बिजनेस स्टैंडर्ड - पर्यावरण का अनुपम ज्ञानी जल संरक्षण में बीती जिंदगानी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, January 21, 2020 10:20 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

पर्यावरण का अनुपम ज्ञानी जल संरक्षण में बीती जिंदगानी
मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  December 28, 2016

अगर बार-बार इस बात की दुहाई दी जाती है कि भविष्य के युद्घ पानी के लिए लड़े जाएंगे तो इसका आधार यही होता है कि हम अनुपम मिश्र जैसी आवाजों को अनसुना कर रहे हैं। इसी महीने दुनिया को अलविदा कह गए मिश्र ने कभी खुद को स्थापित करने का प्रयास नहीं किया और संवाद के लिए हिंदी को ही चुना। इससे वह किसानों और उन संरक्षणवादियों के संपर्क में आए, जिनके पारंपरिक ज्ञान पर शोध कर उन्होंने अपना नजरिया विकसित किया। यह निहायत ही दिलचस्प है कि एक गांधीवादी पर्यावरणविद, जिसकी अंतर्दृष्टिï भविष्य के बजाय अतीत से अधिक प्रेरित होती है लेकिन वह आधुनिक वैज्ञानिक समाधानों के दौर में भी इतनी प्रासंगिक है। अगर अधिकांश भारतीयों के भाग्य का फैसला अभी भी मॉनसून की मेहरबानी पर ही निर्भर करता है तो काफी हद तक इसकी वजह यह भी है कि हमने जल संरक्षण के पंरपरागत तौरतरीकों को भुला दिया है।

 
मिश्र ने ऐसे ज्ञान को सहेजकर पुनर्जीवित करते हुए अपनी लेखनी में शालीन हास-परिहास के मिश्रण से उसे पेश किया। 'सिविल सोसाइटी' को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने तेजी से बढ़ते शहरों में गांवों से जल आपूर्ति की नादानी को लेकर परंपरागत तरीकों की प्रासंगिकता पर रोशनी डाली थी। उनके मुताबिक 'स्मार्ट सिटी' की परिभाषा में वही शहर माकूल बैठता है, जो अपने जल संसाधनों का कुशलता से प्रबंधन करता है। दिल्ली हवाई अड्डे का टी-3 टर्मिनल तकरीबन 10 तालाबों को ध्वस्त करके बनाया गया है और उसका एक दुष्परिणाम यह है कि मॉनसून के दौरान यहां अक्सर जल भराव हो जाता है। (चेन्नई हवाई अड्डा भी हाल में तकरीबन डूब गया था।) दूसरी ओर फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे को 15 साल पहले पानी के एवज में भारी हर्जाना चुकाने का आदेश दिया गया था, उसने जल संरक्षण की दीर्घकालिक योजनाएं बनाईं, आज वह पानी की जरूरत के पैमाने पर आत्मनिर्भर है। 
 
एक समय गुजरात के सूखा प्रभावित इलाकों में समंदर के रास्ते पानी पहुंचाया जाता था। फिर मराठवाड़ा के लातूर में रेलगाड़ी के जरिये भेजे गए पानी की तस्वीरें सभी के जेहन में ताजा हैं। मिश्र ने हालात को इस तरह बयां किया कि चूंकि हम वाइब्रेंट गुजरात से वाइब्रेंट इंडिया की ओर बढ़ चुके हैं तो एक दिन पानी भी शायद हवाई जहाज के जरिये पहुंचाया जाएगा। 
 
मिश्र ने बड़े विरोधाभास के तौर पर जैसलमेर जिले की मिसाल दी, जो रेगिस्तान में होने के बावजूद उन हालात से बच गया, जिनसे लातूर दो-चार हो रहा था। जैसलमेर ने उस परंपरागत ज्ञान का उपयोग किया। मसलन रेत के नीचे मौजूद जिप्सम नमी को व्यर्थ जाने से रोकता है। अगर आप रेत को थोड़ा उलीचें तो उसमें आपको नमी का अहसास होगा। हम आखिर कहां गलत रह गए? 1960 के दशक में दुनिया नई करवट ले रही थी और भाखड़ा नंगल बांध जैसे भीमकाय बांधों का निर्माण इस बुनियाद पर किया गया कि ऐसी परियोजनाओं के जरिये मॉनसून की अनिश्चितताओं से पार पाया जा सकता है और इस तरह हम वर्षा जल के संरक्षण के परंपरागत तौर तरीकों को भुलाते गए। 
 
