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चामलिंग शैली की राजनीति को क्या मिलेगी चुनौती ?
सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 17, 2016

सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग देश में सर्वाधिक समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। वह पांचवीं बार राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कामकाज संभाल रहे हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी लेकिन उनकी दिल्ली यात्रा मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाईं। लेकिन वह तो इन बातों से बेपरवाह रहते हैं। वह एक ऐसे राज्य के मुख्यमंत्री हैं जो मानव विकास सूचकांक के अधिकांश मानकों में बहुत अच्छी स्थिति में है। ये उपलब्धियां उनके मुख्यमंत्री रहते समय ही हासिल की गई हैं। यह सच है कि उन पर भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के कई आरोप लग चुके हैं। इन मामलों में उनकी दो पत्नियों और उनके बच्चों के अलावा रिश्तेदारों के शामिल होने के भी आरोप लगते रहे हैं। इसके बावजूद सिक्किम के लोगों ने उन्हें बार-बार चुनाव जिताया है। वैसे वर्ष 2014 में हुए पिछले चुनाव में लोगों ने चामलिंग को कुछ चेतावनी भी दी। 

 
चामलिंग एक सामान्य खेतिहर परिवार से हैं। उनकी इच्छा ऊंची तालीम हासिल करने की थी लेकिन गरीबी की वजह से उनकी यह इच्छा अधूरी ही रह गई। मजबूरी में उन्होंने पुलिस विभाग में क्लर्क की नौकरी करनी शुरू की लेकिन अपने कवि-हृदय के कारण उनका मन इसमें नहीं लगा। उसी दौरान सिक्किम के भारतीय संघ में विलय को लेकर बड़े पैमाने पर चल रहे आंदोलन से वह प्रभावित होकर सार्वजनिक जीवन में कूद पड़े। चामलिंग के मुताबिक सिक्क्मि नरेश चोग्याल के खिलाफ हुआ विद्रोह असल में एक क्रांति थी जिसने काजी शासन को उखाड़कर फेंक दिया और समूचे सिक्किम के युवाओं को जोश से भर दिया था। 
 
इन्हीं लोगों में नरबहादुर भंडारी भी थे जो आगे चलकर सिक्किम के मुख्यमंत्री बने। चामलिंग ने पहली बार अपना विधानसभा चुनाव 1989 में बंपर वोटों से जीता था। उन्हें 96.6 फीसदी मत हासिल हुए थे। उनकी बेशुमार लोकप्रियता को देख भंडारी ने भी उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव दे दिया। चामलिंग ने उनकी पेशकश स्वीकार तो कर ली लेकिन दोनों क ा साथ ज्यादा लंबा नहीं चल पाया। ढाई साल तक भंडारी सरकार में मंत्री रहने के बाद चामलिंग ने इस्तीफा दे दिया और वर्ष 1993 में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रं ट (एसडीएफ) के नाम से एक नई पार्टी बना ली। उसके बाद से चामलिंग ने कामयाबी का इतिहास रचना शुरू कर दिया। अगले ही साल हुए विधानसभा चुनाव में एसडीएफ ने 32 में से 19 सीटों पर कब्जा कर लिया और चामलिंग पहली बार इस राज्य के मुख्यमंत्री बने। उसके बाद तो 1999, 2004, 20009 और फिर 2014 में हुए विधानसभा चुनावों में वह अपनी कामयाबी दोहराते चले गए। वर्ष 2009 में हुए चुनाव में तो उनकी पार्टी ने सभी 32 सीटें जीत ली थी। 
 
इस शानदार रिकॉर्ड को देखकर यह सवाल उठता है कि चामलिंग ने यह मुकाम हासिल कैसे किया? उन्होंने लिम्बू और तमांग समुदायों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए लंबा संघर्ष किया और इसमें सफल भी हुए। सिक्किम में 20 फीसदी आबादी भूटिया-लेप्चा समुदाय की है और 40 फीसदी आबादी में नेवार जैसी अन्य पिछड़ी जातियां शामिल हैं। लिम्बू, राई और तमांग समुदायों की संख्या भी कुल आबादी का करीब 20 फीसदी है। जब ये जातियां आरक्षण के  दायरे में आ गईं तो स्वाभाविक तौर पर चामलिंग का सामाजिक आधार मजबूत हो गया। 
 
लेकिन के वल पहचान की राजनीति से बात नहीं बन सकती थी। आपको सरकार में रहते हुए काम करके भी दिखाना होता है और चामलिंग ने इस मोर्चे पर भी खुद को साबित किया है। योजना आयोग (अब नीति आयोग) के आंकड़ों के  मुताबिक सिक्किम गरीबी को कम करने में सबसे ज्यादा सफल हुआ है। वर्ष 2004-5 की 30.9 फीसदी आबादी के मुकाबले 2011-12 में केवल 8.2 फीसदी आबादी ही गरीबी रेखा के नीचे रह गई थी। संयुक्त राष्ट्र विकास कोष के सहयोग से 2014 में तैयार सिक्किम मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट से यह तस्वीर और ज्यादा साफ हो जाती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2001 और 2012 के बीच सिक्किम का शुद्ध घरेलू उत्पाद 17 फीसदी की वार्षिक दर से बढ़ा है जबकि राष्ट्रीय औसत 10 फीसदी था। यह देश के सभी राज्यों में सबसे ज्यादा दर थी।
 
सिक्किम क ी मानव विकास रिपोर्ट से साफ होता है कि उद्योग और विनिर्माण क्षेत्रों के साथ ही सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देकर यह उच्च वृद्धि दर हासिल हुई है। इसमें कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग नगण्य है। ऊंची विकास दर का परिणाम यह हुआ कि सिक्किम में प्रति व्यक्ति आय 2001 की तुलना में लगभग चार गुना बढ़कर 2011-12 में 69 हजार 202 रुपये हो गई। आज के समय में सिक्किम न केवल उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे आगे है बल्कि पूरे देश में पांचवें स्थान पर है। सामाजिक क्षेत्रों पर सरकार का प्रति व्यक्ति खर्च 2001 के 4,810 रुपये से बढ़कर 2012 में 28,661 रुपये पर पहुंच गया। इस अवधि में शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों पर खर्च में क्रमश: 12 और 18 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई।  
 
इन सबके बावजूद एसडीएफ के लिए वर्ष 2014 का चुनाव परिणाम थोड़ा निराशाजनक कैसे हो गया? भले ही चामलिंग सरकार बनाने में कामयाब हो गए लेकिन उनकी पार्टी 32 में से 22 सीटें ही जीत पाई। बाकी 10 सीटें एक साल पहले ही बनी पार्टी सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा ने जीत ली थीं। कभी चामलिंग के सहयोगी रहे प्रेम सिंह तमांग ने यह नई पार्टी बनाई है। हो सकता है कि यह सिक्किम के निवासियों की कुछ ज्यादा की चाहत रखने का नतीजा हो या फिर व्यवस्था में फैल रहे भ्रष्टाचार के बारे में दिख रहे संकेत हों। दोनों ही स्थितियों में वर्ष 2019 में होने वाले चुनाव चामलिंग की कड़ी परीक्षा ले सकते हैं।
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