बिजनेस स्टैंडर्ड - उत्तर प्रदेश : सरकार दर सरकार विकास का इंतजार
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उत्तर प्रदेश : सरकार दर सरकार विकास का इंतजार
ऋषभ कृष्ण सक्सेना /  02 16, 2017

पुस्‍तक समीक्षा

बिजनेस स्टैंडर्ड उत्तर प्रदेश : सरकार दर सरकार विकास का इंतजारकिताब : उत्तर प्रदेश : विकास की प्रतीक्षा में
लेखक : शांतनु गुप्ता
प्रकाशक : ब्लूम्सबरी
कीमत : 199 रुपये

केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है, सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री इसी राज्य से आए हैं और सबसे बड़ी विधानसभा भी यहीं है, यह तो सभी जानते होंगे। लेकिन क्या आपको पता है कि प्राथमिक शिक्षा में उत्तर प्रदेश से खस्ता केवल बिहार है और पिछले 1 साल में 7 लाख बच्चे प्रदेश के सरकारी स्कूलों से नाम कटा चुके हैं? आप जानते हैं कि प्रदेश में केवल 10 फीसदी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र काम कर रहे हैं और गांव-देहात में करीब 5,000 सरकारी डॉक्टरों की कमी है? कृषि प्रधान होने के बावजूद खेती के मामले में इस प्रदेश का नाम कहीं नहीं है, लेकिन हत्या और बलात्कार में उत्तर प्रदेश शीर्ष 3 राज्यों में आता है? 

ये आंकड़े आपको चौंका सकते हैं और हो सकता है कि आप उत्तर प्रदेश को इतना बदहाल मानने से इनकार कर दें। लेकिन युवा लेखक शांतनु गुप्ता की पुस्तक 'उत्तर प्रदेश: विकास की प्रतीक्षा में' बाकायदा सरकारी आंकड़ों और सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के आधार पर आपको यह सब बताती है। शांतनु नीति, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता के लिए काम करने वाले 'युवा फाउंडेशन' के संस्थापक और निदेशक हैं। शोध में उनकी खासी दिलचस्पी है और इस पुस्तक में यह साफ झलकता भी है। पिछले 15 सालों के उत्तर प्रदेश को खंगालकर पेश की गई उनकी पुस्तक विधानसभा चुनावों से पहले प्रासंगिक भी बन जाती है। 

शांतनु बताते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, उद्योग और कानून व्यवस्था जैसे बुनियादी मोर्चों पर पिछले पंद्रह साल में उत्तर प्रदेश पिछड़ता ही गया है। मिसाल के तौर पर वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा पिछले साल पेश रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में 31 प्राथमिक छात्रों पर 1 शिक्षक है, जबकि राष्ट्रीय अनुपात 27 बच्चों पर 1 शिक्षक का है। जो बच्चे स्कूलों में हैं, उनमें भी पांचवीं के 20 फीसदी बच्चे अक्षर तक ठीक से पढऩा नहीं जानते, अंग्रेजी और गणित तो बहुत दूर की बात है। लेकिन शांतनु मानते हैं कि पिछले 15 साल में मूर्तियां लगवाने और लैपटॉप बांटने में व्यस्त सरकारों ने शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए कुछ नहीं किया। 

यही हाल स्वास्थ्य का है। 2010-11 में उत्तर प्रदेश में महज 24.1 फीसदी बच्चों का टीकाकरण हुआ था और 3,600 से अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से 380 के करीब ही काम कर रहे हैं। लेकिन बसपा सरकार के समय एनआरएचएम घोटाले और जननी सुरक्षा योजना में घोटाला कर हजारों करोड़ रुपये पचाने का आरोप सरकार पर जरूर लगा। पुस्तक में 4,000 करोड़ रुपये घाटे और 2,500 करोड़ रुपये से ज्यादा बकाये के बोझ तले दबे प्रदेश के चीनी उद्योग और कानपुर, भदोही, वाराणसी, मुरादाबाद, अलीगढ़ जैसे पुराने औद्योगिक नगरों में कारखानों पर पड़ते तालों का जिक्र किया गया है, जो उत्तर प्रदेश के लिए खतरे की घंटी सरीखा ही है। असल में इसके लिए कानून-व्यवस्था की खस्ता हालत ज्यादा जिम्मेदार है। 

समाजवादी पार्टी पर अराजकता को संरक्षण देने के आरोप तो लगते ही रहते हैं, लेकिन स्थिति कितनी भयावह है, यह राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो बताता है, जिसके मुताबिक 2015 में हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर और बलात्कार में तीसरे नंबर पर रहा। इसके अलावा पिछले करीब चार साल से अपराधों का ग्राफ यहां बढ़ता ही जा रहा है। कृषि की हालत भी गंभीर है क्योंकि उत्तर प्रदेश की 62 फीसदी आबादी खेती से ही गुजर करती है, लेकिन जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी केवल 25 फीसदी है। आलम यह है कि 2016 में मध्य प्रदेश ने खाद्यान्न की सबसे ज्यादा पैदावार की, हरियाणा मे चावल की और राजस्थान में गेहूं की पैदावार सबसे ज्यादा रही, लेकिन अपराधों के मामले में कमोबेश हर फेहरिस्त में अग्रणी रहने वाला उत्तर प्रदेश यहां नजर ही नहीं आता।

पुस्तक में जो आंकड़े दिए गए हैं, वह शांतनु के विचारों पर एकदम मुहर लगाते हैं, लेकिन इसमें वर्तनी की चूक बेतरह अखरती हैं। निश्चित रूप से पुस्तक उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को भुनाने के लिए जल्दबाजी में लाई गई है। लेकिन पहले अध्याय में एक ही अनुच्छेद दो बार छपने, बसपा के अचानक बीएसपी में तब्दील होने और कई शब्द छूटने की अपेक्षा ब्लूम्सबरी जैसे प्रतिष्ठिïत प्रकाशक से नहीं होती। लेखक का रुझान भी पाठकों को सपा-बसपा विरोधी लग सकता है, लेकिन यह स्वाभाविक है क्योंकि जिन 15 सालों का ब्योरा पुस्तक में है, उस दौरान ये दोनों ही सत्ता में रही हैं। बहरहाल आंकड़ों और तालिकाओं की भरमार इसे उत्तर प्रदेश के बारे में बेहतरीन संदर्भ पुस्तक बन जाती है। इसके अलावा प्रदेश के राजनीतिक इतिहास और जातीय समीकरणों का ब्योरा इसे और भी रोचक बनाता है।

Keyword: पुस्‍तक समीक्षा, उत्तर प्रदेश: विकास की प्रतीक्षा में, शांतनु गुप्ता, ब्लूम्सबरी, विश्‍लेषण,
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