बिजनेस स्टैंडर्ड - पूर्व सैन्य अधिकारियों की महारत से मिलेगी ताकत
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पूर्व सैन्य अधिकारियों की महारत से मिलेगी ताकत
प्रेमवीर दास /  January 12, 2017

पूर्व सैन्य अधिकारियों को सुरक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़े पदों पर नियुक्त कर उनकी विशेषज्ञता का लाभ उठाना बेहतर होगा। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं प्रेमवीर दास 
 
सेना में दो वरिष्ठï अधिकारियों के दावे को दरकिनार करते हुए सरकार द्वारा नए सेना प्रमुख की नियुक्ति को लेकर हाल में काफी चर्चा हुई है। मीडिया, विपक्षी दल और यहां तक कि सेवानिवृत्त जनरल इस पर अपनी राय जाहिर करने से नहीं हिचके, जो फैसला पूरी तरह मौजूदा सरकार के विवेक पर निर्भर है। जनरल विपिन रावत अब सेना प्रमुख हैं और अन्य दो वरिष्ठï अधिकारियों ने अपनी इच्छा से उनके नेतृत्व में अपने शेष कार्यकाल को पूरा करने का फैसला किया है। उनके नजरिये को लेकर उन्हें दाद दी जा सकती है, जबकि अतीत में यही होता आया था कि जिन अधिकारियों की अनदेखी होती थी, वे इस्तीफा दे दिया करते थे, जिसकी अपनी तार्किक अहमियत है। अब हालात सामान्य हो रहे हैं, लिहाजा कुछ व्यापक प्रश्नों पर नजर डालने की जरूरत है।
 
पहला तो यही कि ऐसे उच्च पदों पर चुने जाने के लिए उसके योग्य बेहद काबिल और सक्षम चार से पांच नामों का एक समूह निश्चित रूप से होना चाहिए। दूसरा यही कि चूंकि वे सभी आवश्यक रूप से बेहतर हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि सबसे वरिष्ठï को स्वत: रूप से चुन लिया जाए, वहां चयन के लिए समग्र अवधारणा पर गौर करने की बात आती है। ऐसे में कुछ मानदंडों का पैमाना स्थापित करना होगा और इसका निर्णय उन्हें लेना चाहिए, जो देश का संचालन कर रहे हों। मिसाल के तौर पर पाकिस्तान या चीन को जवाब देना सेना की पहली और बुनियादी प्राथमिकता है या आज के दौर में अलगाववाद से निपटना काफी अहम हो गया है, जो किसी फैसले से जुड़ा मसला है, न कि किसी अपरिवर्तित सिद्घांत से आबद्घ। बहरहाल किसी भी सूरत में किसी का दूसरे से विशिष्टï होना जरूरी नहीं। इस प्रकार एक निर्णय किया गया है और इस बात की कोई वजह नहीं कि नए सेना प्रमुख की क्षमता या योग्यता पर संदेह किया जाए जैसा कि उनके कुछ पूर्ववर्तियों ने किया है।
 
यह हमें उच्चतम स्तर पर राष्ट्रीय हितों से जुड़े फैसलों में सेना की भूमिका जैसे व्यापक प्रश्न की ओर ले आता है। यहां पर स्थिति बहुत दिलचस्प है। अधिनायकवादी या सैन्य शासन वाले राष्ट्रों में जैसे कि पूर्ववर्ती सोवियत संघ या चीन में सैन्य या वर्दीधारी लोग उच्च पदों पर आसीन रहे हैं। मिसाल के तौर मार्शल जुको, यूस्तिनोव और चेन यी जो इन देशों में रक्षा मंत्रालय संभाल चुके हैं। इसमें दूसरी श्रेणी वाले देशों की बात करें तो ज्यादा दूर नहीं अपने पड़ोस पर ही नजर डाल ली जाए, जहां न केवल सेना के मुखिया राष्ट्र प्रमुख बने बल्कि सेना के तमाम अन्य अधिकारियों ने भी विदेश मंत्री या उसके जैसे और कई महकमे संभाले। समूची सरकार के अधिनायकवादी स्वरूप को देखते हुए यह बहुत स्वाभाविक भी है।
फिर भी अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में सैन्य पृष्ठïभूमि वाले लोगों को उतनी ही अहमियत दी जाती है। द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान अमेरिकी सेना की कमान संभालने वाले जनरल जॉर्ज मार्शल बाद में विदेश मंत्री बने और उनके बाद जनरल एलेक्जेंडर हेग और कॉलिन पॉवेल ने भी यह जिम्मेदारी संभाली। उनमें से तमाम ने सीआईए और एनआईए जैसी खुफिया एजेंसियों की बागडोर भी संभाली, जिनके काम का मिजाज सेना से अलग होता है। 
 
