बिजनेस स?टैंडर?ड - 'नोटबंदी से कुछ राजनीतिज्ञ ही होंगे प्रभावित'
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'नोटबंदी से कुछ राजनीतिज्ञ ही होंगे प्रभावित'
मानवी कपूर /  11 27, 2016

बीएस बातचीत

बिजनेस स?टैंडर?ड हालांकि सरकार की नोटबंदी की पहल को काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' के तौर पर सराहा गया है, लेकिन राजनीतिक वित्त पोषण का सवाल बरकरार है। ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां नकद में चंदा स्वीकार करती हैं और इससे एक ऐसी व्यवस्था पनप रही है जिसमें काले धन का प्रवाह नहीं रुकेगा। सर्वोच्च न्यायालय में वकील एवं कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने मानवी कपूर के साथ बातचीत में यह बताया कि सरकार ने कैसे एक अहम मौका गंवा दिया। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:

नोटबंदी की पहल काले धन पर अंकुश लगाने के लिए शुरू की गई है। इसका राजनीतिक चंदे पर क्या असर पड़ेगा?
इस पहल से राजनीतिक चंदा पूरी तरह नहीं रुकेगा। इसका सिर्फ इतना ही असर होगा कि जो राजनीतिक पार्टियां या राजनीतिज्ञ अपनी बेहिसाबी नकदी को अभी तक वैध बनाने में विफल रहे हैं, उन्हें परेशानी का सामना करना होगा। रकम छिपाने के लिए उपलब्ध विभिन्न रूटों- कृषिगत आय, नॉर्थईस्ट रूट, जन धन योजना खातों का इस्तेमाल करने में विफल रहने वाले लोगों को अपनी कुछ रकम गंवानी पड़ेगी, लेकिन दीर्घावधि में उन पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। राजनीतिक पार्टियों को दिए जाने वाले चंदे काफी हद तक नकदी में होते हैं और यह काले धन का एक बड़ा स्रोत है जिसके बारे में मुश्किल से ही कभी चर्चा की जाती है। उदाहरण के लिए, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अपना ज्यादातर चंदा नकदी में मिलता है। अब वे यह दिखा सकते हैं कि दान छोटी मात्रा (20,000 रुपये से भी कम) में मिलता है, लेकिन हर कोई जानता है कि यह एकदम झूठ है। यही वजह है कि सहारा और बिड़ला की डायरी में दर्ज प्रविष्टियां अहम हैं। इस काले धन के राजस्व पर अंकुश लगाने के लिए उपाय नहीं किए गए हैं। यदि सरकार इसे लेकर गंभीर थी, तो वह सभी राजनीतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत लाती। नोटबंदी का राजनीतिज्ञों पर बेहद सूक्ष्म असर पड़ेगा।

अभी राजनीतिक दल कैसे चंदा लेते हैं और उसे कहां खर्च करते हैं?
यदि आप हाल में सुर्खियों में आई डायरी एंट्रीज पर गंभीरता से विचार करें तो पता चलता है कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले कोष का प्रवाह बेहद स्पष्ट है। सभी रिश्वत नकदी में दी जाती हैं। सहारा की डायरी से खुलासा हुआ है कि किस तरह से 113 करोड़ रुपये अलग अलग राजनीतिज्ञों को चुकाए गए थे।

ऐतिहासिक दृष्टिï से, राजनीतिक चंदे को लेकर कानून कैसे हैं?
एक महत्त्वपूर्ण कानून था फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेग्युलेशन) ऐक्ट, या एफसीआरए। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक पार्टियों को विदेशी रकम प्राप्त करने से रोकना था। सरकार अब विदेशी कंपनियों को भारत में राजनीतिक पार्टियों को दान देने की अनुमति देने के लिए इस कानून में बदलाव ला रही है। यह कितनी आश्चर्यजनक बात है कि सरकार गैर-सरकारी संगठनों को विदेशी रकम प्राप्त करने से रोकना चाहती है जो देश के लिए कुछ हद तक अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक पार्टियों को ऐसा करने की अनुमति देना चाहती है। एफसीआरए के अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक पार्टियों को भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा ऑडिट कराने के लिए अपने खातों का विवरण भेजने का भी आदेश दिया था। कुछ ही पार्टियों ने ये विवरण दिए और उन्हें ऐसा नहीं करने की स्थिति में भी किसी तरह का परिणाम नहीं भुगतना पड़ा।

नोटबंदी को अधिक सफल बनाने के लिए संदिग्ध राजनीतिक चंदे के संबंध में और क्या कदम उठाए जा सकते थे?
सरकार उन लोगों को निशाना बनाकर काले धन पर वाकई 'सर्जीकल स्ट्राइक' कर सकती थी जो इस रकम को छिपाए हुए हैं।

Keyword: Black money, demonetization, currency, Political parties,
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