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अमेरिकी लेगपीस के खिलाफ उद्योग
दिलीप कुमार झा / मुंबई February 22, 2017

देश के 50,000 करोड़ रुपये के मुर्गीपालन उद्योग ने अमेरिका से चिकन लेग के आयात को मंजूरी देने के सरकार के फैसले का कड़ा विरोध किया है। इस मसले पर सरकार पिछले साल विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में हार गई थी। हाल में पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया ने केंद्रीय कृषि मंत्रालय को पत्र लिखा था। इसमें फेडरेशन ने सरकार को चेताया था कि अमेरिकी किसान मुर्गियों के आहार के लिए सुअरों की चर्बी का इस्तेमाल करते हैं, जिससे भारत में धार्मिक वैमनस्य पैदा हो सकता है। फेडरेशन देश के सगंंठित और असंगठित मुर्गीपालकों की प्रतिनिधि संस्था है। पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रमेेश खत्री ने कहा, 'हमने सरकार को पत्र लिखा है, जिसमें अमेरिका में मुर्गीपालकों के सुअर की चर्बी के इस्तेमाल करने की बात बताई है। इसलिए सरकार को अमेरिका से इसके आयात को मंजूरी नहीं देनी चाहिए।'
 
विदेशों में ज्यादातर मुर्गीपालक मुर्गियों को हट्टा-कट्टा बनाने के लिए प्रोटीन आहार के रूप में पशु चर्बी का इस्तेमाल करते हैं और अमेरिका में भी ऐसा ही होता है। भारत में भी कुछ मुर्गीपालक विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के मुर्गीपालक आहार के रूप में कृत्रिम प्रोटीन का इस्तेमाल करते हैं। पिछले साल जुलाई में भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में अपना मुकदमा हार गया था। डब्ल्यूटीओ ने अमेरिका से पोल्ट्री मीट और अंडों के आयात पर भारत के प्रतिबंध को अंतरराष्ट्रीय मानकों के खिलाफ बताया था। इसके बाद भारतीय मुर्गीपालन उद्योग के लिए अमेरिका से चिकन लेग के सस्ते आयात का जोखिम बढ़ गया था। 
 
डब्ल्यूटीओ के फैसले के मुताबिक भारत को 18 महीने के भीतर दिशानिर्देश जारी करने होंगे, जिसमें अब मुश्किल से कुछ ही महीने बचे हैं। भारत मेंं अमेरिका से पोल्ट्री आयात का फैसला जुलाई 2016 से प्रभावी हो गया था, लेकिन अभी अमेरिका से आयात शुरू नहीं हुआ है। हालांकि अमेरिकी निर्यातकों के चिकन लेग की भारत में डंपिंग की प्रबल संभावना को देखते हुए घरेलू उद्योग सरकार के सामने अपना पक्ष रख रहा है।
 
उनके विरोध का एक बड़ा कारण यह भी है कि अमेरिका से आयातित लेगपीस सस्ता पड़ सकता है। विश्लेषक बताते हैं कि अमेरिका में सफेद गोश्त पसंद किया जाता है और मुर्गे की टांग और रान जैसा गहरे रंग का गोश्त या तो कौडिय़ों के भाव बेच दिया जाता है या निर्यात कर दिया जाता है। अगर अमेरिका से ऐसा आयात धड़ल्ले से होता है तो देश में प्रसंस्करण उद्योग पर सीधा असर पड़ सकता है।
 
हालांकि इस क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां कुछ और ही कहती हैं। पोल्ट्री क्षेत्र की नामी कंपनी गोदरेज एग्रोवेट के प्रबंध निदेशक बलराम यादव ने कहा, 'अमेरिका से आयातित मुर्गा करीब 200 रुपये प्रति किलोग्राम पड़ता है, जबकि देसी बाजार में भाव केवल 125 रुपये प्रति किलो पड़ता है। इसलिए अमेरिका से पूरा मुर्गा मंगाना महंगा होगा। केवल लेगपीस आया तो देसी बाजार को दिक्कत हो सकती है।'
Keyword: america, chicken,,
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