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अमेरिकी नीतियों में बड़े बदलाव की आहट
क्लॉड समद्जा /  November 27, 2016

ट्रंप अपने चुनाव अभियान के दौरान 'पहले अमेरिका' की बात कहते रहे हैं, ऐसे में अमेरिका पहले की तुलना में मसीहा की भूमिका में कम दिख सकता है। बता रहे हैं क्लॉड समद्जा
अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के निर्वाचन का ऐलान होते ही यूरोप के एक बड़े हिस्से में जिस तरह से जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल के यूरोप का झंडाबरदार बनने की उत्कंठा जोर मारती दिखी, उससे पता चलता है कि ट्रंप को लेकर वहां किस तरह की उधेड़बुन चल रही है। हालांकि मर्केल अपने घरेलू मामलों में ही काफी व्यस्त दिख रही हैं। जर्मनी में इन दिनों लोकप्रियतावादी उभार देखा जा रहा है, ढांचागत आधार में व्यापक सुधार की जरूरत है और प्रवासियों की बड़ी फौज की चुनौती से भी दो-चार होना है। ऐसे में जर्मनी का जनमानस इस पक्ष में नहीं है कि उसकी नेता वैश्विक स्तर पर अगुआ की भूमिका में व्यस्त हो जाएं।
ऐसे में हकीकत की तरफ रुख करें तो ऐसा लगता है कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यूरोप के सभी देशों को अपनी नीतियों में तालमेल बिठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। वैसे इस आशंका का कोई आधार नहीं है कि ट्रंप का अमेरिका नाटो से खुद को अलग कर लेगा लेकिन बाहरी खतरों से यूरोपीय देशों को लगभग मुफ्त में मिलने वाली सुरक्षा का दौर अब शायद खत्म हो जाएगा। गत 25 वर्षों में लगभग हरेक अमेरिकी राष्ट्रपति को नाटो सेना के लिए किए जाने वाले भारी-भरकम खर्च पर एतराज रहा है। आखिर अमेरिका अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.61 फीसदी हिस्सा सुरक्षा पर खर्च करता है लेकिन यूरोप के केवल चार देश ही नाटो को अपने जीडीपी का दो फीसदी खर्च करने की अनिवार्यता को पूरी करते हैं। बाकी देश अपने हिस्से का योगदान नहीं करते हैं। बराक ओबामा समेत ट्रंप के तमाम पूर्ववर्ती राष्ट्रपति इस स्थिति को लेकर नाखुशी जताते रहे हैं लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रियावादी कदम नहीं उठाया। मगर ट्रंप से उम्मीद है कि वह इस दिशा में कोई कदम उठा सकते हैं। आने वाले महीनों में अमेरिका नाटो सेना पर होने वाले खर्च में यूरोपीय देशों की देनदारी सुनिश्चित करने के लिए उनकी बांह मरोडऩे की भी कोशिश कर सकता है। इससे लंबे समय से कायम गड़बड़ी को रोकने में मदद मिलेगी। इससे यूरोपीय सुरक्षा और तकनीक के क्षेत्र में भी बेहतर समन्वय और दक्षता सुनिश्चित हो सकेगी।
ट्रंप के शासन काल में यूरोपीय देशों को रूस के प्रति अपनी नीति की भी समीक्षा करनी पड़ेगी। ट्रंप पहले ही इसका संकेत दे चुके हैं कि वह व्लादीमिर पुतिन के साथ तनाव के मुद्दों पर तात्कालिक सहमति बनाने की कोशिश करेंगे। यह भी अभी साफ नहीं है कि वह क्रीमिया पर रूस के कब्जे के बाद लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को आगे भी जारी रखना चाहेंगे या नहीं। हालांकि यूरोपीय नेताओं का मानना है कि 31 जनवरी को खत्म हो रही पाबंदियां आगे भी जारी रहनी चाहिए क्योंकि क्रीमिया के जमीनी हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अगर ट्रंप रूस पर लगे प्रतिबंधों को लेकर अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाते हैं क्या तब भी यूरोपीय देशों की यह एकता बनी रह पाती है?