राह से भटकने की एक और मिसाल 'मक्के की रोटी' मार्का पंजाब में नजर आती है, जिसने अपनी परंपरागत फसलों के बजाय गेहूं और धान जैसी फसलों (वह भी खराब गुणवत्ता वाली) का रुख कर लिया, जिनमें बेतहाशा पानी की जरूरत होती है और इसका नतीजा यही निकला कि पांच वर्षों के अंदर जमीन का सीना सूखता गया! पानी को लेकर लड़ाई की बानगी देखनी है तो जरा हरियाणा और पंजाब की नहर बनाने पर तल्खी को देखिए, जहां दोनों राज्यों और केंद्र में समान विचारों वाली सरकार के बावजूद समाधान दुश्वार है। 
 
सकारात्मक पहलुओं की बात करें तो मिश्र ने उल्लेख किया था कि जोधपुर में नए आईआईटी ने नगर निगम के पानी पर निर्भर होने के बजाय खुद 30 तालाब विकसित करने का निर्णय किया। बाढ़ की विभीषिका के समग्र विश्लेषण में भी मिश्र का ज्ञान बेजोड़ था। बिहार में अक्सर प्रलयंकारी बाढ़ की वजह बनने वाली कोशी नदी पर उन्होंनेे काफी अध्ययन किया था। वर्ष 2008 में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद उन्होंने कोशी के प्रवाह के नियंत्रण को इसका बड़ा कारण बताया था। भारत-नेपाल सीमा पर बांध कोशी के लिए अपेक्षित रूप से उपयोगी साबित नहीं हुआ। बाढ़ का अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन फिर भी वे अचानक से तबाही का सबब बनती हैं। अगर सरकार इलाके की जानकारी रखने वाले मल्लाहों और आबोहवा से वाकिफ लोगों को राहत कार्यों में लगाए तो यह महंगे हेलीकॉप्टर के जरिये मिलने वाली मदद से सस्ता और ज्यादा प्रभावी हो सकता है। पहले तमाम इलाकों में प्रचुर प्राकृतिक और मानव निर्मित गड्ढïे हुआ करते थे, जो बाढ़ के दौरान बचाने और सूखे में राहत दिलाने का सबब बनते थे। फिर कालांतर में अधिक से अधिक फसल उगाने के लिए वे काल के गाल में समाने लगे। मौजूदा दौर में जो बाढ़ आती है, उसकी रोकथाम के लिए ऐसे ठिकाने गायब हैं और बाढ़ सीधे मानव बस्तियों से टकराकर कोहराम मचाती है। सुविख्यात लेखक एवं इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' में मिश्र को समर्पित आलेख में उन्हें बौद्घिकता के दंभ से मुक्त बुद्घिजीवी करार दिया। गुहा ने उन्हें पूर्वग्रह की ग्रंथि से मुक्त सामाजिक कार्यकर्ता भी बताया। उनके शोध में वैचारिक प्रतिबिंब से अधिक जमीनी अनुभव ज्यादा समाहित था। संभवत: उनकी सबसे बड़ी थाती यही थी कि उन्होंने भविष्य में पानी को तेल से भी ज्यादा मूल्यवान बताया। 
 
मौजूदा दौर में नहर निर्माण से लेकर बांधों के अंबार तक पानी को लेकर होने वाले तमाम विमर्श में मिश्र का ज्ञान मूल्यवान साबित होगा। अगर आप इन मुद्दों से जुड़े फायदे और नुकसान का विश्लेषण करें तो बांधों के विरुद्घ उनका अभिमत अधिक प्रभावी होगा और पिछले 60 वर्षों के दौरान सिविल आभियांत्रिकी के दम पर बने बांध प्रश्नों के घेरे में आएंगे, जो मौजूदा दौर में अनुपयोगी से ज्यादा खराब हैं। 
Keyword: environment, anupam mishra, water, pond,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या अदालत से दूरसंचार फर्मों को मिलेगी मोहलत?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.