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मुक्त बाजार व खुली सोच ही बचाएगी दुनिया को
अरविंद सुब्रमण्यन /  December 24, 2008
अगर 2008 वित्त का साल था, तो 2009 साल होगा कारोबार का। अगर 2008 में जिंसों (जो पहली छमाही में चढ़ीं) और इक्विटी (जो दूसरी छमाही में गिरी) की कीमतों का बोलबाला रहा,
तो अगले साल मुद्राओं, खास तौर पर डॉलर की कीमतों का दबदबा रहेगा। जैसे-जैसे वित्त सेक्टर में मचे कोहराम का असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने लगा है, हर देश अपने कारोबार को बचाने की जी-तोड़ कोशिश में जुट गया है। जंग शुरू हो चुकी है और जंग का मैदान पूरी दुनिया है।

आज पूरी दुनिया में कारोबार के लिए प्रतिबंधात्मक उपाय किए जा रहे हैं। खास तौर पर अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्राजील, रूस, इंडोनेशिया और अपने हिंदुस्तान में भी इन उपायों को लागू किया जा चुका है या फिर किया जा रहा है।

क्या यह छोटी-मोटी मुठभेड़, किसी बड़ी जंग में तब्दील हो सकती है? यह काफी हद तक निर्भर करेगा डॉलर के उतार-चढ़ाव और अमेरिका-चीन के रिश्तों पर।

वैश्विक मंदी की शुरुआत से ही डॉलर की कीमतों में काफी तेज इजाफा देखने को मिला है। वह भी तब, जब मंदी के इस तूफान का सबसे ज्यादा असर खुद अमेरिका पर हो रहा है।

अगर यह वर्तमान स्तर पर रहा या उससे आगे बढ़ा, तो उसका असर निश्चित तौर पर कारोबार पर पड़ेगा ही। मजबूत डॉलर दो वजहों से मुक्त व्यापार के लिए काफी बड़ा खतरा है। अर्थव्यवस्था की मोटी बातों के नजरिये से देखें तो मजबूत डॉलर अमेरिका में मंदी के बादलों को और भी घना कर देगा।

उपभोग और निवेश के न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाने के बाद निर्यात और सरकारी खर्च ही मांग को बढ़ाने का काम कर सकते हैं। लेकिन तेजी से चढ़ता डॉलर निर्यात के लिए स्पीड ब्रेकर का काम करता है। इस वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने की सारी जिम्मेदारी एक अकेले राहत पैकेज के सिर आ जाती है।

राजनीतिक स्तर पर तेजी से चढ़ता डॉलर अमेरिका में संरक्षणवादी दबाव को बढ़ावा देगा। वजह है, उसके विनिर्माण सेक्टर का विदेशों से प्रतिस्पध्र्दा में तगड़ा इजाफा होना। मंदी और मजबूत मुद्रा का यह घातक मेल कारोबारी संरक्षणवाद के जोखिमों में जबरदस्त इजाफा कर देगा।

अक्सर लोग यह बात भूल जाते हैं कि अमेरिका में संरक्षणवाद की सबसे भयानक घटना 1980 के दशक में देखने को मिली थी। उस वक्त इन्हीं कारणों से मुक्त व्यापार और मुक्त बाजार का गुणगान करने वाले रोनाल्ड रीगन को भी सरंक्षणवादियों की मांग के आगे झुकते हुए कारोबार में प्रतिबंधात्मक उपायों को अपनाना पड़ा था।

इन कदमों का निशाना जापान था, जिसे उस वक्त अमेरिका में प्रतिस्पध्र्दा के लिहाज से सबसे बड़ा खतरा माना जाता था। मौजूदा हालात में सरंक्षणवादियों को डेमोक्रेटिक सरकार और कांग्रेस को अपनी तरफ करने में ज्यादा दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

दरअसल, अमेरिकी कांग्रेस ने पहले से ही अपने एक्शन प्लान के लिए अमेरिकी मध्यम वर्ग की समस्याओं को केंद्र बिंदु घोषित कर दिया है। ऊपर से यह बात भी अब दबी-छुपी नहीं रह गई है कि भूमंडलीकरण को लेकर अमेरिकी मध्यम वर्ग की चिंता बढ़ती ही जा रही हैं।

अगर 1980 के दशक में अमेरिका के मुकाबले में जापान खड़ा था, तो इस बार उसका सामना दुनिया की सबसे ज्यादा प्रतिस्पध्र्दात्मक अर्थव्यवस्था, चीन से है। चीन को इस मुकाम पर खड़ा किया है उसकी विनिमय दर ने। मंदी के शुरू के बाद से चीनी मुद्रा, युआन में 10 फीसदी का इजाफा हो चुका था।

