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महाराष्ट्र का जल संकट हो जाएगा और भी विकट!
संजय जोग /  May 08, 2016

इस समय भीषण सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र में पानी का संकट और गहरा गया है, जहां राज्य के तकरीबन 2,500 बांधों और जलाशयों में केवल 17 फीसदी पानी ही शेष बचा है। सिंचाई के लिए बने 11 प्रमुख बांधों में से 7 में बिलकुल भी पानी नहीं बचा। मराठवाड़ा के जिस इलाके में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं, वहां 814 बड़ी, मझोली और छोटी सिंचाई परियोजनाओं में केवल तीन फीसदी पानी ही बचा है।

 
मराठवाड़ा के औरंगाबाद, परभणी, बीड़, नांदेड़ और उस्मानाबाद जिलों में स्थित जायकवाड़ी, पूर्णा सिद्घेश्वर, मांजरा, लोअर टेर्ना, मन्नार और सिना कोलेगांव परियोजनाओं में पानी का नामोनिशान खत्म हो गया है। इनके अलावा पूर्णा येलडारी बांध में केवल 2 फीसदी पानी ही बचा रह गया है, जबकि ऊपरी पेनगंगा में 10 फीसदी और विष्णुपुरी में 7 फीसदी और निचली डुढ़ाना में 18 फीसदी जल राशि ही शेष है। 
 
मराठवाड़ा में 75 छोटी सिंचाई परियोजनाओं में केवल 4 फीसदी और 728 लघु सिंचाई परियोजनाओं में महज 3 फीसदी पानी ही बचा है। सरकार ने पेयजल की आपूर्ति के लिए इलाके के 3,586 गांवों में 4,640 टैंकर और 5,993 हैमलेट लगाए हुए हैं। महाराष्ट्र जल आपूर्ति विभाग का कहना है कि राज्य के पास केवल एक-डेढ़ महीने के लिए ही पानी बचा हुआ है। अगर मॉनसून ने 10 जून तक दस्तक नहीं दी तो हालात और खराब हो जाएंगे। 
 
पानी को लेकर कहीं दंगे न छिड़ जाएं, उसकी आशंका को देखते हुए लातूर जिला प्रशासन ने कुओं और पानी मिलने वाले स्रोतों के पास पांच से अधिक लोगों के एक साथ इक_ïा होने पर रोक लगा दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कहते हैं कि रेलगाड़ी के जरिये 70 लाख लीटर से अधिक पानी लातूर पहुंचाया गया है। मुंबई, थाणे, औरंगाबाद और पुणे के अलावा कई अन्य शहरों की स्थानीय निकाय एजेंसियों ने पानी की आपूर्ति में 20 से 50 फीसदी के दायरे में कटौती शुरू कर दी है। पानी की इस कटौती से इन इलाकों में चल रही औद्योगिक परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं और उनमें से कुछ ने तो परिचालन भी बंद कर दिया हैै। उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने कहा कि सरकार ऐसा कानून बना सकती है, जिसमें उद्योगों के लिए शोधित जल का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाएगा। 
 
सरकार ने जल वितरण के लिए 750 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिसमें से 500 करोड़ जिलाधिकारियों को उपलब्ध भी करा दिए गए हैं। सिंचाई मंत्री बबनराव लोणिकर कहते हैं कि यह धनराशि वाटर टैंकर उपलब्ध कराने, पुरानी पाइपलाइन बदलने, पंप जलाने और वाटर टैंकों में लीकेज को दुरस्त करने पर खर्च की जाएगी। भूमिगत जल सर्वेक्षण एवं विकास एजेंसी के अनुसार मार्च, 2016 में मराठवाड़ा की 27 में से 25 तालुका में भूमिगत जल का स्तर पांच साल के औसत स्तर की तुलना में 3 मीटर और कम हो गया। लातूर की जलकोट तालुका में जल स्तर पांच साल के औसत की तुलना में 7.7 मीटर और कम हो गया। एक गैर लाभकारी संस्था साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स ऐंड पीपल से जुड़ी सहायक समन्वयक परिणीता दांडेकर कहती हैं, 'जिले में 90,000 से अधिक बोरवेल हैं। लातूर में 600 से अधिक टैंकर भूमिगत जल का ही उपयोग करते हैं।'
 
राज्य सरकार ने 200 फीट से अधिक गहराई वाले बोरवेल से निकासी पर प्रतिबंध लगा दिया है। लोणिकर का कहना है कि नियमों का उल्लंघन करने पर महाराष्ट्र भूमिगत जल विकास एवं प्रबंधन अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी। मराठवाड़ा के सूखा प्रभावित इलाकों का दौरा कर रहे जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह सवाल पूछते हैं, 'अगर सरकार की संरक्षण नीति होती है तो वह जल आपूर्ति का संरक्षण क्यों नहीं कर सकती?' उन्होंने कहा कि भूमिगत जल के अति दोहन से ही जल संकट पैदा हुआ है। 
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