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अच्छे मुनाफे के लिए समय अहम
कृष्ण कांत /  May 29, 2016

प्रमुख सूचकांकों पर आंकड़ों से संकेत मिलता है कि जब निवेशक 15 या इससे कम के पी/ई पर खरीदारी करते हैं तो प्रतिफल अधिक मिलता है

दीर्घावधि निवेशकों के लिए समय बेहद महत्त्वपूर्ण है। अमेरिकी एसएंडपी 500 और बीएसई सेंसेक्स के लिए दीर्घावधि सीरीज के आंकड़ों से पता चलता है कि जब निवेशक 15 या इससे कम के प्राइस टु अर्निंग (पी/ई) मल्टीपल पर खरीदारी करते हैं तो उन्हें 10 वर्षों में मिलने वाला प्रतिफल बेहतर होता है। तुलनात्मक रूप से 20 या इससे अधिक के पी/ई मूल्यांकन पर बाजार में प्रवेश करने वाले निवेशकों के लिए यह 10 वर्षीय प्रतिफल एक अंक में रहता है।
एसएंडपी 500 मौजूदा समय में 19 के पी/ई पर कारोबार कर रहा है और सेंसेक्स का मूल्यांकन लगभग 20 गुना पर किया गया है जिससे उन निवेशकों के लिए दीर्घावधि प्रतिफल सीमित है जो मौजूदा समय में बाजार में प्रवेश करने की योजना बना रहे हैं।
अमेरिका में अगले 10 वर्षों के दौरान किसी खास वर्ष और निवेशक प्रतिफल में मूल्यांकन अनुपात के बीच 60 फीसदी (-0.6 फीसदी) का सह-संबंध है। दूसरे शब्दों में कहें तो खरीदारी कीमत में (पी/ई मल्टीपल के संदर्भ में) प्रत्येक एक प्रतिशत की वृद्घि के लिए अगले 10 वर्षों के दौरान सालाना प्रतिफल 60 आधार अंक तक प्रभावित होता है।
भारत में नकारात्मक सह-संबंध -0.8 फीसदी के साथ अधिक है। हालांकि अमेरिका आंकड़ा सांख्यिकी रूप से अधिक विश्वसनीय है। जहां एसएंडपी 500 सूचकांक का प्रमुख मूल्यांकन अनुपात वर्ष 1954 से उपलब्ध है, वहीं बीएसई सेंसेक्स डेटा सिर्फ 1991 से ही

उपलब्ध है। यह विश्लेषण कैलेंडर वर्ष और वित्त वर्ष के अंत में सूचकांक की वैल्यू और एसएंडपी 500 और बीएसई सेंसेक्स के लिए उसके निर्धारित पिछले पीई पर आधारित है।
उदाहरण के लिए, 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक (जब सूचकांक का ट्रेलिंग पीई 8 से 15 के दायरे में था) में एसएंडपी 500 में खरीदारी करने वाले अमेरिकी इक्विटी निवेशकों अगले 10 वर्षों के लिए 10-15 फीसदी का सालाना प्रतिफल मिला। दीर्घावधि निवेशकों के लिए प्रतिफल 1980 के दशक के अंत से घटने लगा, क्योंकि सूचकांक महंगा होने लगा। वहीं 1990 के दशक के अंत में डॉटकॉम बूम की लोकप्रियता के समय (जब एसएंडपी मूल्यांकन अधिक था) बाजार में प्रवेश करने वाले निवेशकों को बाद के दशक में नुकसान का सामना करना पड़ा।
ब्लूमबर्ग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार एसएंडपी मूल्यांकन दिसंबर 1999 में 29.3 की टे्रलिंग पीई के साथ ऊंचाई पर पहुंचा। उस वर्ष सूचकांक में खरीदारी करने वाले निवेशकों ने अगले 10 साल के दौरान -2.7 का सालाना प्रतिफल दर्ज किया। जिन भारतीय निवेशकों ने 1990 के दशक के अंत में और 2000 के दशक के शुरू में (जब बीएसई सेंसेक्स लगभग 16 गुना के पीई पर कारोबार कर रहा था) इक्विटी बाजार में प्रवेश किया, उन्हें शानदार प्रतिफल मिला। उदाहरण के लिए, मार्च 2003 में (जब सूचकांक 13.3 के पीई पर कारोबार कर रहा था) सूचकांक जैसे पोर्टफोलियो की खरीदारी करने वाले निवेशकों को बाद के दशक में 20 फीसदी का सालाना प्रतिफल मिला। इसके विपरीत मार्च 1992 में (जब सेंसेक्स का मूल्यांकन 55 गुना के स्तर पर पहुंच गया था) बाजार में प्रवेश करने वाले निवेशकों को अगले 10 वर्षों
के दौरान महज 2.1 फीसदी का सालाना प्रतिफल मिला।
दोनों ही बाजारों में दीर्घावधि इक्विटी प्रतिफल में ताजा गिरावट इक्विटी मूल्यांकन में भारी तेजी की वजह से आई जिससे 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हुआ।
हालांकि तेजडिय़ों का कहना है कि हाल के समय में कॉरपोरेट आय पर दबाव की वजह से यह सह-संबंध भविष्य में बरकरार नहीं रह सकता है। इकनोमिक्स रिसर्च एंड एडवाइजरी के प्रमुख जी चोकालिंगम कहते हैं, 'पिछले समय में मूल्यांकन में तेजी कॉरपोरेट आय में तेजी के साथ साथ आर्ई अब पी/ई मल्टीपल अधिक है।'
इस नजरिये के अनुसार, दीर्घावधि निवेशक अभी भी दो अंक में सालाना प्रतिफल दर्ज कर सकते हैं, बशर्ते कि आर्थिक वृद्घि और कॉरपोरेट आय में मजबूत सुधार दर्ज किया जाए, जैसा कि इस वित्त वर्ष में लग रहा है।

Keyword: share markets, indices, return,
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