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रक्षा संबंधों की डोर पर चलेंगे मोदी और ओबामा
दोधारी तलवार / अजय शुक्ला June 07, 2016

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे के पहले गत शनिवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने दक्षिण चीन सागर में चीन की मनमर्जी वाली आक्रामक नीति पर संयमित तरीके से प्रहार किए। सिंगापुर में शांग्रीला वार्ता में शिरकत करते हुए पर्रिकर ने चीन के बारे में आम तौर पर अपनाये जाने वाले भारतीय अधिकारियों के कातर रवैये को दरकिनार करते हुए कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने दक्षिण चीन सागर विवाद से जुड़े सभी पक्षों से बल प्रयोग के इस्तेमाल की धमकी से उपजे भय से उबरने की अपील की। पर्रिकर ने साफ कहा कि पश्चिमी प्रशांत महासागर से होने वाले समुद्री परिवहन का किसी भी तरह के दबाव से मुक्त होना खुद भारत के हित में है क्योंकि भारत का आधे से भी अधिक समुद्री व्यापार इस मार्ग से ही होता है। रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत भले ही क्षेत्रीय विवादों में किसी का पक्ष नहीं लेना चाहता है लेकिन उसकी हमेशा से यह मान्यता रही है कि समुद्री परिवहन अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए।

 
पर्रिकर ने कहा कि किसी भी एक देश का क्षेत्रीय विवादों में एकाधिकार नहीं होना चाहिए। उनका यह बयान निश्चित रुप से भारत को दक्षिण चीन सागर मामले में अमेरिकी रुख के करीब लाकर खड़ा कर देता है। पर्रिकर ने अमेरिका को यह भी याद दिलाया कि भले ही दक्षिण-पश्चिम एशिया में भारत और अमेरिका के समान हित हैं, लेकिन भारत की सबसे बड़ी चिंता पश्चिम एशिया में जारी हिंसक संघर्ष और पाकिस्तान के दखल से खतरे में पड़ी अफगानिस्तान की स्थिरता है। भले ही रक्षा मंत्री ने खुलकर यह बात नहीं कही लेकिन पाकिस्तान को लगातार मिल रहे अमेरिका के कूटनीतिक और सैन्य सहयोग से भारत खुश नहीं है। अमेरिकी सहयोग के  बलबूते पाकिस्तान आतंकवादी संगठन तालिबान को समर्थन जारी रखे हुए है जिससे अफगानिस्तान क े पुनर्निर्माण में भारत को महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका नहीं मिल पाता है।
 
दरअसल यही वह भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा हो रही है। दक्षिण-पूर्व एशिया में तो भारत और अमेरिका के हित जुड़ते हुए नजर आते हैं लेकिन दक्षिण और पश्चिम एशिया में दोनों के हितों में विरोध दिखाई देता है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ होने वाली बातचीत में इन पर चर्चा होने की पूरी संभावना है। वैसे अमेरिकी प्रशासन के पाकिस्तान को दिये जा रहे अबाध समर्थन की समीक्षा किए जाने की चर्चाएं हैं। पिछले महीने तालिबान के सरगना मुल्ला मुहम्मद मंसूर के अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद पाकिस्तान के लिए भी अमेरिकी मदद का अनिश्चित काल तक जारी रह पाना मुश्किल हो सकता है। अमेरिकी कांग्रेस पहले ही 8 एफ-16 लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए पाकिस्तान को धन मुहैया कराने पर रोक लगा चुकी है। कांग्रेस के निचले सदन प्रतिनिधि सभा ने अमेरिका-भारत रक्षा तकनीक और भागीदारी अधिनियम को भी पारित कर दिया है। इन दोनों वाकयों से पता चलता है कि अब पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी सांसदों का धैर्य जवाब देने लगा है और वे चाहते हैं कि भारत के साथ भागीदारी को आगे बढ़ाया जाए। 
 
रक्षा क्षेत्र में भागीदारी को लेकर उम्मीदों का भारी बोझ है लेकिन इससे बहुत ज्यादा हासिल होने की संभावना कम ही दिख रही है। हो सकता है कि भारत को अमेरिकी केंद्रीय कमान में औपचारिक रुप से शामिल कर लिया जाए। अभी तक भारत अमेरिकी सेना के प्रशांत कमान का हिस्सा है जो दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यासों का समन्वय करता है। दोनों देशों के बीच दो बुनियादी समझौतों पर व्यापक चर्चा हो चुकी है। सैन्य संचालन के बारे में जानकारी देने संबंधी करार पर तो जल्द ही दस्तखत होने की उम्मीद है लेकिन संचार और सूचना सुरक्षा संबंधी अधिक महत्त्व के करार में अभी वक्त लग सकता है। माना जा रहा है कि सैन्य संचालन आदान-प्रदान वाले करार पर आने वाली राजनीतिक प्रतिक्रिया से इसका भविष्य तय होगा। मोदी के अमेरिकी दौरे पर भारत-अमेरिका संयुक्त अभ्यास के बारे में हमेशा की तरह अच्छा महसूस कराने वाले बयान दिए जाएंगे। खास तौर पर अलास्का में पिछले महीने हुए वायुसेना के रेड फ्लैग अभ्यास और मालाबार में हुए नौसैनिक अभ्यास का जिक्र होगा। सीएच-47एफ हेलीकॉप्टर और अपाचे हेलीकॉप्टरों के खरीद के बारे में भी कुछ फैसला हो सकता है। अमेरिका से बेहद हल्की हॉवित्जर तोपों की खरीद के 70 करोड़ डॉलर के सौदे पर भी कुछ बातचीत आगे बढऩे की संभावना है। भारतीय नौसेना के लिए दूसरे स्वदेशी विमानवाहक युद्धपोत के निर्माण में अमेरिका के साथ भागीदारी की भी संभावना जताई जा रही है। नौसेना युद्धपोत पर तैनात हथियारों की नई लॉन्च प्रणाली के लिए इच्छुक है जिसके लिए अमेरिकी विमानवाहक पोतों की प्रणाली मददगार हो सकती है। वर्ष 2012 में शुरू की गई रक्षा तकनीक और व्यापार पहल अभी तक गति नहीं पकड़ पाई है। 
 
ओबामा ने पिछले साल की भारत यात्रा के दौरान चार मार्गदर्शक परियोजनाओं का ऐलान किया था लेकिन उनमें कोई खास प्रगति नहीं देखी गई है। माना जा रहा कि रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर अपनी इस पसंदीदा परियोजना को रफ्तार देने के लिए कुछ कदम उठा सकते हैं। वैसे भारत में मोदी के अमेरिकी दौरे की कामयाबी को इस रूप में देखा जाएगा कि वह परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह (एनएसजी) में शामिल होने के लिए भारत की पहल पर ओबामा का समर्थन हासिल कर पाते हैं या नहीं? मोदी एनएसजी देशों का समर्थन हासिल करने की मुहिम में लगे हुए हैं। स्विट्जरलैंड का सहयोग हासिल करने में उन्हें कामयाबी भी मिल चुकी है। लेकिन अमेरिका का उदार समर्थन काफी अहम होगा। ओबामा के कार्यकाल के अभी सात महीने बचे हुए हैं और अगर वह भारत को एनएसजी का सदस्य बनवाने में मददगार बनते हैं तो भारत में उनके कद्रदानों की संख्या बढ़ जाएगी।
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