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भारत, यूरोप और जनमत संग्रह
सुमन बेरी /  June 22, 2016

ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने या न रहने को लेकर हो रहे जनमत संग्रह में भारत का भी काफी कुछ दांव पर लगा है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं सुमन बेरी 

 
ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने या न रहने के बारे में जनमत संग्रह आज हो जाएगा। आज का स्तंभ मुख्यतौर पर यूरोप और यूरोप में ब्रिटेन की स्थिति पर केंद्रित है परंतु घरेलू मुद्दों की बात करें तो दिल्ली का जिक्र भी इसमें लाजिमी तौर पर आएगा। मुझे नीदरलैंड से दिल्ली आए तीन सप्ताह बीत गए हैं और यह काफी चौंकाने वाला अनुभव है कि गर्मियों की छुट्टïी, फुटबॉल और क्रिकेट को छोड़ दिया जाए तो ब्रिटेन और शेष यूरोप से लोगों का बहुत कम लेनादेना है। 
 
यह बात थोड़ी पहेलीनुमा है क्योंकि यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है। यूरोपीय आयोग के वर्ष 2014 के आंकड़े बताते हैं कि यूरोप के साथ हुआ 75 अरब  यूरो (57 खरब रुपये से अधिक) का वस्तुओं का कारोबार अमेरिका और यूरोप के बीच हुए 48 अरब यूरो के कारोबार से खासा ज्यादा है। चूंकि यूरोपीय संघ सैद्घांतिक तौर पर एक कारोबारी समूह है इसलिए कारोबारी रिश्ते का आधार भी यही है। भूगोल और इतिहास ने भी भारत को सदियों से यूरोप के साथ जोड़ रखा है। सिकंदर महान से लेकर रोम और फिर ब्रिटिश शासन तक हमारा उससे रिश्ता बरकरार रहा। 
 
जैसा कि जैमिनी भगवती ने कुछ दिन पहले इस समाचार पत्र में लिखा था, देश का बुर्जुआ वर्ग बाहरी सौदों में सैन्य सुरक्षा को लेकर कुछ ज्यादा ही आकर्षित है। जबकि इस मामले में यूरोपीय संघ ने अपनी अधिकांश जिम्मेदारी नाटो पर डाल रखी है जो अमेरिकी खीझ और चिढ़ की वजह है। इस समय जर्मनी स्पष्टï रूप से यूरोपीय संघ की शीर्षस्थ ताकत है। सैन्य शक्ति के प्रयोग को लेकर उसकी सहज सावधानी भी ब्रिटेन और फ्रांस की उस अनिच्छा को मजबूत करती है जो उनमें अपनी विदेश नीति स्वायत्तता का समर्पण करने को लेकर विद्यमान है। 
 
यूरोप में भारत की घटती रुचि यह भी दिखाती है कि सन 2008 के वित्तीय संकट के बाद से यूरोप भी काफी हद तक अपने में सिमट गया है। यूरो क्षेत्र की बात करें तो इस संकट ने कर्जदाता और कर्ज लेने वाले सदस्य देशों के बीच गहरा आर्थिक तनाव भी पैदा किया है। यह तनाव यूरो के समर्थक और विरोधी खासतौर पर ब्रिटेन के बीच भी पनपा है। वर्ष 2013 में यूरो की स्थिति थोड़ी सुधरने के बाद यूरोप में इस्लामिक देशों से शरण चाहने वाले और आर्थिक प्रवासियों की बाढ़ आ गई। इस दौरान वह अपनी मुस्लिम आबादी के कट्टïर होने को लेकर भी सचेत हुआ। इन सबसे बढ़कर रूस के सुरक्षा रुख में तेज बदलाव देखने को मिला। यह बदलाव खासतौर पर यूक्रेन में और हाल के दिनों में बाल्टिक में दिखा।
 
ब्रिटेन मोटे तौर पर इन समस्याओं से बचा रहा। वह यूरो क्षेत्र का हिस्सा नहीं है और वर्ष 2008 के संकट से वह काफी हद तक उबरने में भी कामयाब रहा। खासतौर पर बेरोजगारी के मामले में। वह हाल के दिनों में शरणार्थियों की समस्या से भी काफी हद तक बचा हुआ है। इसके बावजूद तमाम वजहों के चलते ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को यह जरूरत महसूस हुई कि ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में बने रहने या न रहने का फैसला जनमत संग्रह के आधार पर लिया जाए। 
 
