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किसका हित?
संपादकीय /  October 06, 2016

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और सर्वोच्च न्यायालय के बीच का द्वंद्व उस भ्रम की स्थिति को स्पष्टï रूप से उजागर करता है जो देश में क्रिकेट के प्रशासन में मौजूद है। इसमें ढेर सारा पैसा, कट्टर राष्ट्रवाद, राजनीति और ऐसी नैतिकता भी शामिल हैं जिन पर प्रश्न किया जा सकता है। आश्चर्य नहीं कि एक मामला जो वर्ष 2013 की इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल में) स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के बीच की सजा में अंतर के लिए शुरू हुआ था वह अब देश की सबसे बड़ी अदालत और सबसे अमीर क्रिकेट प्रशासन के बीच एक संकट में तब्दील हो गया है। ताजा घटनाक्रम में न्यायालय ने अपना आदेश शुक्रवार तक के लिए टाल दिया है। इस गतिरोध पर करीबी नजर डालें तो पता चलता है कि इससे किसी का भला नहीं हुआ है।

 
न्यायपालिका के लिए स्वाभाविक है कि वह किसी ऐसे न्यास के परिचालन के बारे में अपनी राय दे जो करदाताओं के धन से नहीं चलता। दलील दी गई कि हस्तक्षेप आवश्यक था क्योंकि बीसीसीआई भारतीय टीम के लिए भी जवाबदेह है। इससे पता चलता है कि आधुनिक खेल जगत की कारोबारी प्रकृति को लेकर किस तरह की मूलभूत गलतफहमी है जबकि राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं उनका एक हिस्सा भर हैं। फुटबॉल, बास्केटबॉल, हॉकी, मोटर रेसिंग और कबड्डïी आदि में जहां मालिकान मुक्त बाजार में प्रतिभाओं की तलाश करते हैं, वहीं क्रिकेट की राष्ट्रीय टीम का निर्माण कुछ इस प्रकार किया जाता है कि घरेलू प्रतिभाएं बीसीसीआई से संबद्घ राज्य क्रिके्रट संघों के जरिये बाजार तक पहुंचती हैं। हमारे देश में राष्ट्रवादी झुकाव नजर आता है क्योंकि बीसीसीआई की जड़ें औपनिवेशिक संघर्ष में समाहित हैं। इसमें राजनीतिक प्रभाव को भी इसी बात से समझा जा सकता है। जब तक खरीद का यह एकाधिकार बना रहेगा, बीसीसीआई की प्रशासनिक कमियों पर बहुत अधिक चर्चा नहीं हो पाएगी। इस व्यवस्था को पहला झटका आईपीएल ने दिया। चूंकि उसमें बहुत अधिक धन शामिल था इसलिए उसमें एक स्तर तक अपराध की सहभागिता सामने आनी ही थी। 
 
यहां सरकार और न्यायपालिका की भूमिका वैसी ही है जैसी कि उद्योग जगत में। पश्चिमी देशों में खेल के क्षेत्र में अपेक्षाकृत बेहतर न्याय व्यवस्था के तर्ज पर उनको सेवा प्रदाता की भूमिका निभानी होती है और जब कानून का उल्लंघन हो तो वे हस्तक्षेप कर सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने दो आईपीएल फ्रैंचाइजी पर दो साल का प्रतिबंध लगाकर यही किया। इन पर आरोप था कि ये सट्टïेबाजी में शामिल हैं। यह स्पष्टï नहीं है कि उसे बीसीसीआई में सुधार के लिए पैनल गठित करने तक अपना दायरा बढ़ाने की क्या आवश्यकता? वह भी अनुशंसाओं का अनुपालन सुनिश्चित करते हुए। इसकी तुलना वर्ष 2009 के सत्यम घोटाले से की जा सकती है। उस वक्त सरकार ने कंपनी को बचाने के लिए हस्तक्षेप किया था। रामलिंग राजू को अपने किए की सजा मिली थी लेकिन उस वक्त भी सरकार ने कंपनी के पुनर्गठन और नई कंपनी टेक महिंद्रा द्वारा उसके संचालन में कोई दखल नहीं दिया था। सरकार ने कंपनी कानून में बदलाव लाकर यह जरूर सुनिश्चित किया कि वैसे अपराध दोहराए न जाएं। 
 
ध्यान दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने लोढ़ा समिति की सबसे अहम अनुशंसा को ठुकरा दिया। वह थी सट्टेबाजी को वैध बनाना। अगर ऐसा किया जाता तो गहरे तक घर कर गए भ्रष्टïाचार को कम किया जा सकता था क्योंकि सबकुछ पारदर्शी ढंग से होता और सबके सामने रहता। बीसीसीआई के वरिष्ठï अधिकारी भी दोषी हैं। सीधे न्यायपालिका के कानून बनाने के अधिकार पर सवाल उठाकर उन्होंने खुद को देश की सबसे बड़ी अदालत के कोप का भाजन बना लिया है। उस दृष्टिï से देखा जाए तो उन्होंने भी खिलाडिय़ों और प्रशंसकों का कोई भला नहीं किया है। इस वजह से भी वे सहानुभूति के पात्र नहीं नजर आते। 
Keyword: BCCI, court, anurag thakur,,
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