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महिला समानता से देसाई को मिलती है 'तृप्ति'
आदिति फडणीस /  December 25, 2016

अगर तृप्ति देसाई कुछ ठान लेती हैं तो उसे हासिल करके ही मानती हैं। 'भूमाता ब्रिगेड' की संस्थापक देसाई पत्नी, मां और महिला अधिकारों के लिए समर्पित कार्यकर्ता की तिहरी भूमिकाओं को बखूबी निभा लेती हैं। वह कहती हैं, 'हम महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।' भूमाता ब्रिगेड में कुछ पुरुष सदस्य भी हैं लेकिन इसका मुख्य भाग भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड ही है, जो महिलाओं से जुड़े मसले खासतौर से मंदिरों में लेकर उनके प्रवेश से जुड़े मुद्दों को जोर-शोर से उठाता है। संस्था के उपाध्यक्ष पुष्पक केवाडकर मोटर ड्राइविंग स्कूल चलाते हैं। दुर्गा शुक्रे होममेकर हैं। वहीं 22 वर्षीय प्रियंका जगताप महाराष्ट्र पुलिस सेवा आयोग परीक्षा की तैयारी कर रही हैं और संगठन की शुरुआत से ही उससे जुड़ी हैं। संगठन की खास कवायदों का खाका मुख्य रूप से यही चौकड़ी खींचती है। 

 
तमाम लोग देसाई को बखेड़ा खड़ा करने वाली शख्स भी मानते हैं। या फिर उनकी पहचान दत्ता सामंत या जॉर्ज फर्नांडिस जैसे मजदूर नेताओं जैसी बन रही है। उनकी मान्यताओं और विश्वास को कोई नहीं डिगा सकता और उनका मानना है कि महिलाएं बेरोकटोक कहीं भी जा सकती हैं। यह उनका भरोसा ही था कि उन्होंने महाराष्ट्र के अहमदनगर स्थित शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश को लेकर बीड़ा उठाया। देसाई को इसमें कोई तुक नहीं नजर आई कि पुरुष 11,000 रुपये अदा कर प्रवेश पा सकते हैं लेकिन महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। उनका कहना है, 'हम भी शनि भक्त हैं और हम भी सभी जातियों की महिलाओं के लिए पुरुषों सरीखे अधिकार ही चाहते हैं।' चित्रकूट के पुजारी राजकरण शर्मा कहते हैं, 'वह उन्मादी हैं।' 
 
शर्मा धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से भी बखूबी वाकिफ हैं और उन्हें मालूम है कि महिलाएं कौन-कौनसी रस्मों को अंजाम नहीं दे सकतीं। देसाई के अगले अभियान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, 'अब वह चाहती हैं कि महिलाएं भी कन्यादान करें।'छोटे बाल, जैकेट और कभी-कभार बिंदी लगाने वाली देसाई स्पष्टï रूप से साबित करती हैं कि वे अपनी किस्म की अनोखी महिला हैं। 
 
एक साक्षात्कारकर्ता से देसाई ने कहा, 'यह (मंदिरों में प्रवेश की मुहिम) धार्मिक नहीं बल्कि समानता के लिए है। वे कहते हैं कि उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं। आखिर उनकी धार्मिक भावनाएं कैसे आहत हो रही हैं? क्या हमने कभी ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाए? मगर ईश्वर तक पहुंच के मामले में हमें भी पुरुषों के बराबर अधिकार चाहिए।' यह पहला मौका नहीं है, जब देसाई तंत्र के खिलाफ जद्दोजहद कर रही हैं। इससे पहले वर्ष 2008 में एक कथित घोटाले को लेकर भी वह पवार परिवार द्वारा संचालित अजित सहकारी बैंक के खिलाफ भी मोर्चा खोल चुकी हैं। उस समय भी उन्हें जान से मारने जैसी धमकियां मिली थीं। इसी तरह शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की उनकी राह जरा भी आसान नहीं रही। 
 
उन्हें धक्कामुक्की और धमकियों का सामना करना पड़ा। मगर मुश्किलें भी कभी उनकी राह नहीं रोक पाईं। आखिरकार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को सार्वजनिक रूप से शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं को प्रवेश देने की वकालत करनी पड़ी। इसके बाद उनके संगठन का अगला लक्ष्य थी मुंबई में हाजी अली मस्जिद। हाजी अली दरगाह के आंतरिक भाग में भी महिलाओं के प्रवेश की मनाही थी। इस पर देसाई का संगठन मामले को उच्च न्यायालय में ले गया, जहां यह दलील दी गई कि महिलाओं का प्रवेश बाधित कर उनके मूल अधिकारों का मखौल उड़ाया जा रहा है। हाजी अली के बाद अब देसाई का अगला लक्ष्य है केरल का सबरीमाला मंदिर। उनका कहना है कि महिलाओं के लिए मंदिर का द्वार खोलने में खुद उसका ही भला है। हालांकि इसके लिए अभी तक उनके पास कोई ठोस योजना नहीं है।
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