बिजनेस स?टैंडर?ड - बंदी की गोट से किसको ज्यादा चोट
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बंदी की गोट से किसको ज्यादा चोट
आदिति फडणीस /  11 22, 2016

सरकार के इस कदम से कई नेताओं को भारी नुकसान हुआ है लेकिन लेखाजोखा नहीं होने के कारण इसका अनुमान लगाना मुश्किल है।

 राहुल गांधी को यह फैसला करने में करीब 12 घंटे लग गए कि नोट बंदी अच्छा कदम है या बुरा

बिजनेस स?टैंडर?ड बंदी की गोट से किसको ज्यादा चोटनोटबंदी पर राजनीतिक वर्ग ने चुप्पी साध रखी है लेकिन विडंबना है कि इस पर चर्चा भी गरम है। कई संसद सदस्यों को सरकार के इस फैसले के कारण भारी चपत लगी है लेकिन रिकॉर्ड के अभाव में उनके नुकसान का अंदाजा लगाना मुश्किल है। माना जा रहा है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के एक नेता तो इससे पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। वह पिछली सरकार में वरिष्ठ मंत्री थे। उनके पास अधिकांश संपत्ति बड़े नोटों के रूप में नकदी है। महाराष्ट्र के एक पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के कई करीबी बिल्डर दोस्त भी कंगाल हो गए हैं। तमिलनाडु में इस साल अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों में पैसा पानी की तरह बहाया गया था। चुनाव आयोग ने 100 करोड़ रुपये से ज्यादा नकदी जब्त की थी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह जब्त की गई सबसे ज्यादा नकदी थी।

नोटबंदी से तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों ने चुप्पी साध रखी है। सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक और विपक्षी द्रमुक ने इस पर ज्यादा कुछ नहीं कहा है। द्रमुक के नेता एम करुणानिधि ने बस इतना कहा, 'कहा जा रहा है कि इस कदम से काले धन का उन्मूलन होगा, इसलिए हम इसका स्वागत करते हैं। लेकिन अमीर नहीं बल्कि आम आदमी, मध्यम और गरीब वर्ग के लोग प्रभावित हो रहे हैं।' यह उस राज्य का हाल है जहां नकदी का ही बोलबाला है। समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने संसद में कहा, 'कहा जा रहा है कि काले धन का चुनावों में इस्तेमाल होता है। लेकिन मेरा मानना है कि चुनाव पैसे के दम पर नहीं जीते जाते हैं। अगर ऐसा होता तो एक ही दल लगातार चुनाव जीतता रहता। हम लोगों की राय और जनादेश के आधार पर चुनाव जीतते या हारते हैं।'

क्या वास्तव में ऐसा है?

कोई नहीं जानता कि भारत में लोकतंत्र को पुष्पित पल्लवित रखने के लिए कितना नकद पैसा लगता है। जरा तमिलनाडु में साल 2009 में हुए तिरुमंगलम विधानसभा उपचुनाव के बाद आई रिपोर्टों पर गौर कीजिए। ऐसी खबरें थीं कि सुबह के अखबार के साथ 1,000 से 5,000 रुपये बांटे गए थे। साथ में एक चिट नत्थी की गई थी जिसमें मतदाताओं से किसी खास पार्टी को वोट देने की अपील की गई थी। सत्तारूढ़ द्रमुक पर इसका आरोप लगा। चुनाव में द्रमुक का उम्मीदवार 39,000 वोटों के भारी अंतर से जीता और इसका नतीजा यह हुआ कि इसे खरीदा हुआ चुनाव कहा गया। तब करुणानिधि के बड़े बेटे एम अलागिरि मदुरै क्षेत्र के प्रभारी थे और तिरुमंगलम सीट जीतना उनके लिए प्रतिष्ठा का सवाल था। उन्होंने इन आरोपों का खंडन किया कि चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को पैसे बांटे गए। लेकिन विकीलीक्स ने असलियत का खुलासा कर दिया।

द हिन्दू ने इस बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसके मुताबिक अलागिरि के करीबी पटूराजन ने अमेरिका वाणिज्य दूतावास के एक अधिकारी से कहा था कि अलागिरि ने तिरुमंगलम में हर मतदाता को 5,000 रुपये दिए थे। तमिलनाडु के आबकारी विभाग ने तब उस इलाके में शराब की बिक्री में अचानक बढ़ोतरी की रिपोर्ट दी थी। स्थानीय मीडिया के मुताबिक चुनाव से कुछ दिन पहले बूचडख़ानों में ग्राहकों की तादाद बढ़ गई थी। ऐसा लगता था कि हर कोई रातोरात अमीर बन गया है। ऐसे में इस बात पर आश्चर्य नहीं है कि जब संसद के अंदर और बाहर सबसे बड़ा राजनीति मुद्दा नोटबंदी है, तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दल मछुआरों की समस्याओं को लेकर चिंतित हैं।

