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मजबूत रिश्तों की शुरुआत हितों पर नहीं करेगी आघात
प्रेमवीर दास /  September 13, 2016

भारत और अमेरिका के बीच हाल में हुए लॉजिस्टिक अनुबंध की तासीर में कुछ भी खतरनाक नहीं है और न ही यह सामरिक पैमाने पर कायापलट करने वाला है। बता रहे हैं प्रेमवीर दास 

 
अमेरिका भारत के साथ रक्षा सहयोग को और मजबूत बनाने के लिए तीन समझौतों को अहम मानता आया है। भारत-अमेरिका सैन्य तंत्र विनिमय समझौता अनुबंध (लेमोआ) को उन तीन प्रमुख 'बुनियादी' दस्तावेजों में से एक करार दिया जा रहा है। दो अन्य समझौते संचार परस्पर सहभागिता और भूस्थानिक सहयोग से संबंधित हैं। जानकार सामरिक विश्लेषकों ने बताया कि इस समझौते के साथ ही भारत ने एक तरह से अमेरिका के साथ 'गठजोड़' कर लिया है और गुटनिरपेक्षता की अपनी भूराजनीतिक विचारधारा को तिलांजलि दे दी है, जिसके आधार पर पिछले सात दशकों में उसकी विदेश नीति संचालित होती रही है। 
 
उभरते सामरिक परिवेश की मजबूरियों को देखते हुए तमाम लोगों ने इसका स्वागत किया है कि इसकी जरूरत महसूस की जा रही थी। वहीं कुछ लोगों की दलील है कि अगर यह समझौता इसी स्वरूप में हुआ तो यह अमेरिकी हितों को पोषित करता है। एक तबका ऐसा भी है जो इसे दुनिया की नई भूराजनीति में भारत की निरंतर बढ़ती अहमियत का प्रमाण मान रहा है। कुछ लिहाज से ये सभी बातें सच हैं, वहीं हम शायद कुछ बढ़ा चढ़ाकर भी चीजों को पेश कर रहे हैं जो जमीनी हकीकत पर खरी नहीं उतरतीं। 
 
भारत-अमेरिका के बीच पहला रक्षा सहयोग समझौता भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव की सक्रियता के चलते जनवरी, 1995 में हुआ था। यह एक प्रारंभिक शुरुआत थी, जिसमें समुद्री अभ्यास और अन्य सैन्य विनिमय शामिल थे। वर्ष 1996 से देश में संयुक्त मोर्चे की अस्थिर सरकारें रहीं और दोनों देशों के रिश्तों में कोई प्रगति नहीं हुई। सन 1998 में भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्टï्र बना और इसके चलते अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध लगा दिए। ऐसे में सामरिक रिश्तों में सार्थक सहयोग प्रभावी रूप से जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन के दौर में शुरू हुआ। उसके बाद से 1995 के दस्तावेज में स्वीकार्य अधिकांश पहलुओं को फलीभूत करने की दिशा में बात आगे बढ़ी। 
 
दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच मालाबार शृंखला का अभ्यास परवान चढ़ा है और वायु सेनाओं और सेनाओं के बीच भी इसी तरह की सक्रियता बढ़ी है। पिछले एक दशक में भारी पैमाने पर सैन्य साजोसामान खरीदारी के समझौते हुए हैं। हालांकि इसका दुखद पहलू यही है कि तकरीबन 14 अरब डॉलर के सौदों को 'मेक इन इंडिया' के बिना ही आगे बढ़ाया जा रहा है। तकनीकी हस्तांतरण अभी भी एक बड़ी बाधा है लेकिन उसे दूर करने के लिए कुछ प्रस्तावों पर बात चल रही है। वर्ष 2002 में अमेरिकी पक्ष ने प्रस्ताव रखा कि दोनों पक्षों को कुछ समझौते करने चाहिए, जिससे रक्षा सहयोग और प्रगाढ़ किया जा सके। 
 
इन समझौतों में लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (एलएसए), कम्युनिकेशंस इंटरोपेरेबिलिटी ऐंड सिक्योरिटी मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (सीआईएसएमओए) और बेसिक एक्सचेंज ऐंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट ऑन कोऑपरेशन फॉर जियोस्पेशल कोऑपरेशन (बीईसीए) जैसे समझौते शामिल थे। अमेरिका की दलील थी कि उसने तकरीबन 100 देशों के साथ ऐसे समझौते कर रखे हैं, जिनके साथ उनका सामरिक गठजोड़ है और उनके साथ भी जिनके साथ उसने यह गठजोड़ नहीं किया हुआ है और ये समझौते सहयोग सुनिश्चित करते हैं।  
 
इन तीनों पर भारत की कुछ खास चिंता कायम रहीं। इनमें से दो तो अपने नाम के अनुरूप ऐसा आभास देते हैं कि इससे एक तरह से क्षेत्र में अनधिकारिक प्रवेश मिल जाएगा, जबकि पहला समझौता काफी सीधा सपाट होने के बावजूद इसी परिप्रेक्ष्य में देखा गया कि इससे भारत में अमेरिकी सैन्य क्षमता को मजबूती मिलेगी और वह अपनी पसंद की जगह से परिचालन करने में सक्षम होगा, जबकि दस्तावेज की भाषा में ऐसे कोई संकेत नहीं मिलते। बहरहाल इसकी चाहे जो वजह रही हों लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री ने इन प्रस्तावों पर किसी तरह कदम आगे नहीं बढ़ाए, जिसे अब 'बुनियादी' करार दिया जा रहा है। असल में एलएसए को ही अब लेमोआ का नाम दिया गया है, जबकि दो अन्य करार अभी भी अधर में हैं।
 