ब्रिटिश प्रेस का भरोसा किया जाए तो तमाम गलत आकलनों के चलते इस जनमत संग्रह का नतीजा सरकार की उम्मीद की तुलना में कहीं अधिक अनिश्चित हो गया है। ब्रिटेन में एक अत्यंत ध्रुवीकृत बहस अब मोटे तौर पर दो मुद्दों के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई है। पहला, यूरोपीय संघ से बाहर होने के आर्थिक प्रभाव और दूसरा ब्रिटेन में कुल आव्रजन का प्रभाव क्योंकि वह अन्य सदस्य देशों से श्रमिकों के नि:शुल्क आगमन की इजाजत देने के लिए बाध्य है। इस कड़वी और बांटने वाली बहस में उलझा ब्रिटेन पिछले दिनों उस वक्त सकते में आ गया जब संसद की एक युवा और लोकप्रिय सदस्य की सरे राह हत्या कर दी गई। हालांकि यह बात सीधे तौर पर जनमत संग्रह से संबंधित नहीं है लेकिन ऐसी भावना प्रबल है कि ब्रिटिश समाज में घृणा बढ़ रही है जो इसमें अपनी भूमिका निभा सकती है। 
 
जनमत संग्रह के नतीजे को लेकर यूरोपीय संघ में ब्रिटेन के साझेदार भी खासे चिंतित हैं। यूरो की सदस्यता लेने से इतर इससे बाहर होने वाले सदस्य के लिए कुछ औपचारिक प्रावधान हैं जिन पर चर्चा आवश्यक है। जाहिर है अगर जनता यूरो क्षेत्र से बाहर निकलने का निर्णय लेती है तो संसद तत्कालीन प्रधानमंत्री को इस संबंध में पहल करने का निर्देश देगी। यह पूरी तरह अप्रत्याशित भी नहीं होगा। ग्रीनलैंड ने सन 1985 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय से अलग होने का निर्णय लिया था। यह संस्थान यूरोपीय संघ का पूर्ववर्ती था। यह चिंता भी है कि ब्रिटेन द्वारा पेश की गई नजीर अन्य सदस्य देशों को भी पसंद आ सकती है। निश्चित तौर पर जर्मनी विरोधी रुझान फ्रांस जैसे अन्य देशों मे भी मजबूत है। 
 
अगर वित्तीय बाजारों की बात करें तो उनमें ऐसी भावना है कि हाल के दिनों में ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के अभियान को धक्का पहुंचा है और वहां के लोग बजाय अलग होने के संघ में बने रहने के लिए मतदान करेंगे। अगर मेरे पास वहां मतदान का अधिकार होता तो मैं भी यही करता। इस लिहाज से कहा जाए तो मेरा विचार यही है कि यूरोपीय संघ में बने रहने के अभियान ने लंबी अवधि के आर्थिक प्रभाव को थोड़ा बढ़ाचढ़ाकर पेश किया है। प्रथमदृष्टïया यह बात थोड़ा चौंकाने वाली लगती है कि किसी संघ से बाहर निकलना नुकसानदेह हो सकता है। खासतौर पर तब जबकि शुल्क का स्तर अपेक्षाकृत कम हो। 
 
इसलिए मेरे लिए ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने को लेकर प्रमुख चिंताएं राजनीतिक हैं। इन्हीं चिंताओं के भारत के लिए कुछ कूटनयिक हित भी होने चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि ब्रिटेन का पिछला एक दशक कठिनाई भरा रहा है। इस दौरान वहां कई गलतियां भी की गईं। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्रीय और उससे इतर अधिकार क्षेत्र आपसी व्यवहार के लिहाज से इसे थोड़ा अजीब और प्राय: आत्मप्रशंसित समकक्ष बनाते हैं। लेकिन तमाम खामियों के बावजूद एक मिलाजुला यूरोप अमेरिकी और चीनी दबदबे का एक विश्वसनीय उत्तर प्रतीत होता है। इस लिहाज से भी भारत को यह कामना करनी चाहिए कि यूरोपीय संघ बना रहे और सफल भी रहे।  
Keyword: india, Europe, britain, brexit,,
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