बिजनेस स्टैंडर्ड - बदलाव के दौर में शेयर किस ठौर?
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बदलाव के दौर में शेयर किस ठौर?
आकाश प्रकाश /  October 28, 2016

तकनीकी बदलाव के इस दौर में शेयरों पर पिछले दशक के समान आकर्षक प्रतिफल पाने की उम्मीद गलत भी साबित हो सकती है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
हाल ही में एक चतुर वैश्विक निवेशक ने मुझसे पूछा कि आखिर क्यों उच्च गुणवत्ता वाले भारतीय शेयर इतने महंगे हैं? उसका कहना था कि स्तरीय भारतीय कंपनियां दुनिया भर के तमाम क्षेत्रों में सबसे महंगी हैं। भारतीय वित्तीय जगत या पेज, जुबिलैंट फूडवक्र्स जैसे शेयर अपने-अपने क्षेत्र में दुनिया के सबसे महंगे शेयर थे। मेरी तात्कालिक टिप्पणी यह थी कि भारत में क्रियान्वयन और कारोबारी आकार से जुड़ी दिक्कतों के चलते कोई भी कारोबार अगर मुनाफे में आता है या उसका विस्तार होता है तो उसे जबरदस्त सम्मान भी मिलता है। एक अन्य बिंदु यह था कि देश में वृद्घि की संभावनाओं को देखते हुए इन कंपनियों के पास काफी समय होता है कि वे अपने मुनाफे को आकर्षक वृद्घि वाले प्रतिफल पर आगे बढ़ा सकें। यह पूरी प्रक्रिया बहुत मूल्यवान है और अन्य बाजारों में काम कर रहीं तमाम कंपनियों को यह सुविधा हासिल नहीं है। उन देशों में पुनर्निवेश की संभावनाएं बहुत सीमित हैं। 
 
भारतीय फ्रैंचाइज शेयरों के अत्यधिक ऊंचे मूल्यांकन के सिरे मुनाफा बरकरार रखने में भी तलाश किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं उन कंपनियों की पूंजी पर उच्च प्रतिफल बरकरार रखने की क्षमता और विस्तारित अवधि के लिए मुनाफा भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। अगर कंपनी प्रतिफल पर ऊंचा निवेश बरकरार रखने में कामयाब रहती है और उसके पास पुन:निवेश का खाका तैयार रहता है तो इसकी वजह से भी उसे बढिय़ा मूल्यांकन हासिल होता है। 
 
मुनाफा बरकरार रखने पर शोध करते हुए मेरा सामना क्रेडिट सुइस के एक रोचक अध्ययन से हुआ। उन्होंने मुनाफा बरकरार रखने पर एक वैश्विक अध्ययन किया था और इसके कई रोचक परिणाम सामने आए थे। उन्होंने पाया था कि वृद्घि दर जहां मध्यमान को प्रभावित करती है, वहीं पूंजी पर प्रतिफल वृद्घि दर की तुलना में कहीं अधिक निरंतरता वाला होता है। 
वर्ष 2013 में प्रकाशित एक नोट में उन्होंने बताया कि 25 करोड़ डॉलर से अधिक बाजार पूंजीकरण वाले सभी शेयरों का अध्ययन किया गया और उनको चार खांचों में बांटा गया। यह बंटवारा पूंजी पर प्रतिफल के हिसाब से किया गया था। इसके बाद उन्होंने यह आकलन किया कि आखिर कितने प्रतिशत कंपनियों की रैंकिंग पांच साल में बदली। पाया गया कि पूंजी पर प्रतिफल के हिसाब से सर्वश्रेष्ठï खांचे में रखी गई 51 फीसदी कंपनियों की रैंकिंग हर पांच साल में बदलने की संभावना थी जबकि उनकी पूंजी पर प्रतिफल की प्रोफाइल के बेहतर होने की संभावना 80 प्रतिशत थी। 
 
इसी प्रकार पूंजी पर प्रतिफल के लिहाज से सबसे बुरी श्रेणी में रखी गई कंपनियों के उसमें ही बने रहने की संभावना 56 फीसदी जबकि पांच साल में पूंजी पर प्रतिफल खराब होने की संभावना 80 फीसदी थी। यह केवल संभावना पर आधारित परिणाम नहीं हैं। प्रभावी प्रतिफल में निरंतरता होती है और कंपनियों के लिए बदलाव की प्रक्रिया आसान नहीं होती। पांच साल की अवधि में उनका प्रतिफल या तो सुधरता है या बिगड़ जाता है। 
 
ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि किसी कंपनी का सितारा हैसियत वाला मुख्य कार्याधिकारी क्या वाकई बड़ा अंतर पैदा कर सकता है, वह भी तब जबकि उसका कार्यकाल पांच साल से कम हो? इसके बाद यह रिपोर्ट हर क्षेत्र के अलहदा नतीजे देती है और यहां उपभोक्ता खाद्यान्न, दवा, खुदरा और मीडिया आदि क्षेत्रों के शेयरों का प्रतिफल कहीं अधिक नजर आता है। इन क्षेत्रों में कंपनियों के अपना प्रतिफल बरकरार रखने की संभावना 95 फीसदी तक है। मुझे लगता है कि मुनाफे की निरंतरता का यह सिलसिला भारत में कहीं अधिक मजबूत है। 
 
प्रमाण के तौर पर देखें तो प्रमुख भारतीय कंपनियों के बाजार हिस्सेदारी पर दबदबा कम करने या उनके प्रतिफल में गिरावट आने की संभावना बहुत कम देखने को मिलती है। इस धारणा को निकालना बहुत मुश्किल काम है कि भारतीय कंपनियों ने वितरण, बाजार हिस्सेदारी, ब्रांड आदि में अपनी छवि बनाई है। उपभोक्ताओं के मन में ब्रांड को लेकर आग्रह तैयार होने में वक्त लगता है और वे आसानी से अपनी पसंद नहीं बदलते। नए ब्रांड को बाजार में लाने की लागत और उसमें लगने वाले समय तथा नया कारोबार स्थापित करने में भारत में ऐतिहासिक तौर पर लंबा समय लगता रहा है। 
 
आप कह सकते हैं कि उच्च मुनाफे की निरंतरता और उच्च पुनर्निवेश को मिला दिया जाए तो शीर्ष भारतीय कंपनियों के उच्च मूल्यांकन को सही ठहराया जा सकता है। दरअसल इन शेयरों ने अपने मूल्यांकन के बावजूद बढिय़ा प्रदर्शन करना जारी रखा। आप देख सकते हैं कि आखिर क्यों देश के अधिकांश निवेशकों में अच्छी कंपनी के शेयर किसी भी दाम पर खरीदने की भावना जोर पकड़ गई है। इसलिए क्योंकि देश में उच्च मुनाफे का दौर चल रहा है और इसकी वजह से बाजारों को प्रतिस्पर्धी लाभ लंबे समय के लिए मिलता रहता है।
 
अतीत में ऐसा होता रहा है लेकिन भविष्य में चीजें बदलती नजर आ रही हैं। मुझे लगता है कि मुनाफे की निरंतरता आने वाले वर्षों में कम होगी क्योंकि तकनीक और नए कारोबारी मॉडल पुराने जमे हुए कारोबारों को प्रभावित करेंगे। ऑनलाइन कारोबारी उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार पर असर डालेंगे या अचल संपत्ति क्षेत्र पर रिटेलरों का दबदबा प्रभावित होगा। मीडिया कंपनियां और टीवी नेटवर्क को ऑन डिमंाड वीडियो स्ट्रीमिंग से चुनौती मिलने ही लगी है। बैंकों तक को नए तकनीकी उद्यमों से चुनौती मिलने लगी है। मैं नए साझा अर्थव्यवस्था वाले कारोबारी मॉडलों की तो बात ही नहीं कर रहा हूं। 
 
इन तमाम नए तकनीक आधारित कारोबारी मॉडलों के चलते मुनाफे की निरंतरता प्रभावित होगी। इसका अब तक चले आ रहे उच्च मूल्यांकन पर गहरा असर होगा। भारत भी इससे अप्रभावित नहीं रहेगा। कोई भी सवाल कर सकता है कि इसमें नया क्या है? तकनीक हमेशा से पहले से जमे लोगों के लिए चुनौती रही है। आज ई-कॉमर्स, एसवीओडी और साझा अर्थव्यवस्था आदि सभी संक्रमण के मोड़ पर पहुंच चुके हैं। बदलाव की गति लगातार तेज होती जा रही है। भारत में यह गति और भी तेज नजर आ रही है क्योंकि हम तकनीकी मोर्चे पर पूरी एक पीढ़ी की उछाल ले रहे हैं। 
 
अगली बार जब आप सामान्य से 40 गुना महंगा कोई शेयर खरीदें तो इस पर जरूर सोचिएगा। गौरतलब है कि फिलहाल भारत में कई शेयर इसी स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। अपने निवेश पर उचित प्रतिफल हासिल करने के लिए आप बस मुनाफे की निरंतरता और पुन: निवेश की संभावनाओं पर दांव लगा रहे हैं जबकि वैसा हो ही यह आवश्यक नहीं है। दुनिया बदल रही है। अधिकांश कंपनियों का प्रतिस्पर्धी लाभ अब खत्म हो रहा है। एक बड़ी कंपनी को किसी भी कीमत पर खरीदने पर शायद अब वह प्रतिफल न मिले जो अब तक मिलता आया है।
Keyword: india, technical, skill,,
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