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साइकिल चली हाथ के साथ, क्या बनेगी बात!
राधिका रामशेषन /  01 29, 2017

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठजोड़ को काफी सीटें मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या ये दोनों राजनैतिक दल अगले लोकसभा चुनावों तक साथ रह पाएंगे

बिजनेस स?टैंडर?ड साइकिल चली हाथ के साथ, क्या बनेगी बात!कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का समाजवादी पार्टी (सपा) का निर्णय एक ऐसा 'संकल्प' था जिसे अखिलेश यादव हर कीमत पर भुनाना चाहते हैं। यह बात सपा के पदाधिकारी और अखिलेश खेमे के एक प्रमुख सदस्य ने कही। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव की सलाह पर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी से उस समय 'वादा' किया था जब उनकी पार्टी संकट में थी। मुलायम सिंह यादव ने अपने भाई शिवपाल सिंह यादव और अमर सिंह से विचार-विमर्श के बाद अखिलेश यादव को यह सुझाव दिया था। 

अखिलेश खेमे के सदस्य ने कहा, 'ऐसा लगा था कि हम समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न साइकिल को खो देंगे। तब मुख्यमंत्री ने दूसरी योजना बनाई ताकि चुनाव चिह्न के खो जाने पर होने वाले चुनावी नुकसान की भरपाई की जा सके। उसमें से एक प्रस्ताव यह भी था कि कांग्रेस के साथ गठबंधन किया जाए।'

अखिलेश ने गठबंधन का संकेत उसी समय दे दिया था जब 13 दिसंबर को लखनऊ में संवाददाताओं से बातचीत में उन्होंने घबराहट के साथ कहा था, 'हालांकि समाजवादी लोग राज्य में बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रहे हैं, लेकिन यदि गठबंधन (कांग्रेस के साथ) हो गया तो हम 300 (403 में से) विधानसभा सीटों पर विजयी होंगे।' उन्होंने जोर देकर कहा कि इस संबंध में मुलायम सिंह अंतिम निर्णय लेंगे। लेकिन जब करो या मरो की नौबत आ गई और पिता-पुत्र मतभेद पैदा हो गए तो अखिलेश को लगा कि कांग्रेस के साथ गठबंधन करना बेहतर रहेगा।

हालांकि बाहर से देखने पर लगता है कि कांग्रेस और सपा के इस गठबंधन से काफी सीटें मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन वास्तविक धरातल पर कुछ खामियां दिख रही हैं और इस गठबंधन की व्यावहारिकता पर सवाल उठ रहे हैं। इस गठबंधन का समर्थन करने वाले कांग्रेस के एक नेता ने अपने साथियों द्वारा जताई गई बुनियादी चिंताओं के बारे में बताया। उन्होंने कहा, 'कागज पर यह गठबंधन एक बड़े सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है और इससे कांग्रेस के पारंपरिक मतदाताओं, समाजवादी पार्टी के यादवों, अन्य पिछड़ी जातियों और मुसलमानों को साथ आना चाहिए। लेकिन आप केवल सामाजिक संयोजन की बात नहीं कर सकते। बल्कि जीत के लिए आपको युवाओं, गैर प्रतिबद्ध मतदाताओं और मध्य वर्ग लोगों के मतों को भी जोडऩा होगा।' ऐसे में गठबंधन के लिए खतरा पैदा करने वाले कौन-कौन से मुद्दे हो सकते हैं?

