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फिल्मों की पाइरेसी क्यों नहीं कराती अपराध का अहसास?
मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  August 21, 2016

हाल में चंडीगढ़ में एक मां-बेटी सोने की अंगूठियां चुराते हुए पकड़ी गई थीं। उन पर आभूषणों की एक दुकान से करीब एक लाख रुपये मूल्य की अंगूठियां चुराने का आरोप था। उन लोगों को तत्काल पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। लेकिन जब हम चुराई हुई फिल्मों या टीवी शो को देखते हैं तो हमें इस अपराध का अहसास क्यों नहीं होता है? पिछले दिनों हमने कबाली और उड़ता पंजाब जैसी कुछ फिल्मों की पाइरेसी के गंभीर मामले देखे हैं। 

 
बालाजी मोशन पिक्चर्स के बैनर तले बनी फिल्म ग्रेट ग्रांड मस्ती तो अपनी रिलीज के 17 दिन पहले ही ऑनलाइन पाइरेसी साइट पर उपलब्ध हो गई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट गई। बालाजी टेलीफिल्म्स के समूह मुख्य कार्याधिकारी समीर नायर ने इस पर कहा था कि अगर हम 10 से 15 करोड़ रुपये का भी कारोबार कर सके तो हम खुद को भाग्यशाली समझेंगे। इस पाइरेसी के  चलते प्रोडक्शन हाउस को कम से कम 30 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इस फिल्म के निर्माण में करीब 15 महीने का वक्त लगा था जबकि करीब 42 करोड़ रुपये की लागत आई थी। 
 
यह तो केवल एक फिल्म की बात है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर पाइरेसी पर पूरी तरह रोक होती तो भारत का फिल्म उद्योग मौजूदा स्तर का करीब दोगुना होता। भारतीय फिल्म उद्योग के करीब 13,800 करोड़ रुपये का होने का अनुमान है। बड़ा फिल्म उद्योग होने के असर को इस तरह भी समझ सकते हैं कि सरकार को कर के रूप में अधिक राजस्व मिलता और रोजगार के भी अधिक अवसर पैदा होते। इतना ही नहीं, भारतीय फिल्म उद्योग तब चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फिल्म बाजार बन जाता। 
 
फिल्म पाइरेसी का एक चिंताजनक पहलू यह है कि इसके जरिये होने वाली आय का इस्तेमाल आतंकवाद और ड्रग तस्करी जैसी गतिविधियों में किया जाता रहा है। पिछले कई वर्षों में मैंने इस बारे में दर्जनों लोगों से गहरा वाद-विवाद किया है। वे लोग आम तौर पर कंधे उचकाते हुए यही कहते रहे हैं कि 'क्या करें, फिल्म के टिकट काफी महंगे हो गए हैं' या फिर 'फिल्म भारत/मेरे इलाके में तो रिलीज ही नहीं हुई है' के बहाने बनाते हैं। वैसे उनकी बातों में थोड़ी-बहुत सच्चाई तो जरूर है। पाइरेसी के धंधे में लगे लोग टिकटों की कीमत, रिलीज के समय और उपलब्धता जैसे मोर्चों पर दिख रही खामियों का भरपूर फायदा उठाते हैं। 
 
हालांकि फिल्म स्टूडियो ने बड़े पैमाने पर रिलीज, सिनेमाहॉल और डीवीडी रिलीज के बीच समय को कम कर और टिकटों के परिवर्तनीय मूल्यों के जरिये इन फासलों को भरने की भरसक कोशिश की है। ïïïïवॉयकॉम 18 मोशन पिक्चर्स के मुख्य परिचालन अधिकारी अजित अंधारे का कहना है कि पहले पाइरेसी गिरोहों पर छापेमारी से मामला चर्चा में आ जाता था लेकिन अब तो इसके लिए किसी भौतिक स्वरूप की जरूरत ही नहीं रह गई है। यह अमूर्तीकरण केवल बढ़ता ही जा रहा है। लंदन की तकनीकी फर्म मूसो के एक अध्ययन के मुताबिक, फिल्मों और टीवी शो की पाइरेसी करने वाली वेबसाइट को देखने के लिए तीन-चौथाई लोग वेब स्ट्रीमिंग का इस्तेमाल करते हैं। 
 
