बिजनेस स्टैंडर्ड - स्वतंत्र निदेशकों पर कई जिम्मेदारी मगर बयां कुछ और करती सच्चाई
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स्वतंत्र निदेशकों पर कई जिम्मेदारी मगर बयां कुछ और करती सच्चाई
इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  December 23, 2016

टाटा समूह की कंपनियों के स्वतंत्र निदेशक नुस्ली वाडिया ने हाल में जारी अपनी चि_िïयों में समूह के संचालन के तरीकों को लेकर कई सवाल उठाए हैं। आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं। इनमें रतन टाटा और उनके कई विश्वासपात्र सहयोगियों पर समूह से जुड़ी गोपनीय सूचनाएं लीक करने, कोरस के अधिग्रहण से टाटा स्टील के घरेलू कामकाज पर असर पडऩे और नैनो कार परियोजना की नाकामी जैसे आरोप भी हैं। दूसरी तरफ टाटा के सहयोगियों ने वाडिया पर अन्य स्वतंत्र निदेशकों के साथ मिलकर समूह के हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है। 

 
वाडिया ने अपने पत्रों में कहा है कि अतीत में रतन टाटा के कई फैसलों पर उन्हें एतराज रहा है। अगर यह मान लें कि टाटा और शीर्ष पदों पर बैठे अन्य लोगों ने वाडिया के साथ कई वर्षों तक गलत बरताव किया तो सवाल यह उठता है कि वह इतने वर्षों तक चुप क्यों बैठे रहे? आखिर, वाडिया स्वतंत्र निदेशक के तौर पर 1979 से टाटा स्टील, 1981 से टाटा केमिकल्स और 1998 से टाटा मोटर्स से जुड़े हुए हैं। ब्रिटिश इस्पात कंपनी कोरस का टाटा स्टील ने वर्ष 2007 में अधिग्रहण किया था और छोटी कार नैनो भी उसके एक साल बाद ही आई थी। 
 
अगर इन अहम फैसलों पर वाडिया को कड़ा एतराज था तो वह इन कंपनियों के निदेशक पद से इस्तीफा देकर कम-से-कम अपना विरोध तो दर्ज करा सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और टाटा की तरफ से हटाए जाने का नोटिस मिलने के बाद ही अपनी चुप्पी तोड़ रहे हैं। उनके इस कदम से उनकी 'स्वतंत्रता' का अहसास काफी हद तक हवा हो जाता है। इसके अलावा भारतीय कॉर्पोरेट जगत के तमाम दिग्गजों से दो-दो हाथ करने से बनी समुराई जैसी उनकी छवि पर भी चोट पहुंची है।
 
दरअसल वाडिया ने वर्ष 2012 में बिज़नेस स्टैंडर्ड को दिए एक साक्षात्कार में टाटा और उनके नैतिक मूल्यों के बारे में काफी अच्छी बातें कही थीं। यह देखना काफी विडंबनापूर्ण है कि अब वह उसी शख्स पर समूह से जुड़ी गोपनीय सूचनाएं लीक करने और कुप्रबंधन के आरोप लगा रहे हैं। उनकी सोच में आए बदलाव की वजह कोई भी नहीं जानता है लेकिन भारतीय कॉर्पोरेट जगत में सुनी जा रही सुगबुगाहट की मानें तो कई दशकों तक दोस्त और सहयोगी रहे टाटा और वाडिया के बीच यह दूरी उड्डïयन क्षेत्र की 5/20 नीति को लेकर पैदा हुई है। कहा जा रहा है कि दोनों पुराने दोस्त घरेलू विमानन कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करने की मंजूरी के मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ लामबंदी में लगे हुए थे। भारतीय कंपनियों के स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका को लेकर पैदा होने वाली समस्या का मूल यही है। कंपनियों के प्रवर्तक किसी को स्वतंत्र निदेशक के तौर पर केवल उसकी काबिलियत के आधार पर नहीं चुनते हैं, इसमें दोस्ताना संबंध और पुराने रिश्तों का भी खासा दखल होता है। यह महज संयोग नहीं है कि रतन टाटा भी वाडिया की कंपनी बॉम्बे डाइंग के बोर्ड में 33 साल तक निदेशक के तौर पर मौजूद रहे हैं।
 