सीटों पर साझेदारी 

समाजवादी पार्टी को लगता है कि कांग्रेस के लिए 105 सीटें काफी अधिक होंगी जबकि उत्तर प्रदेश के लिए कांग्रेस के रणनीतिकार गुलाम नबी आजाद शुरू से ही कहते रहे हैं कि इससे कम पर बात नहीं बनेगी। समाजवादी पार्टी को यह मांग 'अनुचित' लग रही है क्योंकि 1989 से ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लगातार गिरावट दर्ज करते हुए निराशाजनक स्थिति तक पहुंच चुकी है। जबकि महज 25 साल पुरानी समाजवादी पार्टी ने तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद नाटकीय वृद्धि दर्ज की है। अखिलेश ने 'मनोवैज्ञानिक बल' के लिए यह फैसला लिया क्योंकि 105 सीटों को छोडऩे के लिए कहीं अधिक दिए जाने की उम्मीद की जा रही थी। गांधी परिवार के गढ़ कहे जाने वाले अमेठी और रायबरेली में कुछ ऐसा ही किया गया है। कांग्रेस ने घोषणा की है कि वह इन दोनों लोकसभा क्षेत्रों में सभी 10 सीटों (प्रत्येक में पांच) पर चुनाव लड़ेगी। समाजवादी पार्टी द्वारा पांच उम्मीदवारों की घोषणा किए जाने के बाद कांग्रेस ने यह घोषणा की। अमेठी से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य और कांग्रेस के नेता दीपक सिंह ने अपने ट्विटर हैंडल पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए लिखा कि 'सभी सीटों पर लडऩे और जीतने के लिए तैयार हों।'

कांग्रेस के रायबरेली जिले के एक पदाधिकारी ने कहा कि यदि पार्टी अमेठी और रायबरेली के अपने दावे पर नरम रुख अपनाती है तो उसे शेष उत्तर प्रदेश में अगले लोकसभा चुनाव से पहले अपनी खोई हुई जमीन हासिल करना लगभग असंभव हो जाएगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी को अधिकतम तीन सीटें देने के लिए तैयार थी। उन्होंने कहा, 'समाजवादी पार्टी अपने घोषित उम्मीदवारों का नाम वापस लेने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए कुछ सीटों पर हमें उनसे मुकाबला करना होगा।'

समाजवादी पार्टी का मानना था कि 2012 के विधानसभा चुनावों में वह रायबरेली और अमेठी में 7 सीटों पर विजयी रही थी और इसलिए इस बार उसे सभी 10 सीटों पर चुनाव लडऩा चाहिए। उस साल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के लोकसभा क्षेत्र रायबरेली में कांग्रेस को महज दो विधानसभा सीटों पर ही कामयाबी मिल पाई थी। राहुल गांधी की जागीर भी खाली रही। समाजवादी पार्टी के सूत्रों ने दावा किया कि पिछले लोकसभा चुनाव में अमेठी से राहुल गांधी के विजयी होने की मुख्य वहज प्रतिद्वंद्वी का अभाव रहा क्योंकि मुलायम सिंह ने अपने विधायकों को कांग्रेस के लिए काम करने का निर्देश दिया था। कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी का अमेठी में प्रवेश अप्रत्याशित लेकिन शानदार रहा क्योंकि भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार लोगों के बीच न केवल चर्चित रहीं बल्कि इससे यह खतरा भी पैदा हो गया कि मोदी लहर कहीं राहुल की राजनीतिक रियासत को धराशायी न कर दे।

हालांकि कांग्रेस अमेठी और रायबरेली के जरिये उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार दोबारा हासिल करना चाहती है, लेकिन कांग्रेस के कुछ लोग अचंभित हैं कि अवध और पूर्वांचल में उनके लिए कोई सीट अलग नहीं रखी गई। अवध क्षेत्र के एक पूर्व सांसद ने कहा, 'फिरोजाबाद, बाराबंकी, अंबेडकर नगर, सिद्धार्थ नगर- आप उन जिलों का नाम ले सकते हैं जहां हम नहीं हैं। इन जगहों पर गठबंधन कैसे काम करेगा? यह एकल शो है।' राज्य से संप्रग सरकार के पूर्व मंत्री ने कहा, 'यह सही है कि जिन लोगों ने कड़ी मेहनत की है उन्हें सीट नहींं मिली।'

