बिजनेस स्टैंडर्ड - बॉक्स ऑफिस का दंगल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, August 14, 2022 05:32 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम जिरह खबर

बॉक्स ऑफिस का दंगल
रंजीता गणेशन और ध्रुव मुंजाल /  12 19, 2016

दंगल के मंगल की उम्‍मीद

लंबे इंतजार के बाद आमिर खान एक बार फिर पर्दे पर दस्तक देने वाले हैं। एक पिता के जज्बे और बेटियों को अलग मुकाम दिलाने की जिद पर आधारित फिल्म से लगी हैं ढेरों उम्मीदें

बिजनेस स्टैंडर्ड बॉक्स ऑफिस का दंगलफिल्म निर्देशक नितेश तिवारी को बेसब्री से 23 दिसंबर का इंतजार है। उस दिन उनकी फिल्म दंगल रिलीज होने वाली है। इस साल की बहुप्रतीक्षित फिल्मों में शुमार दंगल के अच्छे प्रदर्शन का इंतजार एक और शख्स को भी है। वह हैं इस फिल्म के नायक आमिर खान। लेकिन अब तक दर्जनों सफल फिल्में दे चुके आमिर इस फिल्म के भविष्य को लेकर इस कदर परेशान हो गए हैं कि उन्होंने सिगरेट के कश लगाने भी शुरू कर दिए हैं। मीटिंग रूम के बाहर फैले सिगरेट के धुएं के बारे में सफाई देते हुए नितेश कहते हैं, 'वह केवल अपनी फिल्म की रिलीज के पहले ही सिगरेट पीते हैं।'

हरियाणा के गांव के एक अधेड़ पहलवान की जिंदगी पर आधारित इस खेल-केंद्रित फिल्म के बढिय़ा प्रदर्शन की हर कोई उम्मीद कर रहा है। फिल्म जगत भी यह मानकर चल रहा है कि बड़े बजट वाली इस फिल्म का दर्शकों का भरपूर प्यार मिलेगा। चुनिंदा फिल्में करने के लिए मशहूर आमिर की यह फिल्म दो साल बाद आ रही है। फिल्म की रिलीज में अब चंद दिन ही बचे हैं लेकिन अब तक इसके संपादन का काम पूरा नहीं हो पाया है। आमिर के कार्टर रोड स्थित आवास में बने संपादन कक्ष में फिल्म को अंतिम रूप देने में लोग जोर-शोर से लगे हैं। इसके बारे में पूछे जाने पर नितेश कहते हैं, 'आप लोग तो जानते ही हैं कि रचनात्मक लोग कभी अपने काम से संतुष्ट नहीं होते हैं।' नितेश की तरह इस फिल्म के लेखक पीयूष गुप्ता, श्रेयस जैन और निखिल मेहरोत्रा भी विज्ञापन जगत से ही ताल्लुक रखते हैं और सभी लिओ बर्नेट के पूर्व छात्र हैं। 

फिल्म स्टूडियो डिज्नी इंडिया ने इस फिल्म की कहानी के साथ 2012 में तिवारी से संपर्क साधा था। लेकिन इसके लिए आमिर की सहमति हासिल करने में लंबा समय लग गया। इस बीच नितेश ने जमीनी तैयारी करने के लिए हरियाणा के उस गांव का रुख किया जहां की कहानी वह फिल्माने जा रहे थे। वहां पर उनकी मुलाकात फोगट परिवार के मुखिया महावीर सिंह और उस घर की लड़कियों से हुई। नितेश ने महावीर सिंह, उनकी पत्नी दया कौर, बेटियों और भतीजियों से बात कर उनकी जिंदगी के पन्नों को सिनेमाई कैनवस में उतारने की कोशिश शुरू की।

