बिजनेस स्टैंडर्ड - आईटी में दाम से ज्यादा रास आ रहा सरकारी काम
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आईटी में दाम से ज्यादा रास आ रहा सरकारी काम
विभु रंजन मिश्रा /  June 07, 2016

मार्च के आखिर की बात है कंपनी मामलों के मंत्रालय (एमसीए) के नए नवेले पोर्टल पर शिकायतों का अंबार लगता जा रहा था। ऐसे में मंत्रालय के सचिव तपन रे ने इन्फोसिस के सीईओ एवं प्रबंध निदेशक विशाल सिक्का को तुरंत इस कमी को दुरुस्त करने के लिए ई-मेल लिखा। इन्फोसिस ही इस पोर्टल का प्रबंध करती है। रे को तुरंत जवाब भी मिल गया, जिसमें सिक्का ने प्रतिबद्घता जताई कि इन्फोसिस हरसंभव प्रयास करेगी ताकि उपभोक्ताओं को इस्तेमाल में कोई परेशानी पेश न आए। उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि वह अपने सबसे बेहतरीन लोगों को इसे दुरुस्त करने का जिम्मा सौंपेंगे। हालांकि इन्फोसिस की कुल कमाई में भारतीय बाजार की हिस्सेदारी काफी कम (तकरीबन 3 फीसदी) है, मगर त्वरित कार्रवाई यही दर्शाती है कि यह कारोबार भी कंपनी के लिए बेहद अहम है कि इसके लिए वह अपने तेजतर्रार लोगों को भी मोर्चे पर लगा सकती है। 

 
जहां एमसीए के साथ इन्फोसिस का यही दावा है कि तंत्र कमोबेश सामान्य हो गया है, मगर इस अनुबंध ने उन ज्वलंत मसलों को सामने रख दिया, जिनका सामना अमूमन आईटी सेवा प्रदाताओं को सरकार को सेवा मुहैया कराने के दौरान करना पड़ता है। सरकारी संस्थाओं से हासिल कोई भी (या बेहद दुर्लभ) अनुबंध तकनीकी कंपनियों के लिए लाभप्रद नहीं है। अधिकांश मौकों पर परियोजना का दायरा और आज्ञापत्र उचित रूप से परिभाषित नहीं होते। हस्ताक्षर होने के बाद भी परियोजना को सिरे चढ़ाने में लंबा वक्त लग जाता है। 
 
वहीं परियोजना के दौरान सेवा प्रदाता को जमीनी स्तर पर तमाम अंशभागियों से जूझना पड़ा है, जिससे डेटा ट्रांसफर और दूसरे अहम काम सुस्ती के शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा भुगतान में देरी होना तो बेहद आम है। इससे कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि अमूमन सिस्टम इंटीग्रेटर के तौर पर काम करने वाले सेवा प्रदाता को हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और अन्य तकनीकी जरूरतों के लिए शुरुआती भुगतान अपनी जेब से करना पड़ता है। डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन ऐंड एंटरप्राइज ऐप्लीकेशन में स्वतंत्र सलाहकार एवं थॉट लीडर सुनील पद्मनाभ कहते हैं, 'भारत सरकार के ग्राहकों के साथ विभिन्न अंशभागियों के बीच आम सहमति बनाना भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि बहुराष्टï्रीय कंपनियों की तुलना में उनके पास प्रणालियों का अभाव होता है।'
 
लुभावने सरकारी अनुबंध! 
 
फिर भी छोटी बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां सरकारी अनुबंधों को हासिल करने के लिए कड़ी जद्दोजहद करती हैं, जो सबसे निचली बोली लगाने वालों को आवंटित किया जाता है और कई मर्तबा बेहद कम मुनाफा मार्जिन पर हासिल होता है। ऐसा संभवत: इस वजह से होता है कि सरकारी अनुबंध कंपनियों के लिए अपनी ब्रांड छवि चमकाने का अहम जरिया माने जाते हैं, जहां वे एक अरब से ज्यादा लोगों के जीवन में डिजिटल क्रांति लाने में भूमिका का श्रेय ले सकती हैं। यह उनकी उपलब्धियों में चार चांद लगा देता है। 
 
माइंडट्री की ही मिसाल लें। जुलाई, 2010 में बेंगलूरु की इस कंपनी को भारतीय विशेष पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) से इस परियोजना के लिए आवेदन फॉर्म विकसित करने और उसके रखरखाव का अनुबंध मिला। भले ही यह कुछ करोड़ रुपये का ही अनुबंध था लेकिन कंपनी ने कहा कि यह उसके लिए महज एक अनुबंध से बढ़कर है। बिज़नेस स्टैंडर्ड को पूर्व में दिए साक्षात्कार में माइंडट्री के कार्यकारी चेयरमैन कृष्णकुमार नटराजन ने बताया था, 'यूआईडीएआई ने हमें निश्चित रूप से बड़ा फलक दिया। किसी भी अन्य चीज की तुलना में इसने समूचे संगठन में अद्भुत विश्वास का संचार किया। अब हम इतने दृढ़विश्वास से ओतप्रोत हैं कि हम जिन बड़ी परियोजनाओं में क्षमता रखते हैं, वहां भी दुनिया के दिग्गजों के साथ होड़ कर जीत भी सकते हैं।'
 
