बिजनेस स्टैंडर्ड - साफ हवा के लिए समयबद्ध और गंभीर प्रयासों की जरूरत
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साफ हवा के लिए समयबद्ध और गंभीर प्रयासों की जरूरत
जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  November 21, 2016

हर साल ठंड के मौसम में मीडिया और सरकार एक ही सवाल से दो-चार होते हुए नजर आती हैं। उनके मन में धुंध को लेकर काफी सवाल कौंध रहे होते हैं। हालात लगातार बदतर होते जाने के बाद भी हम इस सवाल से परिचित नहीं हो पाए हैं। साल 2014-15 की सर्दियों के करीब 34 फीसदी दिनों में वायु प्रदूषण गंभीर स्तर तक पहुंच गया था। सरकार के अपने सूचकांकों के मुताबिक इस तरह की स्थिति न केवल कमजोर बल्कि सभी लोगों के स्वास्थ्य के लिहाज से चुनौतीपूर्ण है। उसके अगले साल की सर्दियों में तो करीब 68 फीसदी दिनों में वायु प्रदूषण गंभीर स्तर पर था। साल 2016-17 की सर्दियों की तो अभी शुरुआत ही हुई है और हमें कई दिनों तक छाई रही धुंध के रूप में वायु प्रदूषण की गंभीरता का आभास बखूबी हो चुका है।
ऐसा तब है जब हमें पता है कि हालात सुधारने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए? इनमें से कुछ कदम तो तत्काल उठाए जाने की जरूरत है जबकि कुछ कदम दीर्घकालिक होंगे। सभी मामलों में हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि जो भी कदम उठाया जा रहा है वह तय समय के भीतर पूरा हो। लेकिन हर कोई दूसरे पर आरोप लगाने में लगा हुआ है। ऑटोमोबाइल उद्योग सड़कों पर उड़ती धूल को दोषी बताता है तो दिल्ली सरकार धान के पुआल जलाने को इसके लिए जिम्मेदार बताता है। कुछ लोग कचरा जलाने को इस समस्या की वजह बताने में लगे हैं।
अब समय आ गया है कि हम दोषारोपण करना बंद कर दें। प्रदूषण के स्रोतों और उसकी रोकथाम के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में तो सभी जानते हैं लेकिन उस पर अमल करने की दरकार है। निस्संदेह अधिक जानकारी आने के साथ ही हमें अधिक जानने को मिलेगा लेकिन हमारी नजरें एकदम लक्ष्य पर ही टिकी रहनी चाहिए तभी हम नतीजे हासिल कर सकते हैं। इसलिए हमारा ध्यान प्रदूषण के हर स्रोत और हर कदम पर होना चाहिए। हमें यह तय करना होगा कि किसे क्या करना है और कब तक पूरा करना है? एक बार के लिए सारे मतभेदों को किनारे रखकर इसके लिए सहमत होना होगा। हमें प्रदूषण के बारे में सरकार और न्यायपालिका से सभी जरूरी दिशानिर्देश मिले हुए हैं लेकिन हमें उन्हें लागू करना होगा। अब थोड़ी-सी भी देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। आखिरकार हमारे लिए यह जीवन और मरण का सवाल बन गया है।
हम सभी जानते हैं कि वाहनों, उद्योगों और थर्मल पावर प्लांट के उत्सर्जन के अलावा कचरा जलाना वायु प्रदूषण के प्रमुख कारक हैं। धूल भी इसका अहम स्रोत है और इस पर लगाम के लिए सड़कों पर गाडिय़ों की आवाजाही को नियंत्रित करने की जरूरत है। इसके लिए ईंधन की गुणवत्ता, वाहनों की उत्सर्जन तकनीक सुधारने की जरूरत है ताकि वाहनों से होने वाले प्रदूषण को सीमित दायरे में लाया जा सके। हमें कूड़े-कचरे के ढेर को बेहतर तरीके से ठिकाने की तकनीक भी अपनाने की जरूरत है। हम कूड़े को जला नहीं सकते हैं और इसे समझने के लिए किसी रॉकेट विज्ञान की समझ की दरकार नहीं है।
अपनी सहयोगी अनुमिता रॉयचौधरी के साथ मिलकर मैंने अपनी पत्रिका डाउन टू अर्थ के विशेष अंक में इसका उल्लेख किया है कि वायु प्रदूषण से निपटने की भारत की कोशिशें हमेशा सवालों के घेरे में रही हैं। उदाहरण के लिए, वाहन उत्सर्जन और ईंधन मानकों की प्रगति के मुद्दे पर ही नजर डालिए। उच्चतम न्यायालय ने 1999 में ऑटो कंपनियों की चाहत के विपरीत जाते हुए ईंधन मानकों को लागू करने का आदेश दिया था। इन कंपनियों के वकीलों ने लगातार यह साबित करने की कोशिश की कि इस गैरजरूरी कदम से न केवल लोगों को असुविधा होगी बल्कि कोई खास फायदा भी नहीं होगा। लेकिन तमाम विरोध के बावजूद ईंधन मानक लागू किए गए और शहरों में उत्सर्जन स्तर कम करने में मदद भी मिली।
केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2016 में बीएस-6 स्तर के ईंधन मानक को वर्ष 2020 तक लागू करने का ऐलान किया है। पहले इस ईंधन मानक को वर्ष 2028 तक लागू किया जाना था लेकिन सरकार ने ऑटो उद्योग की राय और आपत्तियों को दरकिनार करते हुए इसे पहले ही लागू करने की घोषणा कर दी है। माना जा रहा है कि इस कदम में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने में काफी मदद मिलेगी लेकिन इसमें अभी वक्त लगेगा।
इस बीच बीएस-4 मानक वाला ईंधन देश भर में अगले साल अप्रैल से मिलना शुरू हो जाएगा। बीएस-3 मानक ईंधन में जहां सल्फर के 350 पीपीएम कणों को मंजूरी है वहीं बीएस-4 मानक वाले ईंधन में सल्फर की मात्रा 50 पीपीएम ही होगी। बीएस-4 मानक वाले ईंधन से उत्सर्जित कणों की मात्रा बीएस-3 मानक ईंधन की तुलना में 80 फीसदी कम होगी। हालांकि वाहनों को बीएस-4 ईंधन के अनुकूल बनाने की चुनौती अपने-आप में बड़ी होगी।
ऑटो जगत के आंकड़े बताते हैं कि वह अपने सभी वाहनों को 1 अप्रैल 2017 से बीएस-4 ईंधन के मुताबिक ढालने के लिए तैयार नहीं है। ऑटो कंपनियों का कहना है कि वाहनों की भारी तादाद को देखते हुए इसे अमल में लाने में 6-8 महीने और लग सकते हैं। दोपहिया वाहन निर्माताओं को इसके लिए पूरे एक साल का समय दिया गया था लेकिन वे अनबिके वाहनों का हवाला देते हुए इसमें असमर्थता जता रहे हैं। हालांकि हमारा मानना है कि ऑटो जगत के इस रवैये को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
हमें एक सुर में यह कहना होगा कि बस बहुत हो गया। आज के समय में दूषित और जहरीले परिवेश से फायदा केवल मास्क और एयर प्यूरीफायर बनाने वाली कंपनियां को ही हो रहा है। हमें अपने बच्चों के लिए जहरीली हवा से भरा माहौल नहीं चाहिए। हमें केवल सर्दियों में ही नहीं बल्कि हरेक मौसम में इस बात को बुलंद आवाज में कहने की जरूरत है। तभी इस दिशा में काम होगा और हवा भी साफ होने लगेगी।

Keyword: Air, Pollution, winter,
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