यह देखना दिलचस्प होगा कि लेमोआ के तहत दोनों देश एक दूसरे को किस तरह का लॉजिस्टिक सहयोग मुहैया करा पाते हैं। जब युद्घपोत या लड़ाकू विमान या थल सेनाएं साथ में संचालन करती हैं जैसे कि संयुक्त अभ्यास में करती हैं तो राहत एवं बचाव कार्यों में बंदरगाहों तक पहुंच के लिए उनको ईंधन जैसे प्रावधान करने होंगे। नकद भुगतान कर इन्हें स्थानीय बाजार से खरीदा जा सकता है। मगर यह प्रक्रिया खासी जटिल है क्योंकि इसमें विदेशी विनिमय लेनदेन जुड़ा होता है। कुछ मामलों में स्थानीय आपूर्तिकर्ता मांग को पूरा करने की स्थिति में नहीं होते क्योंकि उनके पास इतनी मात्रा में ईंधन उपलब्ध नहीं होता। इसके उलट नौसेना के टैंकर और डिपो शिप आसानी से इस जरूरत को पूरा कर सकते हैं खासतौर से समंदर में जहां ऐसी कोई अन्य सुविधा उपलब्ध नहीं होती। हालांकि उनके पास नकद लेनदेन तंत्र की व्यवस्था नहीं होती।  
 
द्विपक्षीय समझौते से ऐसे सभी लेनदेन खाते में चले जाते हैं, जिसमें तुरत अदायगी की जरूरत नहीं होती। इस प्रकार अगर भारतीय नौसेना अमेरिकी टैंकर या तटीय एजेंसी से ईंधन लेती है तो वह भारत के डेबिट खाते में जाएगा और इसी तरह जब अमेरिका भारतीय नौसेना या तटीय एजेंसी से ये सुविधा लेगा तब यह हमारे के्रडिट खाते में जाएगा। समय-समय पर इस खाते को देखकर उसका निपटान किया जा सकता है। एलएसए यही उपलब्ध कराता है, न इससे कुछ ज्यादा और न इससे कम। दुर्भाग्य से हमारी ओर यही समझाया जा रहा है कि इस सुविधा को परिचालन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। लेमोओ में भाषा को नए सिरे से गढ़ा गया है और यहां तक कि तटीय सुविधा या संयुक्त परिचालन के सूक्ष्मतम उपयोग की संभावनाओं को खत्म किया गया है और इसमें केवल संयुक्त अभ्यास और राहत एवं बचाव कार्यों को ही अपवाद माना गया है। लिहाजा इस व्यवस्था में कुछ भी सामरिक या कोई डरावना पहलू नहीं है। वास्तव में ऐसी कोई वजह नजर नहीं आती कि जापान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया जैसे अन्य देशों के साथ हमें ऐसा समझौता क्यों नहीं करना चाहिए, जिनके साथ रक्षा सहयोग के मामले में हमारे संबंध बहुत प्रगाढ़ हैं।
 
असल में यह हमारी शैली है कि ऐसे स्पष्टïवादी और साधारण समझौतों को भी सामरिक लिहाज से कायाकल्प करने वाले के तौर पर देखा जाता है। कुछ विश्लेषकों ने लेमोओ की तुलना वर्ष 1971 की भारत-सोवियत शांति एवं मैत्री समझौते से कर दी है लेकिन ऐसा करते हुए वे एक तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं कि उस समझौते में यह भी प्रावधान था कि किसी भी देश की धरती पर किए हमले को दूसरे देश पर हमला माना जाएगा। इसी समझौते के आधार पर तब सोवियत संघ ने सुरक्षा परिषद में अमेरिका के मंसूबों को सफल नहीं होने दिया था और तब तक संघर्ष विराम नहीं हुआ जब तक कि बांग्लादेश निर्माण का मिशन पूरा नहीं हो गया। 
 
हाल में जो समझौता हुआ, उसकी उस समझौते से तुलना करना हास्यास्पद होगा। जहां तक दो अन्य समझौतों की बात है तो हाल फिलहाल इस बात की कोई संभावना नजर नहीं आती कि भारत उन दोनों करारों पर सहमति जताएगा। उन समझौतों का प्रारूप ज्यादा गहराई वाला है और उसमें उस तरह के अनुबंध की जरूरत है जैसा कि अमेरिका का नाटो सहयोगियों के साथ है लेकिन उसकी भारत के लिए बहुत ज्यादा प्रासंगिकता नहीं है, जो दर्शाता है कि भारत को अमेरिका के साथ ही रूस के साथ भी गहन रक्षा सहयोग बरकरार रखना चाहिए। तिल का ताड़ बनाने से कुछ भला नहीं होने वाला। 
 
(लेखक पूर्वी नौसेना कमान के पूर्व कमांडर इन चीफ हैं। वह राष्टï्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड भी सेवाएं दे चुके हैं)
Keyword: india, america, WTO,,
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