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अपना 'मंडल आयोग' बनाने को तैयार राजग सरकार

आदिति फडणीस /  March 26, 2017

देश की आबादी के एक बड़े हिस्से के सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ा होने से नए आयोग को इनके हितों का रखना होगा विशेष ध्यान
केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े समूहों के लिए नया आयोग बनाने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) के स्थान पर राष्ट्रीय सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा आयोग बनाने के प्रस्ताव पर मुहर लगाई गई। नए आयोग के गठन के लिए संविधान में संशोधन किया जाएगा और अनुच्छेद 338बी नाम का एक नया अनुच्छेद जोड़ा जाएगा।
सवाल यह है कि क्या इस आयोग को राजग सरकार का  'मंडल आयोग' माना जा सकता है? इसी के साथ एक और प्रश्न यह खड़ा होता है कि सरकार नए आयोग के गठन के लिए संविधान संशोधन जैसी पेचीदी प्रक्रिया का सहारा क्यों लेने जा रही है?
दरअसल सरकार ने पिछड़े समूहों के लिए नए आयोग के गठन का फैसला कर भारतीय राजनीति की उस हकीकत को स्वीकृति दी है जिसके मुताबिक देश की आबादी का एक बड़ा सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है लिहाजा उसकी अलहदा किस्म की समस्याओं के लिए अलग नजरिये की जरूरत है।
पिछले कुछ वर्षों में पिछड़ा जाति घोषित करने की मांग को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में चलाए गए आंदोलनों का भी इसमें योगदान माना जा सकता है। राजग सरकार के इस फैसले से पता चलता है कि वह गुजरात के पाटीदार या हरियाणा के जाट समुदाय की शिकायतों को किस तरह से हल करना चाहती है।
जहां तक पाटीदारों या पटेलों का सवाल है तो इस समुदाय की गुजरात की कुल आबादी में केवल 15 प्रतिशत हिस्सेदारी है लेकिन वर्ष 1960 में गुजरात का गठन होने के बाद से ही इस समुदाय को राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर सशक्त भूमिका रही है। कई विश्लेषक तो पाटीदारों को पिछड़ी जाति घोषित करने की मांग को ही खारिज कर देते हैं। उनका कहना है कि जिस तरह से गुजरात में इस समुदाय का वर्चस्व रहा है, उसके आधार पर उसे कहीं से भी पिछड़ा नहीं कहा जा सकता है। अपने दावे के समर्थन में इन लोगों का यह तर्क है कि वर्तमान समय में गुजरात में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कुल 120 विधायकों में 40 पाटीदार समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल भी इसी समुदाय से संबंधित हैं। जब वह मुख्यमंत्री थीं तो उनके वरिष्ठ मंत्रियों में से सात लोग पाटीदार समुदाय के ही थे।
समाज विज्ञानी अच्युत याज्ञिक कहते हैं कि पटेलों के आंदोलन का मूल मुद्दा संसाधनों की कमी न होकर शैक्षणिक अवसरों का अभाव रहा है। शिक्षा में आरक्षण की बेडिय़ां इतनी सख्त हैं कि पटेल समुदाय के बच्चे मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश ही नहीं ले पा रहे हैं। हालांकि तकनीकी शिक्षण संस्थान छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने और स्थानीय स्तर पर नौकरी तलाशने में मदद करते हैं। लेकिन पटेल समुदायों के युवा इस मामले में भी मात खा जाते हैं। इसकी वजह यह है कि तकनीकी शिक्षा के मामले में पटेल समुदाय की भागीदारी काफी कम है। आम तौर पर पटेल समुदाय के युवा कम उम्र में ही कारोबार में लग जाते हैं जिसके चलते उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका ही नहीं मिल पाता है। फिर तो एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है। उच्च शिक्षा नहीं लेने से कारोबार में जाते हैं और कारोबार में जाने से वे उच्च शिक्षा नहीं ले पाते हैं। अब पटेलों का यह महसूस होने लगा है कि भले ही राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर उनका वर्चस्व है लेकिन शैक्षणिक स्तर पर वे एक ऐसे दुष्चक्र में फंस गए हैं जो उन्हें पिछड़ेपन की तरफ धकेल रहा है।
जाटों की समस्या भी इससे ज्यादा अलग नहीं है। जाट खुद को सामाजिक रूप से पिछड़ा मानने के साथ ही शैक्षणिक स्तर पर वंचित महसूस करते हैं। हालांकि राजनीतिक स्तर पर जाट समुदाय काफी सशक्त भूमिका में नजर आता है। जाटों को पिछड़ी जाति में शामिल करने का मतलब यह है कि किसी अन्य जाति का हिस्सा मारकर ही उन्हें आरक्षण में हिस्सेदारी दी जा सकती है।
