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बदलती जरूरत के मुताबिक करनी होगी परमाणु सिद्धांत की समीक्षा
दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  November 28, 2016

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने गत 11 नवंबर को परमाणु हथियारों के पहले इस्तेमाल नहीं करने की भारतीय नीति को केवल कालभ्रम करार दिया। भारतीय परमाणु सिद्धांत का महत्त्वपूर्ण प्रावधान है कि भारत कभी भी अपने दुश्मन पर पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा और व्यापक विनाश के हथियारों के हमले की जद में आने पर ही इसका इस्तेमाल किया जाएगा। रक्षा मंत्री के मुताबिक यह केवल एक भ्रम है। उन्होंने कहा, 'मुझे क्यों मानना चाहिए कि मैं इन हथियारों का पहले इस्तेमाल नहीं करने जा रहा?'
उनके मंत्रालय ने इस विचार को उनकी व्यक्तिगत राय बताया। अमेरिका के सामरिक विशेषज्ञों विपिन नारंग और क्रिस क्लैरी ने अपने एक लेख में कहा कि इस बयान से भारतीय परमाणु नीति को लेकर असमंजस पैदा हुआ है। उनका मानना है कि इसके चलते भविष्य में कभी कोई दुश्मन यह मानकर भारत पर परमाणु हमला कर सकता है कि कहीं भारत उस पर पहले परमाणु हथियारों का प्रयोग न कर दे। दोनों विशेषज्ञों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बारे में सार्वजनिक बयान देकर परमाणु हथियारों के पहले इस्तेमाल न करने पर बने संदेह को दूर कर देना चाहिए। हालांकि भारत के रूढि़वादी टिप्पणीकार भरत कर्नाड ने पर्रिकर के बयान से बनी अनिश्चितता का स्वागत किया है। कर्नाड ने पश्चिमी देशों के परमाणु अप्रसार कार्यकर्ताओं पर भारत के विकल्प सीमित करने की कोशिश का आरोप भी लगाया है। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने कहा कि परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति की तीन बार की समीक्षा के बाद भी इसमें बदलाव की कोई जरूरत नहीं महसूस की गई है। भारत को यह भी भरोसा है कि अगर चीन जैसे ताकतवर पड़ोसी से कभी उसे व्यापक युद्ध में उलझना पड़ा तो वह पारंपरिक तरीकों से ही उसका सामना करने में सक्षम है।
पारंपरिक युद्ध के तमाम मानकों पर पाकिस्तान की तुलना में ताकतवर होने और परमाणु क्षमता से लैस होने के बावजूद भारत की सुरक्षा लगातार सीमापार आतंक की चपेट में आती रही है। पाकिस्तान कश्मीर के अलगाववादी उपद्रवियों को समर्थन भी देता रहा है। आखिर भारत की पारंपरिक एवं नाभिकीय सुरक्षा व्यवस्था में ऐसी कौन-सी खामी है कि लगातार ऐसा हो रहा है? इस संदर्भ में देखें तो परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति की भारत के लिए खास प्रासंगिक नहीं दिखती है।
भारत के परमाणु सिद्धांत पर बुनियादी एतराज इस बात को लेकर है कि ये परमाणु हथियार लड़ाई के लिए नहीं बल्कि दुश्मन को डराने के लिए हैं। इसी सोच से इन हथियारों का अपने दुश्मन पर पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति जन्म लेती है जिससे न केवल स्थिर डेटरेंस को संस्थागत आधार मिलेगा बल्कि भारत नैतिक रूप से भी उच्च धरातल पर खड़ा रहेगा। भारत विश्व स्तर पर परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग करता रहा है जिससे हमारे राजनयिकों को जिनेवा, वियना और न्यूयॉर्क के मंचों पर भाषण देते समय उच्च नैतिक स्तर हासिल होता है। लेकिन इस सिद्धांत की वजह से सेना प्रमुखों को पारंपरिक जंग की तैयारी से ही मतलब रखने को कहा जाता है और इन हथियारों का जखीरा उनके नियंत्रण से बाहर भी रखा गया है।
भारत के पास एक परमाणु सिद्धांत तो है लेकिन ऐसी परमाणु रणनीति नहीं है जिसमें इसका स्पष्ट प्रावधान हो कि इनका इस्तेमाल किस तरह से किया जाना है। रणनीति के अभाव में भारत बाहरी और अविश्वसनीय खतरे की स्थिति में मुंहतोड़ जवाब देने की धमकी देता रहता है। माना जाता है कि भारत के पास करीब 100 परमाणु हथियार हैं और व्यापक विनाश वाले किसी भी हथियार के इस्तेमाल की सूरत में भारत उनका खुलकर इस्तेमाल करेगा। लेकिन भारत के दोनों संभावित हमलावरों चीन और पाकिस्तान के पास दोबारा हमला बोलने की क्षमता होने से भारतीय ठिकानों पर परमाणु हमले जारी रह सकते हैं। इसका मतलब है कि नाभिकीय विध्वंस की स्थिति में भारत को भी उतना ही नुकसान उठाना पड़ेगा जितना दुश्मन उठाएंगे।
यह अकल्पनीय सिद्धांत भारत को सुरक्षा नहीं प्रदान कर पाया है। पाकिस्तान स्थित जिहादी आतंकी संगठन अब भी भारत में हमलों को अंजाम दे रहे हैं। वे भारतीय युवाओं को बरगलाकर अपने साथ शामिल कर रहे हैं और उन्हें हथियारबंद कर रहे हैं। पाकिस्तान के आतंकी संगठन कश्मीर के भीतर अलगाववादी उपद्रव को खुलकर समर्थन दे रहे हैं और खालिस्तानी अलगाववादियों को भी उकसाने में लगे रहते हैं। इतने लंबे समय तक सुरक्षा चुनौतियां बनी रहने के बाद दूसरे देश में तो अपनी पारंपरिक और नाभिकीय सुरक्षा नीतियों की समीक्षा की जाती।
अब जरा पाकिस्तान के नाभिकीय सिद्धांत से तुलना कीजिए जो कम-से-कम सामरिक नजरिये से तर्कसंगत तो है। पारंपरिक सैन्य शक्ति में भारत से मुकाबला नहीं कर पाने की सीमितता को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों को प्रश्रय देने और परमाणु हथियारों की तैनाती जैसी रणनीति अपनाई है। अगर भारत के किसी सैन्य कदम से पाकिस्तान को गंभीर खतरा महसूस होगा तो वह बिना देर किए परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का कदम उठाने के बारे में सकता है।
पर्रिकर और भारतीय सेना के प्रमुखों को यह ध्यान में रखना होगा कि परमाणु हथियार का पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति को लेकर धमकियां देने जैसे कदमों से ही बात नहीं बनेगी। भारतीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती तो पाकिस्तान की शह पर आतंक फैला रहे जिहादी समूहों को एक तय समय के भीतर दंडित करने की है। यह कार्रवाई सितंबर में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक से कहीं अधिक तीव्र और गंभीर होनी चाहिए। भारत को अपने परमाणु सिद्धांत की हरेक चार-पांच साल में समीक्षा करनी होगी ताकि उसे उसे समय के साथ बदलती हुई सामरिक जरूरत के मुताबिक ढाला जा सके।

Keyword: defence minister, atomic weapons, indian policy,
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