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सरकारी दखल के दौर की मोदी ने कराई वापसी
नीति नियम
मिहिर शर्मा /  January 08, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नव वर्ष की पूर्व संध्या पर जो भाषण दिया उसका चकित करने वाला हिस्सा तब सामने आया जब उन्होंने कुछ पुराने नेताओं का नाम लेते हुए कहा कि वे उनकी नीतियों की तस्दीक करते। उन्होंने जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और के कामराज (लाला बहादुर शास्त्री का भी) के नाम लिए। पहले तीन लोगों में एक बात साझा है और वह यह कि ये सभी इंदिरा गांधी के विरोधी थे। चौंकाने वाली बात इसलिए क्योंकि मोदी सबसे अधिक अनुकरण इंदिरा गांधी का ही करते नजर आते हैं। वह भी सन 1980 के बाद की अनुशासित इंदिरा गांधी का नहीं।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में पुरानी शैली के राज्य के प्रभाव और वर्ग भेद का उल्लेख किया। हम इंदिरा गांधी के पहले कार्यकाल से ही यह सब सुनते आ रहे हैं। जैसा कि अनेक लोगों ने कहा भी। नोटबंदी को व्यापक जनसमर्थन इसलिए भी मिला क्योंकि लोगों को लगा कि अमीरों को भी गरीबों की तरह कष्टï सहना पड़ रहा है। बतौर चतुर राजनेता मोदी ने भी इस भावना को हवा दी। प्रधानमंत्री की सोच सही है। बहुत कम लोग आयकर चुकाते हैं और देश की अर्थव्यवस्था का ढांचा कुछ ऐसा है कि बेईमानी को प्रश्रय मिला है। परंतु यह समस्या तो दशकों पुरानी है। सन 1974 में इंदिरा गांधी ने संसद में अपील की थी कि बेईमानों, खासतौर पर करवंचकों और जमाखोरों को बहिष्कृत किया जाना चाहिए। जुलाई 1974 में द न्यूयॉर्क टाइम्स ने कहा था कि भारत सरकार ने करवंचकों और जमाखारों के खिलाफ सख्त कदमों की शुरुआत की है।
तब से काफी बदलाव आए हैं। हां, इस बार मोदी ने जमाखोरों का जिक्र नहीं किया। सन 1974 में पड़े छापों में स्टील, कागज, केरोसिन, साबुन और सिगरेट आदि के भंडारों को निशाना बनाया गया। हमें खुद से पूछना चाहिए कि मोदी ने इस बार वस्तुओं के भंडारण की चिंता क्यों नहीं की? शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अब हमारी अर्थव्यवस्था का स्वरूप वैसा नहीं है जहां लोगों को वस्तुओं का भंडारण करना पड़ता था। दरअसल आधारभूत बाजार आधारित सुधारों ने लोगों के व्यवहार को बदल दिया है। यही इसकी वजह है। परंतु इस मूलभूत दृष्टिï से जुड़ी एक बात यह भी है कि मौजूदा सरकार और प्रधानमंत्री वह गलती दोहराते नजर आ रहे हैं जिनसे इंदिरा गांधी तक ने सबक ले लिया था। अब नोटबंदी से प्रधानमंत्री को कोई एक सबक भी लेना चाहिए था तो वह यह था कि देशवासियों पर भरोसा किया जा सकता है। फिर चाहे वे आम लोग हों या अधिकारी। सभी ने निर्देशों का भरपूर पालन किया। इसमें दो राय नहीं है कि धन शोधन किया गया। अधिकांश धनराशि का रिजर्व बैंक के पास लौट आना तय था। यह भी सच है कि बैंक अधिकारियों ने करवंचकों के साथ मिलीभगत की। इन सब बातों को लेकर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया क्या रही? अधिकारियों को और अधिकार देना ताकि वे गड़बड़ी करने वालों को जड़ से उखाड़ सकें। चार दशक पहले की बात भूल जाइए। क्या प्रधानमंत्री को अंदाजा नहीं कि राज्य के हस्तक्षेप का यह तरीका बीते 50 दिनों में भी नाकाम रहा है।
