बिजनेस स?टैंडर?ड - बचत योजनाओं पर पुनर्विचार में समझदारी से काम की दरकार
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बचत योजनाओं पर पुनर्विचार में समझदारी से काम की दरकार
मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  May 05, 2016

हाल में हमने देखा कि सरकार को कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ)के मुद्दे पर एक महीने के भीतर कम से कम तीन बार अपना रुख बदलना पड़ा। उसे यह कदम जनता की ओर से हो रहे विरोध के चलते उठाना पड़ा। एक ऐसी सरकार के साथ यह कैसे हो सकता है जो अत्यंत लोकप्रिय हो, जिसका जनता की नब्ज पर हाथ हो और जिसने हाल ही में भारी बहुमत से चुनावी जीत हासिल की हो।
ईपीएफ संगठित निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की लंबी अवधि की बचत का प्रमुख जरिया है। ये कर्मचारी अपने बाद के जीवन के अहम खर्च के लिए इसी के भरोसे रहते हैं। वह इस बात को लेकर काफी आश्वस्त रहते हैं कि उनके पास बचत में इतना पैसा है कि जरूरत पडऩे पर किसी बीमारी के समय वे उसका इस्तेमाल कर सकें या जो सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन में उनके काम आ सके। भविष्य निधि में कर्मचारी और नियोक्ता दोनों योगदान देते हैं और यह संगठित क्षेत्र के बेहतर गुणवत्ता वाले रोजगारों की पहचान है।
अपेक्षा के मुताबिक ही ईपीएफ के सदस्यों को तमाम अहम राजनीतिक दलों से संबद्ध संगठनों का भी समर्थन हासिल है। वे कोई भूमिहीन श्रमिक नहीं हैं। वे प्रवासी मजदूर भी नहीं हैं जो किसी विनिर्माण स्थल पर काम कर रहे हों और जिसे न्यूनतम मेहनताना पाने मेंं भी दिक्कत हो रही हो। सियासी तौर पर  संवेदनशील मामले में बदलाव के लिए यह आवश्यक है कि आपके पास न केवल आर्थिक सुधारों की दलील हो बल्कि सत्ताधारी दल के अन्य राजनेताओं को समझाकर उनकी सहमति लेना भी आवश्यक है क्योंकि उनका मतदाता इसी वर्ग से आता है। खुद नौकरशाहों से भी इसका गहरा वास्ता है।
इस क्रम में वित्त मंत्रालय के लोगों ने जिनको पूर्ववर्ती योजना आयोग (वैसे इसका नया नाम क्या है?) के लोगों का समर्थन हासिल है, एक राजनीतिक रूप से कम कद वाले मंत्री की मदद से कुछ ऐसे बदलाव लाने का प्रयास किया जिनकी सफलता और जिनके पीछे की समझ के बारे में केवल उनको और कुछ कारोबारी पत्रकारों को ही जानकारी होगी। जाहिर है यह दांव पूरी तरह उलटा पड़ गया।
क्या किया जाना चाहिए? रिजर्व बैंक  के गवर्नर रघुराम राजन की बात को सुना जाना चाहिए, जिन्होंने एकाधिक मौकों पर कहा है कि अर्थव्यवस्था को जीवंत बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि फर्म को विफल होने दिया जाए लेकिन लोगों को नहीं। इसे दूसरी तरह से देखें तो कल्याणकारी राज्य के रूप में दक्षिणी यूरोप के देशों का अनुसरण कतई नहीं किया जाए। हां स्कैंडिनेवियन (डेनमार्क, स्वीडन आदि) देशों के मॉडल का अनुसरण जरूर किया जा सकता है जहां भारी करों की मदद से व्यापक सुरक्षा ढांचा सुनिश्चित किया जाता है और जहां श्रम बाजार लचीला है। सुरक्षा ढांचे से आशय बेरोजगारी से सुरक्षा, सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं और पेंशन आदि से है। अगर ईपीएफ के रूप में हमारे पास आधी-अधूरी पेंशन व्यवस्था है भी तो उसके साथ छेड़छाड़ करने की भला क्या तुक है?
सामाजिक सुरक्षा अथवा सबके लिए पेंशन का मसला भी ईपीएफ से जुड़ा हुआ है। एक नई सार्वजनिक पेंशन व्यवस्था पेश की गई है जो कतई आकर्षक नहीं है। जिन लोगों के पास किसी भी तरह की बचत है और वे उसे सुरक्षित रखना चाहते हैं तो वे सरकार की अल्प बचत योजनाओं का रुख करते हैं। सबके लिए सुरक्षित बचत का ढांचा तैयार करने के प्रयास में जिनमें कि अधिकांश गरीब ही हैं, यह आवश्यक है कि हम एक और तथ्य को ध्यान में रखें।
वह यह कि गरीबों और संवेदनशील तबके को पोन्जी योजनाओं से बचाने की आवश्यकता है। इसके लिए उनको आकर्षक प्रतिफल वाली योजनाओं से जोडऩा होगा। ताकि उनको अपने जमा का उचित प्रतिफल मिल सके। इतना ही नहीं लंबी अवधि की बचत के लिए प्रतिफल की दर अपेक्षाकृत अधिक होनी चाहिए।
यह काम आसान होना चाहिए क्योंकि महंगाई की दर में अब कमी आ रही है। एक बार नए छोटे वित्तीय बैंक चलन में आ जाएंगे तो वे इस काम में मददगार हो सकते हैं। वे वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में अधिक ब्याज की पेशकश कर सकते हैं क्योंकि बतौर सूक्ष्म वित्त संस्थान अब तक वे वाणिज्यिक बैंकों को 12 फीसदी की दर पर भुगतान कर रहे थे। यानी अगर वे जमाकर्ताओं को 10 फीसदी ब्याज दें तो भी उनके पास 2 फीसदी राशि बचेगी।
एक स्थिर समाज में आय गरीबों को हस्तांतरित होती है और कम से कम माध्यमिक तक की शिक्षा सरकार द्वारा मुहैया कराई जाती है। कौशल विकास के लिए पॉलिटेक्निक स्तर पर मदद की जाती है। इसके अलावा सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती है जिसमें निजी स्वास्थ्य बीमा की भूमिका नहीं होती।
निजी स्वास्थ्य बीमा निजी चिकित्सकों और अस्पतालों को अनैतिक व्यवहार के लिए प्रेरित करते हैं। गौर कीजिए तो आप पाएंगे कि राष्टï्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के आगमन के बाद हिस्टेरेक्टोमी (गर्भाशय निकालना) के मामलों में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
यूरोप के देशों की बात करें तो उन्होंने अपने यहां बढिय़ा सामाजिक स्थिरता व्यवस्था कायम की। हालांकि हालिया अतीत में उत्तरी अफ्रीकी प्रवासियों के आगमन के बाद वहां अशांति पैदा हुई है क्योंकि प्रवासियों के समूह को सामाजिक तौर पर बहिष्कार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी व्यवस्था कायम करने का काम एक दिन में नहीं हो सकता है।
 इसे धीरे धीरे ही हासिल करना होगा और इस क्रम में हर कदम ऐसा होना चाहिए जिसे राजनीतिक रूप से प्रभावित अंशधारकों को समझाया जा सके। लोकतांत्रिक राजनीति में काम ऐसे ही होता है।

Keyword: Saving schemes, EPF, Government,
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