कुछ ही हफ्तों में कमान संभालने वाले डॉनल्ड टं्रप प्रशासन में भी रक्षा मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसे दो महत्त्वपूर्ण पदों का दायित्व पूर्व जनरलों को ही दिया जा रहा है। संक्षेप में कहें तो यही नजर आता है कि लोकतंत्रिक सरकारें भी सेना में रहे उच्च अधिकारियों को अहम राजनीतिक पदों पर नियुक्त कर रही हैं। इनमें सबसे सिरमौर जनरल आइजनहॉवर माने जाते हैं, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान मित्र देशों के अभियान की कमान संभाली थी और बाद में वह अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए। दिलचस्प रूप से संसदीय लोकतंत्रों की कहानी एकदम अलग है। ब्रिटेन में एलनब्रुक, मोंटगोमरी और माउंटबेटन जैसे नामचीन एवं प्रभावशाली सैन्य अधिकारियों का स्वर्णिम अतीत रहा है लेकिन ऐसे दुर्लभ वाकये ही देखने को मिलते हैं कि उन्हें उच्च राजनीतिक पदों पर आसीन किया गया हो। तमाम अन्य देशों के लिए भी कुछ अपवादों के साथ यही बात सच नजर आती है। हमने ब्रिटिश परंपराओं को ही आत्मसात किया है और इसमें पूर्व सैन्य अधिकारियों की विशेषज्ञता का लाभ न उठाने की परिपाटी भी अपना ली। हालांकि भारत में भी पूर्व सैन्य अधिकारियों ने राजनीति को अपनाया और वरिष्ठï मंत्री बने, जिसमें पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह विदेश मंत्रालय संभाल चुके हैं लेकिन ऐसा काफी समय बाद और अपने व्यक्तित्व में बदलाव के बाद ही संभव हो सका। 
 
यहां तक कि मौजूदा दौर में भी दो राज्यमंत्री पूर्व सैनिक हैं। इनमें से एक तो सेना प्रमुख भी रह चुके हैं। मगर वे राजनीतिक प्रक्रिया के जरिये वहां पहुंचे हैं। एक अन्य पूर्व सेना प्रमुख को राज्यसभा सीट दी गई लेकिन इससे ज्यादा उनका उपयोग नहीं हुआ। आजादी के बाद के सात दशकों में पूर्व वरिष्ठï सैनिकों को हमने राज्यपाल और राजदूत जैसे पदों पर बिठाया। यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों जैसे मनोनयन वाले पदों पर भी, जिनमें निर्विवाद रूप से उनकी विशेषज्ञता दूसरे से बेहतर हो सकती है लेकिन वहां भी उनके नामों पर विचार नहीं होता। यहां प्रवीणता विमर्श क्या हमारे हितों के लिहाज से उपयुक्त है। 
 
सैन्य मसलों पर सरकार को पेशेवर सलाह एक सुव्यस्थित प्रक्रिया के जरिये ही दी जाती है। अगर मौजूदा तंत्र किसी लिहाज से पूरी तरह सक्षम नहीं तो यह अलग मामला है लेकिन यहां अहम मुद्दा यही है कि जो लोग चार दशकों तक वर्दी में सेवा दे चुके हों, उनके ज्ञान और क्षमताओं का सबसे बेहतर उपयोग कैसे हो सके। उनकी क्षमताओं को व्यर्थ गंवाने के बजाय उन्हें कैसे बेहतर तरीके से भुनाया जाए, इस पर गंभीर रूप से विचार करने की दरकार है। 
 
सीएजी, सीवीसी और सीईसी जैसे पदों को छोड़ भी दिया जाए तो अगर दशक भर पहले सेवानिवृत्त हुए अफसरशाह को दिल्ली का उप राज्यपाल बनाया जा सकता है या पूर्व गृह सचिव को भारत में क्रिकेट बोर्ड की कमान संभालने के लिए उपयुक्त माना जा सकता है तो सैन्य खुफिया विभाग की कमान संभालने वाले को रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) का मुखिया क्यों नहीं बनाया जा सकता? इसी तरह अगर किसी व्यक्ति ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिये को लेकर महारत हासिल की हो तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड का अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया जाता? 
 
हमें यही प्रतीत होता है कि आजादी के सात दशकों बाद भी हमारा राजनीतिक प्रतिष्ठïान सैन्य शख्सियतों के साथ असहज महसूस करता है। यह दोनों पक्षों की कमजोरी बयां करता है। शासन के प्रत्येक स्तर पर अहम सुधार हो रहे हैं और उच्च सुुरक्षा ढांचा निश्चित रूप से उनमें से एक है। अगर लंबे समय से 'यथास्थितिवादी' आर्थिक नीतियों को 'सर्जिकल स्ट्राइक' की जरूरत थी तो उसी तरह की गैर परंपरागत रणनीति की अन्यत्र भी आवश्यकता है। राजनीतिक-सैन्य संगम भी उनमें से एक है। 
Keyword: defense, india, militry, army,,
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