उद्योग जानकारों का मानना है कि सरकारी अनुबंधों को लेकर आईटी कंपनियों की चाह की एक वजह यह भी हो सकती है कि चीन (जो भारतीय कंपनियों के लिए खास बाजार नहीं है) को छोड़कर दुनिया में कोई अन्य देश किसी भी तंत्र की सक्षमता को जांचने के लिए बड़ा दायरा मुहैया नहीं कराता। यही वजह है कि भारत देर-सवेर देसी एवं विदेशी तकनीकी कंपनियों के लिए जांच परख का अखाड़ा बनता जा रहा है।   
 
तेजी पकड़ता बाजार  
 
तमाम अन्य बड़ी भारतीय एवं वैश्विक आईटी कंपनियों की तुलना में इन्फोसिस ने देसी बाजार पर कुछ देरी से ध्यान देना शुरू किया और उसने वर्ष 2008 में जाकर ही उसके लिए अलग कारोबारी श्रेणी बनाई। तबसे कंपनी ने देश में सरकारी एवं निजी दोनों क्षेत्रों में कुछ बेहतरीन सौदों को अंजाम दिया है, हालांकि यह बात अलग है कि पलड़ा सरकारी अनुबंधों की ओर ही कुछ झुका हुआ है। घरेलू आईटी बाजार में फिलहाल टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) और आईबीएम की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। हालांकि इस बाजार में इन्फोसिस भी तेजी से रफ्तार पकड़ रही है। सरकारी परियोजनाओं की बात करें तो आयकर विभाग के लिए केंद्रीय प्रसंस्करण केंद्र (सेंट्रल प्रोसेसिंग सेंटर) की स्थापना और प्रबंधन से लेकर इंडिया पोस्ट को बैंकिंग सेवाएं मुहैया कराने में सक्षम बनाने जैसी कई अहम परियोजनाओं का जिम्मा इन्फोसिस ने संभाला है। देश में प्रस्तावित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था के कार्यान्वयन के लिए नेटवर्क तैयार करने और उसके प्रबंधन का पांच वर्षीय अनुबंध भी इन्फोसिस को मिला है। 
 
यह तकरीबन 1,380 करोड़ रुपये का अनुबंध है। एमसीए की परियोजना इन्फोसिस की झोली में वर्ष 2012 में आई, जब सरकार ने अपने मूल वेंडर टीसीएस की सेवाएं समाप्त करने का फैसला किया। लगभग 5 करोड़ डॉलर के पांच वर्षीय अनुबंध में इन्फोसिस को कंपनी अधिनियम के तहत सभी कानूनी आवश्यकताओं से जुड़े प्रवर्तन और अनुपालन की सभी प्रक्रियाओं को स्वचालित बनाने का जिम्मा दिया गया। इन्फोसिस इस बात को लेकर निशाने पर आई, जब उपयोगकर्ताओं ने शिकायत करना शुरू किया कि उन्हें ऑनलाइन पंजीकरण में मुश्किल पेश आ रही है या उसमें बेवजह की देरी हो रही है। हालांकि इन्फोसिस का कहना है कि नए पोर्टल की शुरुआत के तुरंत बाद कुछ दिनों के लिए यह समस्या रही थी और तबसे इसका समाधान भी कर दिया गया। 
 
कंपनी से जुड़े सूत्रों के अनुसार यह समस्या मुख्य रूप से विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों के बीच उचित समन्वय की कमी के चलते उभरी। नाम न छापने की शर्त पर सूत्र ने बताया, 'जैसा कि अधिकांश सरकारी अनुबंधों में होता है, जब भी प्रबंधन में बदलाव आता है तो निचले स्तर पर हमेशा प्रतिरोध देखने को मिलता है, इस मामले में भी यही हुआ।' इस मामले में नया तंत्र कंपनी पंजीयक के प्राधिकार को चुनौती देता है, जो अभी तक कंपनी संबंधी मामलों में मुख्य नियामक की शक्ति रखता था। प्राइस वाटरहाउस में रीजनल पार्टनर (नॉर्थ ऐंड मैनेजमेंट कंसल्टिंग ऐंड गवर्नमेंट लीडर) नील रतन का कहना है, 'मेरी नजर में चाहे सार्वजनिक क्षेत्र का मामला हो या निजी क्षेत्र का, अगर कस्टमर ऐप्लीकेशन किसी और कंपनी ने विकसित किया है और कोई अन्य कंपनी पूरी तरह उसे अपने अधिकार में लेकर उसका कायाकल्प करती है तो कुछ संक्रमण संबंधी चुनौतियां उभर सकती हैं। मगर इसे नाकामी कहना कुछ ज्यादती होगी।' जानकार मानते हैं कि इस मामले में इन्फोसिस कार्यान्वयन के स्तर पर कुछ और सतर्क हो सकती थी और जब भी समस्या सामने आई तो प्रदर्शन परीक्षण या लोड टेस्टिंग जैसी सामान्य तकनीकों के जरिये उससे बचा सकता था। 
Keyword: IT, service, govt, MCA,,
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