सीरिया मसले पर भी ट्रंप और यूरोपीय देशों के रुख में विरोध देखने को मिल सकता है। ओबामा प्रशासन ने एक साथ इस्लामिक स्टेट के आतंकी नेटवर्क का सफाया करने और सीरिया में बशर अल असद की गैर-संवैधानिक सरकार को हटाने का अभियान छेड़ा हुआ था। लेकिन ये दोनों लक्ष्य एक दूसरे के विरोधाभासी हैं, लिहाजा दोनों मोर्चों पर अमेरिका को नाकामी झेलनी पड़ी है। इसका एक और नतीजा यह हुआ कि रूस को सीरिया के समर्थन में खुलकर आने और पश्चिम एशिया में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने का मौका मिल गया। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वह सीरिया के साथ खड़े होंगे। उनकी नजर में इस्लामिक स्टेट सबसे बड़ा खतरा है और अमेरिका को सीरिया में सरकार बदलने पर फिलहाल ध्यान नहीं देना चाहिए। अमेरिका के सामने असद की तरफ से कोई सीधा खतरा न होने से ट्रंप उनके बारे में नैतिक आग्रहों को परे रखने को तैयार हैं। ऐसे में ट्रंप इस्लामिक स्टेट के खात्मे के लिए पुतिन के साथ मिलकर अस्थायी गठजोड़ बना सकते हैं। लेकिन वह असद को हटाने की मुहिम में लगे यूरोपीय देशों को नागवार गुजर सकता है। पहले से ही ईरान और रूस का खुला समर्थन पा रहे असद के लिए यूरोपीय देशों की आवाज को नजरअंदाज करना और भी आसान हो जाएगा। केवल यूरोप ही नहीं, एशिया के भी कई देशों को ट्रंप के शासन में आने का असर झेलना पड़ सकता है। ये देश अंतर-प्रशांत भागीदारी को अंतिम रूप दिए जाने का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस भागीदारी से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी मौजूदगी को सशक्त बनाने में मदद मिलेगी। लेकिन ट्रंप ने इस भागीदारी को रद्द करने की बात कही है। यूरोपीय देशों को अमेरिका के अधिक संरक्षणवादी रुख अपनाने से दिक्कत हो सकती है क्योंकि अमेरिकी बाजार तक उनकी पहुंच सीमित हो जाएगी। इसके अलावा पूर्वी एशिया में अमेरिका की सैन्य प्रतिबद्धताओं की विश्वसनीयता को लेकर बनी अनिश्चितता यूरोप के देशों को चीन समेत अन्य विकल्पों को आजमाने के लिए भी मजबूर करेगी।
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे ने मौके की नजाकत को समझते हुए ट्रंप की जनवरी में होने वाली ताजपोशी का भी इंतजार करना मुनासिब नहीं समझा और उनसे भागीदारी बढ़ाने की बात कर ली। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने गत सप्ताह लीमा में संपन्न एपेक सम्मेलन के दौरान एशिया प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक भागीदारी के लिए तैयार होने की बात कही। शी ने कहा है कि चीन आसियान के 10 सदस्यों के अलावा भारत समेत छह अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते का समर्थन करेगा। इस बयान के जरिये चीन ने जताने की कोशिश की है कि वह ट्रंप के सत्ता में आने के बाद वैश्विक मंच पर उभरने वाली अनिश्चितता का फायदा उठाने के लिए तैयार है।
अमेरिका की छवि परंपरागत तौर पर वैश्विक व्यवस्था का गारंटी देने वाले अगुआ की रही है लेकिन ट्रंप इस परंपरा को तोडऩे की बात करते रहे हैं। वैसे ओबामा के समय से ही दुनिया का दारोगा होने की नीति में बदलाव देखे जाते रहे हैं। ओबामा विदेश नीति के मोर्चे पर पीछे रहकर नेतृत्व करने की रणनीति अपनाते रहे हैं। सैनिक, तकनीकी और वित्तीय रूप से ताकतवर किसी एक देश के विश्व व्यवस्था की गारंटी देने वाला होने की धारणा अब अव्यावहारिक लगने लगी है क्योंकि  विश्व व्यवस्था के नए खिलाड़ी और नए कारक अब भू-राजनीतिक परिदृश्य को नया स्वरूप दे रहे हैं।
ट्रंप अपने चुनाव अभियान के दौरान 'पहले अमेरिका' की बात कहते रहे हैं लेकिन अमेरिका विश्व स्तर पर अपनी भूमिका से हाथ पीछे नहीं खींचने जा रहा है। विश्व व्यवस्था की बाध्यकारी वास्तविकताएं उसे ऐसा करने ही नहीं देंगी। लेकिन यह जरूर है कि अमेरिका पहले की तुलना में मसीहा की भूमिका में कम दिखेगा। दुनिया इस बदलाव के साथ सामंजस्य बिठा सकती है, बशर्ते कि राष्ट्रपति ट्रंप के करीबी लोग नीतियों में आमूलचूल बदलाव न करें और किसी कारोबार की तरह देश चलाने वाले बेतुके फैसले न करें। ट्रंप के सहयोगियों को किसी अनाड़ी की तरह आत्मघाती कदम उठाने से परहेज करना होगा। उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि व्यावहारिक राजनीति में खुद को संकीर्ण और एकांगी सोच से दूर रखना होता है तभी दुनिया में देश के भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है।
(लेखक सामरिक परामर्शदाता फर्म समद्जा ऐंड समद्जा के प्रेसिडेंट हैं।)

Keyword: donald trump, america, Policies,
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