टाटा और वाडिया के बीच संबंध काफी पुराने रहे हैं। जेआरडी टाटा ने बॉम्बे डाइंग की बिक्री सौदे को मुल्तवी करने में वाडिया की काफी मदद की थी। वाडिया के पिता नेविल वाडिया ने बॉम्बे डाइंग को आरपीजी समूह के हाथों बेचने के करार पर दस्तखत किए थे लेकिन जेआरडी की मदद से नुस्ली वाडिया ने अपनी कंपनी को बचा लिया। कुछ साल बाद ही वाडिया ने टाटा समूह की बोर्डरूम राजनीति में रतन टाटा का पक्ष लेकर इस एहसान का बदला चुका दिया। रूसी मोदी, दरबारी सेठ और अजित केरकर जैसे क्षत्रपों के खिलाफ टाटा को स्थापित करने में वाडिया का अहम योगदान रहा था। बहरहाल मामला जब तक दो दोस्तों के बीच ही सीमित रहता है, किसी को कोई दिक्कत नहीं होती है। लेकिन अगर कोई दोस्ती और संबंधों के आधार पर स्वतंत्र निदेशकों का पद देना शुरू कर दे तो उसमें सर्वाधिक नुकसान स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका का ही होता है। स्वतंत्र निदेशक को बोर्ड के भीतर वस्तुनिष्ठता लाने, अल्पांश शेयरधारकों के हितों की रक्षा करने और जोखिम प्रबंधन की हालत सुधारने की जिम्मेदारी होती है। पर सच्चाई यह है कि भारत में शायद ही ऐसा होता है।
 
कुछ कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक कई दशकों तक अपने पद पर बने रहते हैं जबकि कुछ लोग कई कंपनियों के बोर्ड में शामिल होते हैं जिसकी वजह से प्रबंधन के फैसलों की सही तरह से समीक्षा करने की उनकी क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है। कंपनी के संस्थापक या बहुलांश शेयरधारक भी कंपनी के बेहतर प्रशासन की इच्छाशक्ति कम ही दिखाते हैं जिससे स्वतंत्र निदेशकों की कार्यप्रणाली भी प्रभावित होती है। सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज के मामले में कुछ ख्यातिनाम लोगों ने बोर्ड के फैसले से खुद को अलग करने की कोशिश की थी लेकिन किंगफिशर एयरलाइंस, रैनबैक्सी लैबोरेटरीज और एस कुमार्स के मामलों में इसे देखा जा चुका है। ऐसे ही कई और उदाहरण भी हैं। 
 
अधिकतर स्वतंत्र निदेशक बड़े शेयरधारकों या प्रवर्तकों के खिलाफ जाने को तैयार नहीं होते हैं क्योंकि उनकी नियुक्ति इन लोगों ने ही की होती है। कुछ लोग तो बैठकों में शामिल होने पर मिलनी वाली रकम और लाभ पर मिलने वाले कमिशन जैसे फायदों के चलते खुद को प्रवर्तकों के प्रति आभारी मानते हैं। एक बड़ा हिस्सा तो उन लोगों का है जो पूरी ताकत के साथ अपनी असहमति न जताने वाली संस्कृति के अभ्यस्त हो चुके हैं। वे इस बात को लेकर भी दुविधा में होते हैं कि उनकी आलोचना को किस तरह से देखा जाएगा?
 
ए टी कियर्नी, एजेडबी ऐंड पार्टनर्स और हंट पार्टनर्स के एक अध्ययन से पता चला कि सर्वे में शामिल 90 फीसदी कंपनियों ने स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति अपने चेयरमैन या मुख्य कार्याधिकारी के सुझावों पर की है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस तरह से नियुक्त किए गए स्वतंत्र निदेशक कठोरता दिखाने या सिद्धांत पर टिकने के बजाय बड़े शेयरधारकों को लचीले और सहयोगी तरीके से ही नियंत्रित करना पसंद करते हैं। 
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