अन्नाद्रमुक ने तमिलनाडु के मछुआरों पर श्रीलंकाई नौसेना के हमले के खिलाफ संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में व्यवधान पैदा किया। अपनी व्यस्तताओं के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अन्नाद्रमुक के दोनों सदनों के प्रतिनिधिमंडल से मिलने का समय भी मिल गया। यह मुलाकात करीब आधे घंटे चली और इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री को मछुआरों की समस्याओं के बारे में चार पन्नों का एक ज्ञापन भी दिया।

कौन कर रहा है कदम वापस खींचने की बात

संसद का केंद्रीय कक्ष भारत के राजनीतिक मिजाज का केंद्र है। संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दो दिन भाजपा के  सांसदों ने नोटबंदी और इसके असर पर व्यापक चर्चा से परहेज किया। 16 नवंबर को राज्यसभा में बाकी कामकाज रोककर नोटबंदी के असर पर चर्चा की गई। इसमें सरकार रक्षात्मक मुद्रा में नजर आई। विपक्ष के तीखे हमलों पर सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। यहां तक कि सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की आलोचना पर भी भाजपा के सदस्यों ने अनसुना कर दिया। सरकार ने कहा कि वह इस मुद्दे पर पूरी बहस के लिए तैयार है, चाहे इसमें कितना भी समय लगे।

नोटबंदी के फैसले को वापस लेने की मांग सबसे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उठाई थी लेकिन दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के सांसदों ने पहले ही इस बारे में पूछना शुरू कर दिया था। वे पूछ रहे थे कि क्या किसी को नोटबंदी का फैसला वापस लिए जाने के बारे में जानकारी है। हालांकि साथ ही वे इस बात पर भी जोर दे रहे थे कि इसका सवाल ही नहीं उठता है।

सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष भी इस बात को लेकर भ्रम में हैं कि क्या नोटबंदी का मकसद केवल काला धन रोकना है या फिर बात कुछ और है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को यह फैसला करने में करीब 12 घंटे का समय लग गया कि 500 और 1,000 रुपये के नोट बंद करना अच्छा कदम है या बुरा। कांग्रेस इसके खिलाफ सड़कों पर नहीं उतरी और यह काम बनर्जी और केजरीवाल ने किया। कांग्रेस के संगठन एनएसयूआई, युवा कांग्रेस और सेवा दल बैंकों के बाहर लंबी कतारों में खड़े लोगों की मदद के लिए आगे नहीं आए। इसके बजाय राहुल गांधी ही कतार में जाकर लोगों के साथ खड़े हो गए।

जनाक्रोश

नंवबर दिल्ली और मुंबई में निवेशकों के सम्मेलन का मौसम होता है। यूरोपीय फंड के एक निवेशक ने जब लोगों को संयम के साथ बैंकों के बाहर लंबी कतारों में खड़ा देखा तो उसे अपनी आखों पर विश्वास नहीं हुआ। पूरे देश में सरकार के खिलाफ रोष है लेकिन साथ ही हर कोई कह रहा है कि इससे अमीरों को ज्यादा कष्टï हो रहा है। देश में मोदी सरकार और खुद मोदी के कई आलोचक हैं। विडंबना यह है कि जिन लोगों के पास थोड़ा बहुत पैसा था उनके पास अब पैसा और कम हो गया है। वित्त मंत्रालय के बजाय बैंक कर्मचारियों को उनके कोप का शिकार बनना पड़ रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि फल और सब्जियां ले जा रहे ट्रक नई मुद्रा के अभाव में आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, नमक की कमी की अफवाह आग की तरह फैल रही है और भुगतान में देरी के कारण मजदूरों को एक वक्त का खाना खाकर काम चलाना पड़ रहा है। लेकिन राजनीतिक वर्ग पर अभी तक नोटबंदी का कोई खास असर नहीं हुआ है। अगर सरकार इस सप्ताह के अंत तक मामले को संभालने में नाकाम रही तो फिर उसके बाद यह नुकसान दिखने लगेगा।

Keyword: demonetization, Currency, political parties,
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