बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकारी बैंकों में सुधार का व्यापक असर
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सरकारी बैंकों में सुधार का व्यापक असर
यदि सरकारी बैंकों में व्यवस्थागत सुधारों को अंजाम दिया जा सका तो यह बात देश में पूंजी की उत्पादकता पर सकारात्मक असर डालेगी। विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश
आकाश प्रकाश /  June 20, 2016

यदि सरकारी बैंकों में व्यवस्थागत सुधारों को अंजाम दिया जा सका तो यह बात देश में पूंजी की उत्पादकता पर सकारात्मक असर डालेगी। विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश

हाल ही में मुझे देश में वित्तीय क्षेत्र के विभिन्न अंशधारकों के साथ कुछ समय बिताने का अवसर मिला। जाहिर है सरकारी बैंकों की खस्ता हालत हमारी चर्चा के केंद्र में रही। इसे लेकर मिलेजुले विचार सामने आए। कुछ लोगों का कहना था कि सरकारी बैंकों की स्थिति मायने ही क्या रखती है। वे भी प्रतिस्पर्धा मिलने पर अन्य सरकारी संस्थानों की नियति को प्राप्त होंगे और समय के साथ नष्टï हो जाएंगे। दूसरों के मुताबिक खत्म हो जाना कोई विकल्प नहीं है क्योंकि ये बैंक बहुत बड़े और महत्त्वपूर्ण हैं। देश के बैंकिंग क्षेत्र में इनकी हिस्सेदारी 70 प्रतिशत है और बिना इनके हमें वृद्घि के लिए ऋण कैसे मिलेगा? बातचीत से निकले कुछ स्पष्टï निष्कर्ष इस प्रकार हैं:
1. अधिकांश लोगों का मानना था कि सरकारी बैंकों की बाजार हिस्सेदारी में नाटकीय कमी आ सकती है। अभी इसमें सालाना एक प्रतिशत की कमी देखने को मिल रही है। अधिकांश लोगों का मानना है कि यह दर तीन गुनी हो जाएगी। परिसंपत्ति क्षेत्र में यह गिरावट अधिक है लेकिन माना जा रहा है कि जवाबदेही के मामले में भी यही होने जा रहा है। दो या तीन निजी बैंकों से जब पूछा गया कि डिजिटल युग में भी वे शाखा विस्तार करने पर जोर क्यों दे रहे हैं तो उन्होंने कहा कि वे जवाबदेही के हस्तांतरण की तैयारी कर रहे हैं। कई बैंकों ने तो कमजोर सरकारी बैंकों के ग्राहक आधार का शाखावार पूरा खाका तैयार कर रखा है। वे उच्च गुणवत्ता वाले ग्राहकों का रुख करेंगे और उनकी फंडिंग की जरूरतों पर ध्यान देंगे। यह सब हुआ तो सरकारी बैंकों के मुनाफे पर और बुरा असर होगा।
2. अधिकांश निवेशकों का मानना है कि सरकारी बैंकों का क्षेत्र निवेश योग्य नहीं है और वहां पुनर्पूंजीकरण की सख्त आवश्यकता है। ऐसे में निजी बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों का मूल्यांकन बढऩा तय है। मैं पहले ही कई बार कह चुका हूं कि इस क्षेत्र में मूल्यांकन संबंधी विसंगतियां हैं। सरकारी बैंकों का कुल बाजार पूंजीकरण एचडीएफसी बैंक से कम है। अब यह दायरा बढ़कर वित्तीय कंपनी क्षेत्र तक आ गया है। एनबीएफसी की बाजार हिस्सेदारी सरकारी बैंकों के दोगुनी हो चुकी है। यानी निवेशकों को यकीन है कि कोई भी वित्तीय संस्थान जिसके पास पर्याप्त पूंजी और प्रतिस्पर्धी फंडिंग लागत हो वह सफल होगा। बढ़ते ऋण क्षेत्र के साथ अर्थव्यवस्था को  12-13 फीसदी की दर से बढऩा चाहिए। वहीं व्यवस्थागत ऋण वृद्घि 15 फीसदी से अधिक होनी चाहिए जबकि 70 फीसदी व्यवस्था 7-8 प्रतिशत से तेज बढऩे लायक नहीं है। अधिकांश बेहतर संचालित वित्तीय संस्थान 20-25 प्रतिशत की दर से बढ़ सकते हैं। इस वजह से भी निजी संस्थान बढ़े हैं।