नितेश ने सगी बहनों गीता फोगट और बबीता फोगट से भी मुलाकात की जो पटियाला के खेल संस्थान में प्रशिक्षण ले रही थीं। उस संस्थान के हॉस्टल में पुरुषों का प्रवेश वर्जित था लिहाजा तिवारी को गीता और बबीता से कैंटीन में ही बैठकर बात करनी पड़ती थी। नितेश ने उनके कोच से भी यह जानने की कोशिश की कि दोनों लड़कियां किस तरह से कुश्ती के मैदान में पसीना बहाती हैं? नितेश ने उनके जिम और प्रशिक्षण मैदान का भी चक्कर लगाया। मकसद सिर्फ यही था कि उन बहनों के संघर्ष और मेहनत को करीने से फिल्म के पर्दे पर उतारा जा सके। नितेश कहते हैं, 'इंटरनेट से मुझे उस परिवार के बारे में हल्की-फुल्की जानकारी ही मिल पाई थी। लेकिन उन लोगों से मिलने के बाद मुझे लगा कि इस कहानी में बहुत ही गहराई है और बहुत अच्छी स्क्रिप्ट की संभावना दिखी।' उनकी यह फिल्म संघर्ष से भरे उस जज्बे पर आधारित है जिसके दम पर पुरानी सोच रखने वाले इलाके में रहते हुए भी इन लड़कियों ने पहलवानी के क्षेत्र में अपना मुकाम बनाया और पूरे देश का नाम रोशन किया।

भिवानी जिले में फोगट परिवार का नाम आज घर-घर मशहूर हो चुका है। फोगट परिवार से मिलने के लिए उनके गांव बलाली जाते समय हमें इसका बखूबी अहसास हुआ। रास्ते में हमने फल बेचने वाले एक दुकानदार से बातचीत में जैसे ही फोगट का नाम लिया, उसने ठेठ हरियाणवी अंदाज में कहा, 'आप पहलवान फोगट परिवार के बारे में पूछ रहे हैं? यहां से आदमपुर जाकर आप दाहिने मुड़ जाना और करीब 2 किलोमीटर दूर जाने के बाद सड़क के बाएं तरफ उनका घर नजर आएगा।'

बलाली उत्तर भारत के किसी भी आम गांव की तरह ही दिखाई देता है। टूटी-फूटी सड़कें वैसे ही धूल से भरी हुई हैं और गलियों में भैंसों को लोगों के साथ चहलकदमी करते हुए कभी भी देखा जा सकता है। नालियों का पानी रास्ते पर फैला होता है और घरों की दीवारें बदरंग हो चुकी होती हैं। बलाली भी काफी कुछ दूसरे गांवों की ही तरह है। लेकिन फोगट परिवार का घर थोड़ा अलग दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि दीवार पर हाल ही में पेंट हुआ है और फर्श पर लगी टाइल्स भी बढिय़ा किस्म की है। घर की रखवाली का जिम्मा भी एक तंदुरुस्त कुत्ते के हवाले है। 

बिजनेस स्टैंडर्ड बॉक्स ऑफिस का दंगललेकिन वहां पहुंचने पर पता चला कि महावीर फोगट तो घर पर मौजूद ही नहीं हैं। उनकी सबसे छोटी बेटी संगीता फोगट बताती हैं कि अचानक ही उनके पापा को आमिर खान से मिलने के लिए मुंबई जाना पड़ा है। संगीता अपनी बाकी बहनों की ही तरह एक पहलवान हैं और काफी हद तक बड़ी बहनों बबीता और ऋतु की ही तरह दिखाई देती हैं। छोटे बालों वाली संगीता टी-शर्ट और ट्रैक पैंट पहने हुए थीं। उनसे बात करने पर लगा कि फिल्म की रिलीज को लेकर परिवार भी काफी उत्साहित है। 

परिवार की सबसे छोटी बेटी संगीता को अब भी वह दिन बखूबी याद है जब वह आमिर खान से पहली बार मिली थीं। वह कहती हैं, 'उनसे मिलकर मुझे लगी ही नहीं कि वह इतने बड़े स्टार हैं। वह काफी जमीन से जुड़े हुए आदमी लगे।' संगीता कहती हैं कि जब उनके परिवार के बारे में फिल्म बनाने की बात पता चली थी तो वह सपने जैसा लगा था। डिज्नी इंडिया के क्रिएटिव टीम की सदस्य दिव्या राव ने साल 2012 में फोगट परिवार से संपर्क साधा था। जब हमने संगीता के पिता से फोन पर बातचीत की तो उन्होंने भी इसका जिक्र किया। उन्होंने कहा, 'मैंने तत्काल डिज्नी इंडिया के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। मैं चाहता था कि अधिक से अधिक लोग इस कहानी से परिचित हों। यह केवल खेल की कहानी नहीं है, इसका ताल्लुक इस बात से भी है कि हम अपने देश में लड़कियों को कितनी अहमियत देते हैं।'

बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान ने महावीर फोगट की चाल-ढाल और बोलचाल को सही तरह से समझने के लिए उनके साथ अच्छा-खासा वक्त भी गुजारा। आमिर यह समझने की कोशिश करते रहे कि आखिर उस शख्स के दिमाग में क्या चल रहा था कि उसने परंपरागत तौर पर पुरुषों का खेल माने जाने वाले कुश्ती में अपनी दो बेटियों को विश्व स्तर का खिलाड़ी बना दिया। फोगट ने अपने गुरु चंदगीराम के अखाड़े से मिली सीख को जिंदगी में उतारने की कोशिश की। वह कहते हैं, 'मास्टरजी ने मुझे समझाया कि मेरी बेटियां भी मेरी खुशी की वजह बन सकती हैं। मुझे अहसास हुआ कि लड़कियां भी खेलों में मुकाम बना सकती हैं। उसके बाद से सब बदल गया।' वर्ष 1970 के एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता चंदगीराम संभवत: पहले ऐसे कुश्ती गुरु थे जिन्होंने अपने अखाड़े को लड़कियों के लिए भी खोला। 

फोगट परिवार के घर के पास में अब भी वह अखाड़ा मौजूद है जहां पर सभी लड़कियों ने कई साल में खूब पसीना बहाया है। यह सिलसिला कामयाबी और शोहरत मिलने के बाद भी बदस्तूर जारी है। अब भी फोगट अपने शिष्यों के साथ इस अखाड़े की मिट्टïी में दांव आजमाते हुए नजर आ जाते हैं। इतने साल बाद भी उनकी सख्ती में कोई कमी नहीं आई है।

संगीता कहती हैं, 'वह बहुत सख्त हैं। जब हमलोग छोटे थे तो हमारी अक्सर पिटाई हुआ करती थी। सबसे ज्यादा मार गीता दीदी को पड़ती थी। वह आलस दिखाती थीं और पापा को यह पसंद नहीं था। कभी-कभी वह सीढ़ी पर तीन बार चढऩे को कहते तो गीता दीदी दो बार ही करती थीं। उसके बाद तो मानो तूफान ही आ जाता था।'

हालांकि फोगट के लिए अपनी बेटियों और भतीजियों को पहलवानी के मैदान में उतारना आसान नहीं रहा है। हरियाणा के पुरुषवादी समाज में महिलाएं आम तौर पर घूंघट की ओट में ही रहती हैं और पुरुषों से बातचीत में भी काफी संकोच दिखाती हैं। इस माहौल में फोगट का अपने घर की लड़कियों को कुश्ती के लिए तैयार कर पाना काफी मुश्किल रहा। संगीता के शब्दों से उस जद्दोजहद की एक झलक मिल सकती है। संगीता कहती हैं, 'हम अक्सर शॉट्र्स पहनते थे जिन्हें देखकर गांववाले हम पर ताने कसते थे। लेकिन पापा ने हमें कभी भी नहीं रोका। उन्होंने हमेशा यही सिखाया कि इस तरह की बातों पर ध्यान न दें।'  

फोगट बहनों के लिए एक मुश्किल यह भी थी कि उन्हें कुश्ती के दांवपेच आजमाने के लिए कोई महिला पहलवान ही नहीं मिलती थी। ऐसे में उनके पिता ने अपनी लड़कियों को स्थानीय स्तर पर होने वाले कुश्ती मुकाबलों में लड़कों के खिलाफ उतारना शुरू कर दिया। उनका हौसला इस बात से भी बढ़ता गया कि फोगट बहनें लड़कों के खिलाफ कुश्ती लडऩे के बाद भी अक्सर जीत दर्ज करने में कामयाब हो जाती थीं। कभी-कभी तो आयोजक इन लड़कियों को दंगल में लड़कों के खिलाफ उतरने की इजाजत भी नहीं देते थे। 

गीता 2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहीं। उनकी बहन बबीता भी चार साल बाद ग्लास्गो में हुए पिछले राष्ट्रमंडल खेलों में अपनी बहन गीता के नक्शेकदम पर चलते हुए पदक जीतने में सफल रहीं। इन सुनहरी कामयाबियों के बाद ही गांववालों ने फोगट परिवार के संघर्ष को दिल से स्वीकार किया। फोगट कहते हैं, 'संघर्ष के दिनों ने लड़कियों को शारीरिक और मानसिक तौर पर काफी मजबूत बनाया। उन पलों ने लड़कियों को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। देखिए, आज वे कहां पहुंच गई हैं?'

