बिजनेस स?टैंडर?ड - 'मांग व खपत बढ़े बिना मेक इन इंडिया नहीं होगा सफल'
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'मांग व खपत बढ़े बिना मेक इन इंडिया नहीं होगा सफल'
संजय जोग और हंसिनी कार्तिक /  September 04, 2016

सरकार की उसके सुधारात्मक कदमों के लिए प्रशंसा करते हुए सीमेंस इंडिया के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी सुनील माथुर ने संजय जोग और हंसिनी कार्तिक को बताया कि भारत में संभावनाएं पहले जितनी ही प्रबल हैं। बातचीत के अंश:
विद्युत पारेषण विशेष रूप से वर्तमान तकनीकों में सुधार पर काफी पूंजी खर्च हो रही है। अब तक हुई प्रगति के बारे में आप क्या कहेंगे?
पावर ग्रिड दुनियाभर में तकनीक में होने वाले बदलावों को अपनाती है। वे सबसे अच्छी तकनीक हासिल कर रहे हैं और यह हकीकत है। एचवीडीसी (हाई वॉल्टेज, डायरेक्ट करंट), एसटीएटीसीओएम (स्टेटिक सिंक्रोनस कंपेंसेटर) और एसी (अल्टरनेटिंग करंट) जैसे पारेषण सिस्टम से पारेषण एवं वितरण घाटे पर रोक लगाई जा रही है। टेंडर से डिलिवरी के चरण की अवधि 2 से 3 साल है जो कमोबेश वैश्विक स्तर पर लगने वाले समय जितनी ही है। पावर ग्रिड का परियोजना प्रबंधन संभवतया विश्व में सबसे बेहतर है।

इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है...
प्रतिस्पर्धा अच्छी है। लेकिन मेरी चिंता यह है कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारतीय बाजार में आपूर्तिकर्ता घरेलू बाजार के प्रति प्रतिबद्ध हों। अगर बाहरी कंपनी आती है और ऑर्डर हासिल करती है, कीमतें घटाती है और घरेलू बाजार को प्रभावित करती है तो ग्राहक सस्ते विकल्प की तरफ जाएंगे। सीमेंस ने चीन, अमेरिका और अन्य कई देशों में फैक्टरियां हासिल की हैं। लेकिन हम भारत में 150 साल से हैं और यहां हमने भारी निवेश किया है। हमने यहां फैक्टरियां लगाई हैं और यहां निवेश की लागत है, जो उत्पाद की लागत में दिखनी चाहिए। अगर हम देश में मांग और खपत नहीं बढ़ाएंगे तब तक मेक इन इंडिया जैसी योजनाएं सफल नहीं हो पाएंगी।

क्या आप सरकार तक यह बात पहुंचा रहे हैं?
हम पहुंचा रहे हैं। अगर ग्राहक डिजिटाइजेशन, रिवस बिडिंग, ऑनलाइन बोली के आधार पर फैसला लेते हैं तो यह अच्छा है। लेकिन अर आप सबसे कम लागत को चुनते हैं तो आपको यह स्वीकार करना होगा कि सबसे कम कीमत में आपूर्ति करने वाले आपूर्तिकर्ता देश से आना जरूरी नहीं है। सरकार को कम से कम यह कहना चाहिए कि घरेलू स्तर पर विनिर्मित और आज उपलब्ध उत्पादों की घरेलू स्तर पर खपत हो।

क्या बिजली क्षेत्र में संभावनाएं बढ़ रही हैं?
प्रधानमंत्री ने जीडीपी में विनिर्माण का हिस्सा बढ़ाकर जीडीपी का 25 फीसदी करने की बात कही है, जो इस समय 15 फीसदी है। इससे 1 लाख करोड़ डॉलर पूंजी के निवेश के अवसर आएंगे।

क्या आपको रेलवे से बड़ी उम्मीद है?
रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रेलवे की हालत में काफी सुधार किया है। रेल इंजन के दो बड़े ऑर्डरों  (70,000 से 80,000 करोड़ रुपये) की निविदाएं जारी की गई थीं, लेकिन दुर्भाग्य से ये हमारे (सीमेंस) हाथों से निकल गए। लोग इसके बारे में बातचीत नहीं कर रहे हैं। विश्व में कहीं इतने बड़े ऑर्डर दिए गए हैं। रेलवे एक ऐसा संगठन है, जो देश का इंजन है।

अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को लेकर आपकी क्या योजनाएं हैं?
गमेशा (स्पेन की विंड टर्बाइन बनाने वाली कंपनी) के दुनियाभर के कारोबार के अधिग्रहण से हमें भारत में भी मदद मिलेगी। सीमेंस वैश्विक स्तर पर ऑफशोर में बाजार की अगुआ है, जबकि गमेशा ऑनशोर विंड सेगमेंट में अग्रणी है। एक साथ मिलकर हम पूरे बाजार को सेवाएं दे सकते हैं।

वर्तमान नियामकीय पहलुओं को आप किस तरह देखते हैं?
सीमेंस ने विंड मिलों के लिए ब्लेड और अन्य उपकरणों के लिए आधुनिक वातानुकूलित फैक्टरी लगाई थी। जब पहले ही दिन सीमेंस ने इसे शुरू किया तो उसने इस निवेश को खातों से हटा दिया क्योंकि सरकार ने त्वरित मूल्यहृास योजना वापस ले ली। लेकिन आज मैं फैसले लेने में ज्यादा आत्मविश्वासी हूं क्योंकि सरकार इस बात को लेकर सजग है कि उन्हें नीतियों में त्वरित बदलाव नहीं करना चाहिए।

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