सकता है।

Keyword: UBI, Poverty, Subsidy,
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