हालिया आर्थिक अतीत को देखते हुए शायद मुझे कहने की आवश्यकता नहीं लेकिन कहना पड़ेगा कि सरकार का हस्तक्षेप नागरिकों को बेहतर नहीं बनाता। वह उनको इससे निपटने के तरीके बताता है। जरूरत है कि बेहतर डिजाइन वाले समुचित संस्थान विकसित किए जाएं।  अगर भारत को प्रत्यक्ष कर में वास्तव में सुधार करना है तो पहला कदम है रियायतों को खत्म करना। देश के करीब 1.3 फीसदी लोगों को कर दायरे में लाने के लिए जरूरी सुधारों की पूरी रिपोर्ट है। लेकिन इसके बजाय हम सन 1970 के दशक में वापस जा रहे हैं। सरकार कह रही है कि चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। आज हमारे पास तकनीक है। सरकार के पास ढेर सारे आंकड़े मौजूद हैं लेकिन उनका बड़ा हिस्सा अधूरा है। यह बात आयकर अधिकारियों को मनमाने अधिकार देती है। अगर आप जानना चाहते हैं कि छापेमारी का दौर कैसा था तो शाह आयोग की रिपोर्ट का वह हिस्सा देखिए जो आपातकाल में वित्त मंत्रालय की गतिविधियों से संबंधित है।
यदि वही सब दिखता है तो सरकार जिन लोगों से नाराज है उन पर कर अधिकारियों का कहर टूटेगा जबकि सरकार के समर्थक बचे रहेंगे। विदेशी अंशदान नियमन कानून (एफसीआरए) और स्वयंसेवी संगठनों का उदाहरण लें तो सरकार उसी राह पर है। सरकार ने कई संगठनों की संबंधित मंजूरी रोक दी है जबकि सत्ताधारी दल से जुड़े कई संदिग्ध संगठनों की विदेशी फंडिंग जारी है। अंत में वर्ग संघर्ष की बात। इंदिरा गांधी के तर्ज पर मोदी ने भी गरीबी हटाने का नारा दिया। अपने कई पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की तरह उन्होंने भी इंदिरा गांधी का अनुसरण किया। यानी लोगों की तारीफ करना और ऐसी तमाम घोषणाएं करना जिनको कोई पूरी तरह समझ नहीं सकता। प्रधानमंंत्री ने जो घोषणाएं कीं वे ज्यादातर पुरानी योजनाओं का ही विस्तार हैं। उन्हें पिछली सरकारों के काम से अलग कर पाना मुश्किल है। मसलन कम आवास ऋण के लिए कम ब्याज दर ऐसी ही एक योजना है। ऐसे में इसको एक प्रगतिशील बाजारोन्मुखी सरकार की कोई नवोन्वेषी घोषणा नहीं कहा जा सकता है। ऐसे सस्ते मकान कभी बनाकर नहीं दिए गए। लोगों को इनको बनाना पड़ा और इसके लिए अलग-अलग दर पर कर्ज लेना पड़ा। प्रधानमंत्री ने ऋण की सीमा बढ़ा दी और ब्याज दर कम कर दी। इसमें कुछ भी नया नहीं। अब कोई यह दावा नहीं कर सकता है कि मोदी देश को कम नियमन और हस्तक्षेप वाला बनाने के लिए प्रयासरत हैं। संघ विचारक राकेश सिन्हा ने भाषण के बाद टीवी पर कहा कि यह राज्य की वापसी है। मुझे भी लगता है कि अगर हम सभी सही कदम उठाएं तो यह प्रयास सफल होगा। ठीक सन 1970 के दशक के तर्ज पर। शायद मोदी सफल हों और देश के लोगों को बेहतर नागरिक बना सकें लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई इस पर दांव लगाएगा।

Keyword: Prime minister, narendra modi, leaders,
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