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अजहर: आधी हकीकत, आधा फसाना
शाक्य मित्र /  May 13, 2016

हाल के दौर की सबसे प्रतीक्षित फिल्मों में से एक 'अजहर' रुपहले पर्दे पर आ गई है। इस फिल्म का इसलिए भी शिद्दत से इंतजार हो रहा था क्योंकि यह भारत के सबसे विवादित क्रिकेटर के जीवन पर आधारित है। मगर फिल्म उनकी जिंदगी की कहानी नहीं है और फिल्म की शुरुआत से पहले ही संदेश आता है कि यह न तो मोहम्मद अजहरुद्दीन की जीवनी है और न ही उन पर बनी कोई वृत्तचित्र फिल्म। 'अजहर' को कुछ हकीकत कुछ फसाना कहना ज्यादा मुनासिब होगा।

 
फिल्म की शुरुआत वर्ष 2000 के दौर से हुई, जब मैच-फिक्सिंग कांड का खुलासा हुआ था और अजहर का खेल जीवन इसी की भेंट चढ़ गया था। इस बीच कहानी में अतीत और वर्तमान का द्वंद्व चलता रहता है। फ्लैशबैक में कहानी हमें कई अहम वाकयों से रूबरू कराती है, मसलन उनके गृह नगर हैदराबाद में बिताए शुरुआती दिन, जहां उनके दादा ने भविष्यवाणी की थी कि अजहर 100 टेस्ट मैच खेलेंगे। इसमें उनके अंतरराष्टï्रीय खेल जीवन के आगाज से लेकर, नौरीन से उनके विवाह, भारतीय टीम के कप्तान के रूप में उनकी ताजपोशी, संगीता बिजलानी के साथ प्रेम प्रसंग और सटोरिये एम के शर्मा से उनकी बातचीत तक को दिखाया गया है। 
 
उठे सवाल, मिले जवाब 
 
स्वाभाविक रूप से फिल्म को लेकर दो अहम सवाल उठने चाहिए। एक तो यही कि चूंकि यह फिल्म अजहर की सहमति से बनी है तो क्या यह उन्हें महिमामंडित करने का प्रयास है, जिसमें दर्शाया गया कि उन्हें गलत फंसाया गया? दूसरा सवाल यही कि इसमें असल जिंदगी के तमाम किरदार हैं तो क्या वे इस पर कुछ विरोध दर्ज करा सकते हैं? बहरहाल फिल्म में किसी भी स्तर पर क्रिकेटर को किंवदंती के रूप में दिखाने की कोशिश नहीं हुई है, वास्तव में जिस तरह हमारे दर्शकों में नायक पूजा का चलन देखने को लिता है, उस लिहाज से यह फिल्म अजहर के जीवन को बहुत निष्पक्ष तरीके से पेश करती है। फिल्म बनाने वालों को इस बात का पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए कि जब भी जरूरत हुई तो उन्होंने अजहर के जीवन से जुड़े नकारात्मक पहलुओं को दिखाने से गुरेज नहीं किया। दूसरा पहलू जरा पेचीदा हो सकता है। इसमें दो नाम ऐसे हैं, जिन पर कुछ विवाद हो सकता है, जिनमें एक तो अजहर के पुराने साथी मनोज प्रभाकर और दूसरी संगीता बिजलानी (उनकी दूसरी पत्नी) हैं। 
 
जहां तक प्रभाकर की बात है तो उनके बारे में ऐसा कुछ नहीं है जो लोगों को मालूम न हो, चाहे वो फिल्म की शुरुआत में दिखाया गया स्टिंग ऑपरेशन हो या फिर 1994 में कानपुर में वेस्टइंडीज के खिलाफ उनका 'कुख्यात' धीमा खेल (जो मैच भारत 47 रन से हार गया था), जिसे फिल्म में दिखाया गया है। वहीं बिजलानी को भी फिल्म में इस तरह नहीं पेश किया गया है, जिसे लेकर वह कुछ फिक्रमंद हों। कुल मिलाकर उनके किरदार को सकारात्मक ही दिखाया गया है न कि 'घर तोडऩे' वाली महिला के रूप में, जिसका उन्हें डर था। चूंकि उनके बारे में अजहर ने जो बताया, उसी के अनुसार उनका किरदार गढ़ा गया, लिहाजा इसका श्रेय निश्चित रूप से अजहर को भी दिया जाना चाहिए।  'ब्लू' और 'बॉस' जैसी दो फिल्मों के रूप में बॉक्स ऑफिस पर नाकामी झेल चुके निर्देशक टोनी डिसूजा ठीकठाक फिल्म बनाने में कामयाब रहे हैं। उन्हें रजत अरोड़ा से शानदार पटकथा मिली है। अरोड़ा के लिखे तमाम जानदार संवाद फिल्म की बड़ी खासियत हैं। 
 
अभिनय की कसौटी
 
अभिनय की बात करें तो इमरान हाशमी ने कमाल का काम किया है, खासतौर से मध्यांतर के बाद वाले हिस्से में, जहां पीछा करते अतीत वाले दृश्य में बल्ला उठाने वाला दृश्य बेहद जीवंत बन पड़ा है। हालांकि हाशमी की बल्लेबाजी में अजहर की छवि तलाशना उचित नहीं होगा लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस अभिनेता ने बेहतरीन अभिनय किया है। नौरीन के किरदार में प्राची देसाई ने भावप्रवण अभिनय किया है, खासतौर से भावनात्मक दृश्यों में वह काफी प्रभावी रही हैं। वहीं अभिनय में सीमित प्रतिभा के बावजूद नरगिस फाखरी बिजलानी के रूप में खरी उतरी हैं। लारा दत्ता और कुणाल रॉय कपूर ने वकील रूप में अपने किरदारों से पूरा न्याय किया है।  
 
मध्यांतर से पहले भाग में जरूर कुछ ऐसे दृश्य हैं, जिन्हें और बेहतर बनाया जा सकता था। ऐसा ही एक दृश्य है, जब पाकिस्तानी क्रिकेटर (जिसे फिल्म में जावेद मियांदाद के तौर पर पेश किया गया है) द्वारा पाला बदलने की पेशकश पर अजहर जवाब देते हैं, 'मेरा नाम मोहम्मद है।' यह दृश्य अचानक खत्म हो जाता है और चूंकि अजहर एक खास क्रिकेटर रहे हैं, लिहाजा इसमें और गहराई की अपेक्षा थी। 
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