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भारतीय उद्योग जगत 2008 जैसी आर्थिक मंदी से निपटने में नहीं सक्षम
कृष्ण कांत / मुंबई November 28, 2016

कॉरपोरेट जगत और बैंक प्रमुख अनुपातों के आधार पर 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट जैसी आर्थिक मंदी से निपटने के लिहाज से कम तैयार हैं।  कॉरपोरेट डेट-इक्विटी स्तर फिलहाल 2007-08 के मुकाबले दोगुना है जबकि 2015-16 के दौरान कॉरपोरेट जगत का मुनाफा आरओई के आधार पर वित्त वर्ष 2008 की तुलना में आधा था। कर्ज चुकाने की क्षमता से भी इसी तरह के रुझान का पता चलता है। बीएसई 500 सूचकांक की एक्स-फाइनैंशियल कंपनियों ने वित्त वर्ष 2016 में 11.5 फीसदी का आरओई दर्ज किया जो वित्त वर्ष 2008 में दर्ज 22.1 फीसदी की तुलना में काफी कम है।
बैंक भी वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की तुलना में फिलहाल ज्यादा खराब स्थिति में हैं। अपनी 8 फीसदी की अग्रिमों पर बैंक के गैर-निष्पादित ऋण वित्त वर्ष 2008 की तुलना में 3.5 गुना हैं जबकि फंसे कर्ज वित्त वर्ष 2016 के दौरान वित्त वर्ष 2008 के आंकड़े की तुलना में 11 गुना पर थे।
वित्त वर्ष 2016 के अंत में देश के शीर्ष 40 सूचीबद्घ बैंकों के फंसे कर्ज 5.8 लाख करोड़ रुपये पर थे जबकि वित्त वर्ष 2008 के अंत में यह आंकड़ा महज 51,000 करोड़ रुपये था। विश्लेषकों का कहना है कि कंपनियों को हाल के वर्षों में घरेलू कर्जदारी में भारी तेजी के नकारात्मक असर का सामना करना पड़ सकता है। कुल घरेलू कर्जदारी मार्च 2008 के बाद से तीन गुना बढ़कर वित्त वर्ष 2016 के अंत में लगभग 20 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई जबकि वित्त वर्ष 2008 के अंत में यह आंकड़ा 6.3 लाख करोड़ रुपये था। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) से ऋण समेत खुदरा ऋण वित्त वर्ष 2016 में निजी खर्च योग्य आय के 19.4 फीसदी पर दर्ज किए गए जबकि वित्त वर्ष 2008 के दौरान यह आंकड़ा सैम्पल के तौर पर शामिल कंपनियों के लिए 16.2 फीसदी पर और वित्त वर्ष 2010 में 14.2 फीसदी पर था।
इस वजह से परिवार हाल के समय में किसी भी समय की तुलना में अब अपनी खर्च योग्य आय का बड़ा हिस्सा कर्ज (ईएमआई) चुकाने पर अधिक खर्च कर रहे हैं। इस परिदृश्य में आर्थिक मंदी से आय में गिरावट या रोजगार को नुकसान से उपभोक्ता मांग में बड़ी कमी आ सकती है और साथ ही बैंकों के लिए फंसे कर्ज की समस्या बढ़ सकती है।
कुल पारिवारिक कर्ज काफी अधिक हो सकता है, क्योंकि हमारे सैम्पल में सिर्फ उन एनबीएफसी की ऋण बुक को शामिल किया गया है जो बीएसई-500 कंपनियों का हिस्सा हैं और इसमें वाहन निर्माताओं की स्वयं की फाइनैंसिंग इकाइयों समेत गैर-सूचीबद्घ एनबीएफसी को अलग रखा गया है।
डेट-इक्विटी अनुपात, ब्याज कवरेज अनुपात और इक्विटी पर प्रतिफल की गणना बीएसई 500 में शामिल 389 कंपनियों के लिए की गई है जिनमें बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अलग रखा गया है। गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) के संदर्भ में बैंकिंग सेक्टर का आंकड़ा 40 शीर्ष सूचीबद्घ बैंकों का है। घरेलू ऋण में लोगों के लिए बैंकों और एनबीएफसी द्वारा आवास ऋण, वाहन ऋण, संपत्ति पर ऋण, क्रेडिट कार्ड ऋण, शैक्षिक ऋण, स्वर्ण ऋण जैसे रिटेल ऋण शामिल हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि नोटबंदी की वजह से आगामी तिमाहियों में कॉरपोरेट जगत के मुनाफे में कमी आती है तो कॉरपोरेट और घरेलू कर्जदारी को लेकर कॉरपोरेट इंडिया और बैंकों पर बड़ा नकारात्मक असर पड़ सकता है।

Keyword: Corporate, banks, slowdown,
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