जहां तक फिल्म दंगल का सवाल है तो इसे तैयार करने में काफी संयम और समय लगा है। पूरी प्रोडक्शन यूनिट ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। डिज्नी इंडिया के साथ खुद आमिर भी इसके निर्माण से जुड़े हुए हैं। तिवारी बताते हैं कि फिल्म की कहानी लिखते समय कोई तय सीमा नहीं रखी गई थी। जब तक पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो गए, लिखने का काम चलता रहा। इस दौरान इसका भी ख्याल रखा गया कि कहीं कथानक अधिक बोझिल न हो जाए। इसके लिए फिल्म में थोड़े हल्के-फुल्के पल भी रखे गए। इस चक्कर में तिवारी और लेखकों की टीम को विज्ञापन एजेंसी का काम निपटाने के बाद रात तक जागना पड़ता था।

दंगल में खास तौर पर फोगट परिवार की दो बड़ी बेटियों की कहानी दिखाई जाएगी। हालांकि फिल्म के निर्देशक नितेश तिवारी की व्यक्तिगत पसंद वाला किरदार इस परिवार की साज-संभाल करने वाली इन लड़कियों की मां हैं। फिल्म में मशहूर टेलीविजन स्टार साक्षी तंवर ने इस किरदार को जीवंत किया है। नितेश  उस महिला के संघर्ष को कुछ इस तरह से बयां करते हैं, 'जब कोई पुरुष कोई ऐसा काम करता है जो समाज को नागवार गुजरे तो उसकी पत्नी को ही सबसे ज्यादा सहना पड़ता है। आखिर किसी पहलवान के मुंह पर तो कोई उसकी आलोचना करेगा नहीं।'

कहानी और स्क्रिप्ट तैयार होने के बाद अगली चुनौती सही लोकेशन के तलाश की थी। कहानी भले ही हरियाणा के गांव की है लेकिन प्रोडक्शन टीम ने शूटिंग के लिए पंजाब को चुना। दरअसल इस टीम का मानना था कि शूटिंग का भारी-भरकम सामान ले जाने और सुरक्षा के भी लिहाज से हरियाणा की तुलना में पंजाब बेहतर विकल्प था। इसके लिए छह गांवों को एक ही गांव का लुक दिया गया। दरअसल किसी गांव में अच्छा स्कूल था तो किसी गांव के खेत काफी सुंदर थे तो कहीं पर बाजार अच्छा लगता था। 

जहां तक फि ल्म के कलाकारों के चयन का सवाल है तो कास्टिंग टीम ने राष्ट्रीय स्तर की कई खिलाडिय़ों का ऑडिशन लिया। लेकिन उनमें से कोई भी फोगट परिवार की लड़कियों के लिए नहीं चुना जा सका। इन किरदारों के लिए आखिरकार पेशेवर कलाकारों को ही चुना गया लेकिन फिल्म में प्रतिद्वंद्वी खिलाडिय़ों के किरदार के लिए पेशेवर पहलवानों को मौका दिया गया। जब इन पेशेवर पहलवानों से यह पूछा गया कि कलाकारों को प्रशिक्षित करने के लिए सबसे अच्छा कौन होगा तो उन्होंने एकसुर में इंदौर के कृपाशंकर बिश्नोई का नाम लिया। बिश्नोई खुद भी काफी अच्छे पहलवान रहे हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक भी जीत चुके हैं। 

जब बिश्नोई को आमिर के प्रोडक्शन हाउस के दफ्तर में मुलाकात के लिए बुलाया गया था तो वह फिल्म के बारे में किए गए गहरे रिसर्च को देखकर हैरत में पड़ गए। फिल्म में इसका पूरा ख्याल रखा गया था कि कुश्ती के दृश्य कहीं से भी फिल्मी न लगें। बिश्नोई ने कहा, 'यह कहीं से भी फिल्मी कुश्ती नहीं होने जा रही थी। मुझे अहसास हो गया कि कुश्ती के दृश्य फिल्माए जाते समय सभी नियमों का विधिवत पालन किया जाए।' इसके साथ ही उन्होंने कलाकारों के लिए लगभग उसी तरह का ट्रेनिंग शेड्यूल और रूटीन तय किया जो पेशेवर पहलवानों के लिए मुकर्रर किया जाता है।