नेतृत्व 

मुख्यमंत्री की कोर टीम के सदस्य सुनील कुमार साजन ने कहा, 'लोग अखिलेश के नाम पर वोट देंगे और केवल उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा।' उन्होंने स्पष्ट किया कि सामूहिक नेतृत्व के लिए कोई जगह नहीं होगी। कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि फिलहाल पार्टी को इस बात से कोई समस्या नहीं है कि अखिलेश चुनाव का नेतृत्व करने जा रहे हैं। पार्टी के एक प्रमुख रणनीतिकार ने कहा, 'वह मुलायम सिंह जी से अलग हैं। वह आपके पारंपरिक सपा नेता की तरह नहीं हैं बल्कि वह नई पीढ़ी के सपा नेता हैं। उनके लिए युवाओं और सभी जातियों एवं समुदायों में कहीं अधिक जगह है। इसलिए कांग्रेस के समर्थक और कार्यकर्ता भी उनके साथ सहज महसूस करेंगे।'

कांग्रेस के प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह पूर्वी उत्तर प्रदेश के रुद्रपुर से लड़ेंगे और उनके प्रति अखिलेश के मन में कोई नकारात्मक बात नहीं है। उन्होंने दावा किया, 'जब कभी भ्रष्टïाचार या अपराधीकरण की बात आती है तो मुलायम और शिवपाल दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने देना चाहते हैं। लेकिन अखिलेश उन्हें सजा दिलाना चाहते हैं।' 

कांग्रेस द्वारा अखिलेश के नेतृत्व को स्वीकार करने के कई अन्य कारण भी हैं। कांग्रेस नहीं चाहती है कि भाजपा और बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) के लिए बेहतर परिस्थिति पैदा हो जाए। सिंह ने कहा, 'यह मोदी (नरेंद्र मोदी) विरोधी मतदाताओं की ओर से दबाव आ रहा है। यह जरूरी नहींं है कि वे मायावती (बसपा अध्यक्ष) को पसंद करते हों लेकिन वे कोई अन्य प्लेटफॉर्म चाहते हैं।' कांग्रेस और सपा सूत्रों ने माना कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले नेतृत्व को लेकर कहीं अधिक गंभीर सवाल पैदा हो सकते हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'तब जाहिर तौर पर यह केवल अखिलेश का मामला नहीं रहेगा। राहुल सीधे तौर पर सामने आएंगे। यदि अखिलेश उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में विजयी रहते हैं और खुद को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश करना चाहते हैं तो कांग्रेस उसका विरोध करेगी।'

जनाधार 

अखिलेश के करीबी लोगों ने बताया कि गठबंधन को अंतिम रूप देने से पहले समाजवादी पार्टी को डर था कि कहीं उसका जनाधार आसानी से कांग्रेस की झोली में न चला जाए अथवा परिणाम इसका उलटा भी हो सकता है। एक सूत्र ने कहा, 'कांग्रेस के सवर्ण मतदाता समाजवादी पार्टी के बजाय भाजपा को वोट देना पसंद करेंगे।' उन्होंने कहा, 'यह इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनाव का रुख किस ओर होगा और राहुल गांधी कितने आक्रामक तरीके से इस गठबंधन की पैरवी कर पाएंगे। यदि वह इसमें थोड़ा भी असफल रहे तो कांग्रेस के जनाधार को बचा पाना हमारे लिए मुश्किल होगा।'

विपरीत ध्रुवीकरण

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने इस उम्मीद के साथ गठबंधन किया है कि 'धर्मनिरपेक्ष' गठबंधन से मुस्लिम मतदाताओं को रिझाया जा सकेगा। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार करीब 114 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाएगा। इसलिए दोनों दलों ने मुस्लिम जनाधार को सुदृढ़ करने पर जोर दिया है। सिंह ने कहा, 'मेरा अनुभव यह रहा है कि यदि कोई मुस्लिम नेता हिंदुओं को अपशब्द कहता है तभी मुसलमान समर्थक पार्टी के खिलाफ हिंदुओं का ध्रुवीकरण होता है।' इसलिए अखिलेश को यह बात ध्यान में रखनी होगी कि विपरीत ध्रुवीकरण की स्थिति न पैदा हो।
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