भारत में फिल्म पाइरेसी पर लगाम लगाने की सारी कोशिशें फिल्म निर्माण से लेकर सेंसर बोर्ड तक के सफर की सफाई पर टिकी हुई है। सेंसर बोर्ड के पास सर्टिफिकेट के लिए भेजी गई फिल्म प्रिंट के लीक हो जाने की घटनाएं बढ़ी हैं। इसके बाद पिछले महीने फिल्म 'ढिशूम' के निर्माताओं ने एहतियात बरतते हुए बोर्ड के पास कूटबद्ध प्रति भेजी थी। यह अपनी तरह का पहला मामला था। पाइरेसी रोकने के लिए मोशन पिक्चर डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी कुछ कदम उठाए हैं। पिछले पांच वर्षों में एसोसिएशन की तरफ से 7,000 से अधिक थिएटर मैनेजरों को इस बात का प्रशिक्षण दिया गया कि फिल्म के प्रदर्शन के दौरान उसकी कॉपी बनाने पर किस तरह से रोक लगाई जाए? बेंगलूरु के वरिष्ठ वकील अभिनव श्रीवास्तव का कहना है कि भले ही पाइरेसी एक दीवानी और फौजदारी अपराध है लेकिन इसके बावजूद पाइरेसी वाली फिल्में देखने वाले दर्शकों पर कार्रवाई की घटनाएं बहुत दिखाई देती हैं। 
 
हालांकि अधिकांश फिल्म स्टूडियो को यह डर भी सताता रहता है कि पाइरेसी रोकने के लिए अगर ज्यादा सख्ती की गई तो वे फिल्मों से भी दूर हो सकते हैं। मूसो के मुख्य वाणिज्यिक अधिकारी क्रिस्टोफर एल्किंस का सुझाव है कि पाइरेसी कॉपी देखने वाले दर्शकों को स्टूडियो अपने लिए एक अवसर के रूप में देख सकते हैं। उनकी इस बात में दम लगता है। नैप्सटर का जन्म 1999 में हुआ था जब एमपी3 तकनीक ने डिजिटल फाइल को कम्प्रेस कर ऑनलाइन करना काफी हद तक आसान बना दिया था। नैप्सटर तो कुछ समय बाद ही बंद हो गया लेकिन संगीत उद्योग ने फाइल शेयर करने वाली तमाम साइट की घेरेबंदी की कोशिश की। उस समय संगीत प्रेमियों को न चाहते हुए भी पूरी एक सीडी खरीदनी पड़ती थी, भले ही उसके अधिकांश गाने उन्हें नापसंद हों। ऐसी स्थिति में वे बहुत कम और चुने हुए सीडी ही खरीदते थे। नतीजा यह हुआ कि संगीत उद्योग की हालत ही चौपट हो गई। बाद में जब पेंडोरा, आईट्यून्स और सावन जैसी संगीत की साइट ने उपभोक्ताओं को अपनी पसंद के हिसाब से गाने चुनने की आजादी दी तो उसी संगीत उद्योग की रौनक फिर से लौट आई। बहरहाल यह इस पूरे मामले का एक कारोबारी समाधान ही है। जब तक पाइरेसी से जुड़े नैतिक सवालों के जवाब नहीं तलाश लिए जाते, तब तक यह सभी रचनात्मक उद्योगों के लिए खतरा बना रहेगा। इंटरनैशनल फेडरेशन ऑफ फोनोग्राफिक इंडस्ट्री के मुताबिक, इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले हर पांचवें शख्स की पाइरेटेड संगीत तक पहुंच बनी हुई है। ऐसे में यही लगता है कि पाइरेसी के जरिये चुराई हुई फिल्मों को देखना भी हर कहानी की तरह अच्छाई और बुराई के बीच एक जंग बना रहेगा।  
Keyword: film, movie, piracy,,
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