करीब नौ महीनों तक इन कलाकारों का पेशेवर पहलवानों की तरह ट्रेनिंग का सिलसिला चला। इस दौरान उन्हें चोटें भी लगीं और एक कलाकार की तो हड्डïी ही टूट गई। हाल ही में रियो डी जनेरो में हुए ओलंपिक खेलों के दौरान कुश्ती के मुकाबलों को देखने से भी कलाकारों को इस खेल से जुड़ी बारीकियों का अहसास हुआ। बिश्नोई की मानें तो इस फिल्म के कई कलाकार तो इतनी तैयार हो गई हैं कि वे राष्ट्रीय चैंपियनशिप में पदक भी जीत सकती हैं। अब तो सभी को अपनी मेहनत का नतीजा देखने का इंतजार है। 

तब और अब

बिजनेस स्टैंडर्ड बॉक्स ऑफिस का दंगलदंगल में आमिर खान की भूमिका कई मायनों में खास है। महावीर सिंह फोगट का किरदार निभाने के लिए उन्हें अपना वजन करीब 25 किलोग्राम तक बढ़ाना पड़ा। वैसे जब आमिर के सामने इस किरदार का प्रस्ताव आया था तो निर्देशक तिवारी ने उन्हें वजन बढ़ाने के बजाय बॉडी सूट पहनने का सुझाव भी दिया था। लेकिन आमिर तो अपने काम को पूरी शिद्दत से करने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में भला वह बॉडी सूट पहनने के लिए कैसे तैयार होते? उन्होंने स्वास्थ्य पर खतरे को भी नजरअंदाज करते हुए कम समय में ही वजन बढ़ाने का फैसला किया और इसके लिए हर तरीका आजमाया। पिछले साल फिल्म की शूटिंग शुरू होने के पहले जब बिज़नेस स्टैंडर्ड ने उनका साक्षात्कार लिया था तो उस दौरान वह पूरे समय खाने-पीने में ही लगे रहे।

इन कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि फिल्म की शूटिंग शुरू होने के समय तक अच्छी-खासी तोंद निकल चुकी थी। लेकिन थोड़े समय में ही 25 किलोग्राम तक वजन बढ़ाने का असर यह हुआ कि आमिर को सांस लेने में दिक्कत होने लगी। उस समय के वीडियो देखने से पता चलता है कि वजन बढऩे के बाद आमिर की चाल-ढाल और खड़े होने का अंदाज भी बदल गया था। अगली चुनौती यह थी कि आमिर को बढ़े हुए शरीर के साथ ही कुश्ती की ट्रेनिंग भी लेनी थी। आमिर ने अपने किरदार के युवावस्था वाले दृश्यों की शूटिंग बाद में करने का फैसला किया था।

इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि अगर वह बाद में युवा महावीर के दृश्य फिल्माएंगे तो उन्हें अपना वजन कम करने के लिए एक तय मकसद मिला होगा। इस पूरी प्रक्रिया में ट्रेनर राहुल भट्ट और खान-पान विशेषज्ञ निखिल धुरंदर लगातार आमिर के साथ लगे रहे। कभी-कभी तो आमिर छह घंटों तक जिम में पसीना बहाते थे। इसके साथ ही खाने-पीने के सामान में भी काफी बदलाव लाया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ ही महीने में आमिर के शरीर में चर्बी की मात्रा 38 फीसदी से घटकर 9 फीसदी पर आ गई और पेट पर लटकता हुआ मांस सख्त मांसपेशियों में तब्दील हो गया। इस फिल्म में आमिर की पत्नी का किरदार निभा रहीं साक्षी तंवर भी उनसे प्रेरित होकर वजन कम करने के मिशन में लग गई थीं।

Keyword: film, movie, bollywood, dangal,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 बिजली वितरण में बदलाव से उपभोक्ताओं को होगा फायदा
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.