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सेवाओं के खराब स्तर से गरीब मध्य वर्ग का जीवन होता दूभर
जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  August 25, 2016

एक नजरिये से देखा जाए तो नगला फतेला पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बयानबाजी सुखद संयोग ही है। इसने राष्टï्रीय मंचों पर उस गंभीर समस्या को नमूदार किया जो भारतीयों को बहुत ज्यादा जोड़ती है, जिसमें गरीब से गरीब गांव को अमीर भारतीय से जोड़ जाता है। नगला फतेला की मिसाल से पाठकों को यह समझने में मुश्किल नहीं होगी कि अभी अंतिम शख्स तक विकास पहुंचने में कितनी चौड़ी खाई मौजूद है। 

 
भारत में यह खाई नेताओं की नेक मंशा और सरकारी अमले द्वारा नीतियों को अमल में लाने में, कारोबारियों की महत्त्वाकांक्षाएं और कारोबार विकसित करने में उनके अनुभव और एक औसत भारतीय की उम्मीदें और बुनियादी जरूरतों तक उसकी पहुंच में भिन्नता दर्शाती है। यह भ्रष्टïाचार के मिश्रण, लचर संस्थागत ढांचे और भारत के परिचालन परिदृश्य में जिम्मेदारी के अभाव और नीतियों में विरूपण की दशकों पुरानी विरासत को बयां करती है। केंद्र और राज्यों की संबंधित एजेंसियों के बीच तल्ख पत्रों के आदान-प्रदान में इन नाकामियों को बहुत अच्छे से जगह मिलती है कि 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से देश के नेता ने जिस गांव को 'विद्युतीकृत' करार दिया, उसे बिजली ही नहीं मिलती। 
 
यह वर्ष 2005 में शुरू हुई ग्रामीण विद्युतीकरण अभियान की एक खेदजनक कहानी है, जिसे वर्ष 2015 में राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने नई ऊर्जा दी और इसका नाम भी राजीव गांधी के नाम से बदलकर दीनदयाल कर दिया गया और अब इसी नाम के सहारे भारत के गांव जगमगाएंगे। बिज़नेस स्टैंडर्ड की श्रेया जय ने अपने सूचनाप्रद ब्लॉग 'नगला फतेला ऐंड द रियल स्टोरी बिहाइंड रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन' (नगला फतेला और ग्रामीण विद्युतीकरण के पीछे की असल कहानी) में समस्या को दर्शाते हुए बताया कि यह तंत्र कैसे काम करता है। 
 
इस योजना के तहत केंद्र द्वारा राशि आवंटित करने के बाद राज्य विद्युतीकरण के लिए गांवों को चिह्नित कर, लागत तय कर योजना को कार्यान्वित करता है। जब कोई जिला 'विद्युतीकृत' मान लिया जाता है तो राज्य प्रमाणपत्र भी जारी करता है, जो दर्शाता है कि उससे संबंधित बुनियादी ढांचा (ट्रांसफॉर्मर, बिजली के खंभे, फीडर लिंक इत्यादि) विकसित हो गया है। इस स्व-प्रमाणन प्रक्रिया में राजग सरकार ने तार्किक रूप से कुछ नए पहलू जोड़े, जिनमें निगरानी वेबसाइट और गर्व (जीएआरवी) नाम का मोबाइल ऐप भी शामिल है। इसके अलावा तकरीबन 1,000 युवा इंजीनियर या ग्राम विद्युत अभियंताओं (जीएवी) को बिजली से वंचित गांवों का दौरा कर जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए भेजा गया। 
 
ऐसे में जमीनी स्तर से आई जीएवी रिपोर्ट अन्यथा कैसे ली जाती है? ऐसा इसलिए क्योंकि जीएवी को यही पुष्टï करना होता है कि बुनियादी ढांचा तैयार हो गया है और इसकी रिपोर्ट में यह नहीं होता कि क्या घरों में मीटर लग गए हैं और उन्हें बिजली मिलनी शुरू हुई या नहीं। यह राज्य की वितरण व्यवस्था में स्थानीय अधिकारियों की जिम्मेदारी है। श्रेया जय की रिपोर्ट में यही बात सामने आई कि नगला फतेला में तमाम घरों को बिजली मिलने तो लगी है लेकिन यह बिजली अवैध तरीकों से मिल रही है, या तो उन्होंने फीडर लाइन पर कटिया डाल रखी है या फिर स्थानीय अधिकारियों को घूस देकर मीटर लगाने से बच रहे हैं। यह सांठगांठ ग्रामीण भारत में मुफ्त बिजली वितरण के लंबे इतिहास का भग्नावशेष है और यह पुरानी मानसिकता के दम पर ही फली फूली है और नि:संदेह बिजली चोरी पर कोई दंड भी नहीं है। इस समस्या की जड़ें तमाम पहलुओं में तलाशी जा सकती हैं। मिसाल के तौर पर सार्वजनिक वितरण में, स्थानीय रोजगार कार्यक्रम में और तकरीबन हर उस सेवा या वस्तु में जहां भी सरकारी वितरण शामिल है। 
 
एक के बाद एक सरकारों ने तंत्र से जुड़ी इस समस्या का समाधान तलाशने की औचक कोशिशें कीं और उसमें तकनीक का सहारा लिया गया। मगर इन प्रयासों की भी एक सीमा हो सकती है और वे गरीब भारतीयों को छोड़ देते हैं जो संभवत: सरकारी वस्तुओं और सेवाओं पर ही आश्रित हों। लिहाजा एक दशक पहले की तुलना में अब पासपोर्ट मिलना ज्यादा आसान हो गया है, जिसका स्वतंत्रता दिवस पर दिए अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने गर्व से जिक्र किया। मगर अभी भी आवेदकों को कुछ मोर्चों पर अक्षमताओं का सामना करना पड़ेगा। मसलन सुरक्षा संबंधी पुष्टिï के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मी और उसे घर तक पहुंचाने वाले पोस्टमैन के हाथ में अभी भी इसे प्रभावित करने का मौका है। 
 
केंद्र और कुछ राज्यों द्वारा तेजी से मिल रही मंजूरियों पर चकित कंपनियों को अभी भी बिजली, पानी और अन्य स्थानीय स्वीकृतियों के लिए घटिया अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। बड़ी कंपनियों और अमीर लोगों के पास इस तरह की चीजों से निपटने के लिए सभी तरह के बंदोबस्त हैं, जो ऐसे देश में नजर नहीं आने चाहिए जो मूर्खतापूर्ण ढंग से वैश्विक पहचान बनाने की आकांक्षा रखता है। सार्वजनिक सेवाओं में इस खाई की सबसे ज्यादा मार गरीब और मध्य वर्ग को झेलनी पड़ती है। 
 
संभवत: मोदी इस सबसे बहुत अच्छी तरह वाकिफ होंगे, जिन्होंने गुजरात में इस तरह के अवरोधों को दूर करने की ख्याति अर्जित की। हालांकि देश के नेता के तौर पर उनकी मंशाएं राज्य सरकारों के प्रदर्शन की मोहताज होंगी, जिनका संस्थागत गड़बड़ी में मिला-जुला रिकॉर्ड रहा है। भारत के कायाकल्प में उनके विभिन्न नजरियों में नगला फतेला ने दर्शाया कि यही वह खाई है जो सबसे ज्यादा अहमियत रखती है और कई मर्तबा छोटी दूरी को पार करने में सबसे लंबा सफर करना पड़ता है। 
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