इन संदर्भों में देखने से अहसास होता है कि नया पिछड़ा आयोग बनाने का मामला हमेशा ही एक जटिल और गंभीर राजनीतिक मसला रहा है। इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गुजरात में व्यापक पाटीदार आंदोलन के चलते आनंदीबेन को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ गई थी। आनंदीबेन यह सोच सकती हैं कि अगर केंद्र सरकार ने पहले ही नया पिछड़ा आयोग बनाने का फैसला कर लिया होता तो उन्हें इस्तीफा देने की जरूरत ही नहीं पड़ी रहती। उस स्थिति में पाटीदार आरक्षण आंदोलन चला रहे नेताओं को मिली बढ़त को भी कम किया जा सकता था। अब तो जाटों ने भी अपने आंदोलन को स्थगित करने का ऐलान कर दिया है। ऐसे समय में केंद्र सरकार ने पिछड़ी जातियों के समूह मेें शामिल करने के प्रावधानों में बदलाव का आदेश देकर अपने लिए कुछ मियाद हासिल कर ली है। लेकिन इस फैसले का असली निशाना तो गुजरात है जहां पर इस साल के अंत में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। वहीं हरियाणा में भी दो साल बाद चुनाव होंगे।
वैसे पिछड़े वर्गों के लिए नया आयोग बनाने के फैसले के पीछे राजनीतिक मकसद देखने के लोभ से बच पाना आसान नहीं है, लेकिन हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि इसमें शैक्षणिक पिछड़ेपन की हकीकत को शिद्दत से स्वीकार किया गया है। बहुत देर से हमें यह अहसास हुआ है कि देश में शैक्षणिक पिछड़ापन भी मौजूद है जो असल में सामाजिक पिछड़ेपन का ही उप-उत्पाद है।
प्रधानमंत्री मोदी का यह फैसला पिछड़ों के आरक्षण की संस्तुति करने वाले मंडल आयोग की भी याद दिलाता है। जनता दल सरकार ने वर्ष 1989 में मंडल आयोग की अनुशंसाओं के अनुरूप पिछड़ी जातियों को नौकरियों में आरक्षण देने का फैसला किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 15 अगस्त 1990 को लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए इस फैसले की वजह बताई थी। सिंह ने कहा था, 'हमारा मानना है कि कोई भी समाज केवल आर्थिक समृद्धि से ही ऊंचा नहीं उठाया जा सकता है। उनका विकास तभी किया जा सकता है जब सत्ता में भी उन्हें हिस्सेदारी दी जाए और हम उनका यह हिस्सा देने के लिए तैयार हैं। डॉ भीमराव अंबेडकर के स्मृति वर्ष में हमारी सरकार ने पिछड़े वर्गों को सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में आरक्षण देने का फैसला किया है। इसे लेकर लगातार यह चर्चा की जा रही है कि इससे कितने लोगों को लाभ पहुंचेगा? हालांकि इस देश की बड़ी आबादी को देखते हुए सरकारी क्षेत्र में केवल एक फीसदी नौकरियां ही हैं लिहाजा इस एक फीसदी नौकरी में से अगर एक चौथाई नौकरियां किसी समूह को दे दी जाती हैं तो उससे आर्थिक बेहतरी पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन हमारी सोच एकदम स्पष्ट है। दरअसल नौकरशाही हमारे सत्ता तंत्र का एक बेहद महत्त्वपूर्ण अंग और नीति-निर्माण में भी उसकी निर्णायक भूमिका होती है। हम इस दबे-कुचले और पिछड़े समूह को सत्ता तंत्र और देश के संचालन में एक प्रभावी भूमिका देना चाहते हैं।'
लेकिन मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होते ही देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम जातियों ने पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने की मांग उठानी शुरू कर दी थी। इसके लिए वर्ष 1993 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया। उसे यह जिम्मेदारी दी गई कि वह पिछड़ा वर्ग में शामिल होने की मांगों का विधिवत परीक्षण कर केंद्र सरकार को उसके बारे में जरूरी सलाह देगा। लेकिन समय बीतने के साथ यह मुद्दा नौकरियों में आरक्षण की मांग तक ही सीमित नहीं रह गया है। अब नौकरी के साथ-साथ शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का मुद्दा भी काफी अहम हो गया है।

Keyword: NDA, backward commission, Reservation,
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