3. कई कारोबारियों को लगा कि वे आर्थिक वृद्घि में योगदान दे सकते हैं। बॉन्ड बाजार को भी प्रचारित किया गया। वृहद स्थिरता के साथ भारतीय ऋण के लिए वैश्विक मांग को तेज माना जाने लगा। आरबीआई देनदारों को सीमित करने और बड़े कर्जदारों की पहुंच सीमित करने के लिए नए नियम बना रहा है। बेसल नियम के तहत नए नकदी अनुपात से कॉर्पोरेट कागजात और आकर्षक होंगे। कई लोगों की धारणा थी कि मजबूत निजी बैंक और एनबीएफसी वृद्घि और मजबूत बॉन्ड बाजार और विदेशी पूंजी की आवक मिलकर सरकारी बैंकों की कमी पूरी कर देंगे। इस समूह ने यह नहीं देखा कि सरकारी बैंक वृद्घि को प्रभावित कर रहे हैं। ऋण में मिलेजुले बदलाव को लेकर भी चिंता थी। सरकारी बैंकों की एसएमई फ्रैंचाइजी बढिय़ा है। वे सही मायनों में हमारी व्यवस्था के वेंचर कैपिटलिस्ट रहे हैं। अगर वे कारोबार से हट गए तो लाखों की संख्या में छोटे उद्यमियों को ऋण कैसे मिलेगा? यह क्षेत्र पूरी तरह निजी बैंकों के दायरे में नहीं आता। उनको एनबीएफसी की फंडिंग की आवश्यकता होगी लेकिन बढ़ी हुई लागत पर।
4. सारे संकेत कह रहे हैं कि सरकारी बैंक ऋण देने, जोखिम लेने या किसी तरह का अग्रगामी कदम उठाने तक में अक्षम हैं। भारतीय स्टेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा को छोड़कर कोई सरकारी बैंक निर्णय लेने का इच्छुक नहीं नजर आता। इसकी वजह से निस्तारण प्रक्रिया धीमी हो रही है और व्यवहार लेकिन तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का निवारण करने में भी दिक्कत हो रही है। ऐसी भावना भी है कि बैंक बोर्ड ब्यूरो के प्रस्तावित कदमों के लागू होने के बाद और अधिक परिसंपत्तियों की बिक्री और बैलेंस शीट का पुनर्गठन देखने को मिल सकता है।
5. नए दिवालिया कानून को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया है। अंतरराष्टï्रीय निवेशकों ने इस विधेयक को 10 में से 8 अंक दिए हैं। उनका कहना है कि इसमें उनकी इच्छा के मुताबिक सभी बातें शामिल हैं। हालांकि इसे पूरी तरह क्रियान्वित होने में दो साल का वक्त लगेगा। कई नए संस्थान और विशेष सेवा प्रदाता बनाने होंगे। निवेशक इनके क्रियान्वयन पर करीबी निगाह रखेंगे।
6. बैंक बोर्ड ब्यूरो को लेकर भी सकारात्मकता का माहौल था। इसने बैंकों की वास्तविक समस्या को समझने का प्रयास किया। इसे जरूरी राजनीतिक समर्थन भी हासिल दिख रहा था और इसके तेजी से काम करने की उम्मीद थी। यह बोर्ड लंबी अवधि की व्यवस्थागत कमियों से भी जूझने की कोशिश कर रहा था, बजाय कि तात्कालिक हल तलाश करने के। वह नई प्रतिभाएं लाने का प्रयास कर रहा था, उसने पुराने कर्मचारियों के लिए प्रोत्साहन बढ़ाया और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि निर्णय प्रक्रिया बाधित न हो। यह भावना भी एकदम स्पष्टï थी कि नए सत्ता प्रतिष्ठïान के अधीन राजनीतिक हस्तक्षेप बंद है। यह भी स्पष्टï था कि बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी को 51 प्रतिशत से कम करने की कोई कामना नहीं दिख रही थी। बैंकों को अपनी परिसंपत्ति और धारिता बेचने, परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण करने के लिए मजबूर किया जाएगा। आशा थी कि यह सब करके बेहतर बैंकों में जरूरी बदलाव लाए जा सकेंगे।
7. परिसंपत्ति की गुणवत्ता की समीक्षा की बात करें तो अधिकांश लोगों का मानना था कि यह यह अच्छी चीज थी कि क्योंकि इससे कम से कम समस्या उजागर तो हुई। हमारी अधिकांश समस्याओं का संबंध धारणा से ही है। इसने प्रवर्तकों के व्यवहार में भी बड़ा अंतर पैदा किया।
ऐसे में एक मिलीजुली तस्वीर सामने आती है। जिसमें निजी कारोबारियों के लिए अवसर, सरकारी बैंकों के लिए बाधाएं तो हैं ही साथ ही यह उम्मीद भी है कि हमें जरूरत के लिए फंड मिल सकता है। कहा जा सकता है कि कार्य प्रगति पर है। कुछ प्रमुख चुनौतियों को हल करने की दिशा में काम हो रहा है। अधिकांश पीएसयू बैंकों का 15-20 प्रतिशत कर्ज फंसा हुआ है। यह बड़ी समस्या है। यहां अगर व्यवस्थागत सुधारों को अंजाम दिया जा सका तो इसका अर्थव्यवस्था में पूंजी की उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव होगा।

Keyword: PSU banks, systemic reforms, Capital,
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