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पूर्ण सुधार जरूरी
संपादकीय /  July 25, 2016

खबर है कि केंद्र सरकार रेल बजट को अलग से पेश करने की परंपरा खत्म करने पर विचार कर रही है। नीति आयोग के सदस्य विवेक देवरॉय की अध्यक्षता वाली एक समिति की अनुशंसा पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस प्रस्ताव को लेकर रेल मंत्रालय की राय मांगी है। इस समाचार पत्र में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने भी इसका समर्थन किया है। यानी देश के सबसे बड़े परिवहन नेटवर्क के लिए अलग बजट पेश करने की 93 साल पुरानी परंपरा खत्म हो सकती है। 
 
प्रभु ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है, इसमें चकित होने वाली कोई बात नहीं है। वह पहले ही कुछ ऐसे कदम उठा चुके हैं जो उनको अन्य रेल मंत्रियों से अलग करते हैं। उन्होंने रेल बजट में नई ट्रेनों की घोषणा की दशकों पुरानी परंपरा तो बंद की ही, उन्होंने रेल क्षमता निर्माण, स्टेशनों के आधुनिकीकरण आदि में निजी क्षेत्र की भागीदारी से निवेश की प्रतिबद्घता भी जताई। उन्होंने एक रेल शुल्क प्राधिकरण के गठन की बात की जो किराये और माल भाड़े को राजनीतिक असर से दूर रखेगा। 
 
संभव है इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर उनकी गति नौकरशाही की शिथिलता और कुछ मामलों में प्रतिरोध के चलते धीमी हो। परंतु इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं रहा कि प्रभु रेलवे परिचालन को किफायती बनाने और ग्राहकों की संतुष्टिï का स्तर सुधारने के लिए उत्सुक हैं। ऐसे में रेल बजट पर उनका रुख अन्य पहल के अनुरूप ही प्रगतिशील है और उसका स्वागत किया जाना चाहिए। 
 
वर्ष 1924 में जब अलग रेल बजट पेश करने की परंपरा शुरू हुई तब से अब तक देश की अर्थव्यवस्था में भारतीय रेल की महत्ता काफी बदल चुकी है। उस वक्त रेल बजट केंद्र सरकार के कुल बजट का तकरीबन 85 प्रतिशत हिस्सा होता था जो अब 10 प्रतिशत से भी कम रह गया है। उन दिनों देश की कुल माल ढुलाई में भारतीय रेल की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से अधिक होती थी जो आज घटकर 40 प्रतिशत से भी कम रह गई है। 
 
आश्चर्य नहीं कि आज भारतीय रेल देश के सकल घरेलू उत्पाद में दो फीसदी से भी कम योगदान करता है। यकीनन देश की आधा दर्जन से अधिक शीर्ष कंपनियां जिनमें कुछ सरकारी कंपनियां भी शामिल हैं, भारतीय रेल के कुल कारोबार से अधिक कारोबार करती हैं। अगर भारतीय रेल के कारोबारी आकार की तुलना अन्य आर्थिक संस्थाओं से की जाए तो ऐसी कोई वजह नहीं दिखती जिसके चलते अलग रेल बजट की परंपरा जारी रखी जा सके। विकल्प के तौर पर आम बजट में ही रेलवे के राजस्व और व्यय को अलग से रेखांकित किया जा सकता है। 
 
हालांकि इस दौरान भी तीन बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है। पहली बात, अलग रेल बजट पेश करने की परंपरा खत्म करने का यह अर्थ नहीं होना चाहिए कि किराये और माल भाड़े की वार्षिक समीक्षा का काम वित्त मंत्री करने लगें। यात्री किराये और माल भाड़े का जिम्मा प्रस्तावित रेल शुल्क प्राधिकरण को ही सौंपा जाना चाहिए। दूसरी बात, अलग रेल बजट की परंपरा खत्म करने के बाद लेखा नीति में भी बदलाव लाने की आवश्यकता है। ताकि भारतीय रेल को केंद्र से मिलने वाले बजट सहयोग के लिए लाभांश देने के बोझ से निजात मिल सके। आखिर में, इस बदलाव में फ्रेट कॉरिडोर, रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण और लोकोमोटिव फैक्टरियों को अद्यतन बनाने से संबंधित परियोजनाओं की गति तेज की जानी चाहिए। इन सुधारों के बिना भारतीय रेल सुधार अधूरे ही रहेंगे।
 
Keyword: rail budget, niti aayog,,
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