वजह है, इसका चढ़ते डॉलर के साथ रिश्ता। साथ ही, इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि चीन के सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी अर्थव्यवस्थाओं (कोरिया, ब्राजील, मेक्सिको और भारत) की मुद्राओं में आई तेज गिरावट। इसलिए अगर चीन इसके बाद अपनी कमतर आंकी गई मुद्रा में 'सुधार' करने का दावा कर रहा है, तो उसमें कुछ गलत नहीं है।

लेकिन ज्यादातर आंकड़ों के हिसाब से अल्प मूल्यांकन का स्तर काफी बड़ा था। साथ ही, इसका व्यापार आधिक्य (टे्रड सरप्लस) में भी बड़े बदलाव के छोटे-छोटे लक्षण दिखा रहा है। इसलिए अमेरिका की नजरों में चीन की मुद्रा एक कांटे की तरह चुभेगी। 

अगर चीन ने मंदी से निपटने के लिए युआन की मजबूत हो रही सेहत में किसी तरह की रोक लगाने की कोशिश की, तो उससे एक बड़ा बखेड़ा खड़ा हो सकता है।

आप सोच रहे होंगे कि इसका भारत पर क्या असर होगा? हिंदुस्तानी नीति-निर्धारक और प्राइवेट सेक्टर यही सोच रहे थे कि भारत चाहे कुछ भी कर ले, विकसित मुल्कों के बाजार तो हमेशा खुले रहेंगे।

दोहा दौर की वार्ता को नाकामयाब होने देना भी इसी सोच का नतीजा था। वैसे, इस सोच के पीछे के कारण भी काफी जायज थे। दरअसल, पहले कभी भी भारत के सॉफ्टवेयर या टेक्सटाइल निर्यात पर प्रतिबंध का खतरा नहीं मंडराया था।

अगर दुनिया इसी तरह से मंदी के भंवर में फंसती रही और डॉलर चढ़ता रहा, तो भारत को अपनी इस सोच जल्दी ही बदलना होगा। अब तो आशंका इस बात की है कि भारत ही नहीं, बल्कि सभी उभरते हुए देशों के निर्यात बाजार का खुलापन कम होगा।

इससे जाहिर तो पर हमारी विकास की उम्मीदों को झटका लगेगा ही लगेगा। उम्मीद तो यह भी है कि भारत और दूसरे विकासशील मुल्कों को अपने इन बाजारों को खुला रखने के लिए अपने बाजारों को भी खोलना होगा। दरअसल, भारत के सिर्फ अपने बारे में सोचते हुए अपनी कारोबारी नीतियों को बनाने के दिन लद चुके हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय कारोबार का वैश्वीकरण, भारत के कारोबारी नीतियों के वैश्वीकरण के बिना नहीं हो सकता है। माना, आज की मंदी काफी बड़ी और खतरनाक है, लेकिन अब भी यह 1930 के दशक की महामंदी की बराबरी नहीं कर सकती है।

दरअसल, आज नीति-निर्धारक जान चुके हैं कि ऐसे वक्त में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। आज मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों के बीच अच्छा-खासा रिश्ता बन चुका है।  अमेरिका में नई सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए मोटी रकम भी खर्च करने के वास्ते तैयार है।

वह इसके लिए वह इस खतरे को भी नजरअंदाज कर रही है कि इसकी वजह से कंपनियों की बैलेंस शीट पर बुरा असर पड़ सकता है। ऊपर से केंद्रीय बैंकों, खास तौर पर अमेरिकी फेड ने तो मुश्किल के इस दौर में संभलकर चलना छोड़ दिया है।

फेड के अध्यक्ष के मुताबिक इन्हीं बातों से 1930 के महामंदी के भूत तो भगाने में मदद मिलेगी। लेकिन 1930 की कहानी में गलती सिर्फ अर्थव्यवस्था की मोटी-मोटी बातों को भूल जाने की नहीं थी। तब बैंकिंग और वित्त सेक्टर तबाह होती रही थी और फेड चुपचाप खड़ा देखता रहा था।

दिक्कत वहां यह भी थी कि संरक्षणवादी सोच अपनाई गई थी। अमेरिका में स्मूट-हॉवले कानून से शुरू हुआ संरक्षणवाद का दौर जल्दी ही यूरोप तक भी पहुंच गया। इसकी वजह विश्व कारोबार का बाजा बज गया और शुरुआत हुई महामंदी की।

इसीलिए सिर्फ विकसित मुल्कों की ही नहीं, बल्कि यह भारत जैसे विकासशील देशों की भी जिम्मेदारी है कि वैश्विक बाजार को खुला रखा जाए। इसके लिए जरूरत है एक नए सहयोग संगठन की। उसका नाम होना चाहिए...., कुछ भी रखिए, लेकिन दोहा से शुरुआत में करिएगा।
Keyword: world will be save by free trade and free thoughts,
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