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सूचना मंत्रालय से लें मिसाल और शासन में बेहतरी का देखें कमाल
दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 03, 2016

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को अमूमन कम चमक दमक वाला ही माना जाता है और यहां तक कि सरकार के भीतर भी इस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। इस मंत्रालय का दायित्व है कि वह जनता के बीच सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करे कि आखिर सरकार जनता और देश के लिए क्या कर रही है। चूंकि इसके कामकाज की जो प्रकृति है, उसे देखते हुए इसका हश्र भी वही होता है, जो किसी भी तंत्र में संदेशवाहक का होता है।
अगर सब कुछ सही रहता है तो इसकी कमान संभाल रहे शीर्ष नेतृत्व की तारीफों के पुल बांधे जाते हैं। हालांकि, दुर्भाग्यवश अगर चीजें गलत होती हैं तो संदेशवाहक या संचारक पर ठीकरा भी उतना ही फूटता है कि या तो उसने लोगों तक सही संदर्भों में उचित संदेश नहीं पहुंचाया या फिर वह अनुमान नहीं लगा पाया कि क्या गलत हो रहा है ताकि नेतृत्व को समस्याओं को लेकर पहले से सावधान किया जा सके। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को कई वर्षों से इसी तरह की दिक्कतों से दो चार होना पड़ा है। स्वाभाविक रूप से हालात तब और खराब हो जाते हैं अगर कुछ समस्याओं का समाधान मंत्रालय के भीतर खोजने की जरूरत हो, जैसा कि नरेंद्र मोदी सरकार के शासन में पिछले कुछ महीनों के दौरान देखने को मिला है।
जरा इस विवरण पर गौर कीजिए। पुणे स्थित भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के प्रमुख के तौर पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति को लेकर तमाम विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसने राष्टï्रीय राजनीतिक विवाद की शक्ल अख्तियार कर ली। कांग्रेस ने इसे हल्के में नहीं लिया और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस पर हुए विरोध प्रदर्शन में सक्रिय रूप से भाग लिया। चौहान की नियुक्ति को इसी रूप में देखा गया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुआई वाली सरकार कला एवं संस्कृति के राष्टï्रीय संस्थानों पर राजनीतिक नियंत्रण करने का प्रयास कर रही है।
जहां सरकार बतौर एफटीआईआई चेयरमैन चौहान की नियुक्ति के सवाल पर किसी भी तरह के दबाव के समक्ष झुकने के लिए तैयार नहीं थी, वहीं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने स्तर इस संकट की हवा निकालने की कोशिश शुरू कर दी। पिछले वर्ष सितंबर में मंत्रालय की कमान संभालने वाले सुनील अरोड़ा को जल्द ही एहसास हो गया कि उनके समक्ष एक मुश्किल चुनौती है। उनकी पहली प्रतिक्रिया तो यही थी कि चौहान की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद से राजनीति को दूर किया जाए, जिसे कांग्रेस और ज्यादा हवा देना चाहती थी।
इस प्रकार उन्होंने एफटीआईआई के संचालन ढांचे पर ध्यान केंद्रित किया और उसे दुरुस्त करने के लिए कुछ कदम उठाए। जहां संस्थान की संचालन परिषद में एफटीआईआई के चार पूर्व छात्रों को शामिल किया गया और साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि इन सभी नए नामों की उद्योग में ऐसी साख हो, जिन पर लोग उंगली न उठा सकें। उनमें एक से एफटीआईआई की अकादमिक परिषद और उसके पाठ्यक्रम एवं शैक्षणिक गतिविधियों की जिम्मेदारी संभालने के लिए कहा गया।
इसके पीछे विचार एकदम साफ था कि चूंकि चौहान की नियुक्ति राजनीतिक केंद्र में आ गई और उस पर पीछे हटना किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए सियासी रूप से महंगा पड़ता, ऐसे में अरोड़ा की अगुआई में मंत्रालय ने विश्वसनीय नामों के जरिये संस्थान की संचालन परिषद और प्रशासन को बेहतर बनाने पर जोर देना शुरू किया। भले ही एफटीआईआई संकट का पूरी तरह पटाक्षेप न हुआ हो लेकिन अब निश्चित रूप से मीडिया में इस पर उतना नकारात्मक नजरिया नहीं देखने को मिल रहा है, जितना आठ महीने पहले था।
अरोड़ा के नेतृत्व में मंत्रालय ने एक और अहम कदम उठाया है। इसके तहत सुविख्यात फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई, जिसे केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के कामकाज में सुधार के लिए सुझाव देने का जिम्मा सौंपा गया है। स्मरण रखिए कि यह संस्था भी हाल में राजनीतिक दखल का मंच बनी है। समिति के अध्यक्ष पद का दायित्व स्वीकार करने से पहले माना गया कि बेनेगल ने अरोड़ा से यही कहा कि सीबीएफसी के लिए आगे की राह 'कैंचीÓ के उपयोग से इतर होनी चाहिए, जिस सुझाव पर अरोड़ा ने अपनी मौन सहमति दे दी। अब बेनेगल समिति की सिफारिशों में यही आया कि सीबीएफसी को कांट-छांट थोपनी नहीं चाहिए और इसके बजाय एक प्रमाणक की भूमिका अदा करनी चाहिए, जिसके बारे में उम्मीद है कि सरकार इन सिफारिशों को मान लेगी और कानून में उचित रूप से बदलाव किया जाएगा, जिससे इस क्षेत्र में अरसे से लंबित सुधारों को मूर्त रूप मिलेगा।
इसी तरह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के व्यापक निर्देशों के तहत केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों में सरकारी कार्यक्रमों और उपलब्धियों के बेहतर प्रचार-प्रसार के लिए अधिक सुगठित तंत्र अपनाया जा रहा है। इससे भी महत्त्वपूर्ण यही है कि दृश्य श्रव्य महानिदेशालय (डीएवीपी) के जरिये जारी होने वाली प्रचार सामग्री के लिए संशोधित विज्ञापन दरों का भी जल्द ही ऐलान किया जाएगा। कई वर्षों से समीक्षा के लिए लंबित ये नई दरें बाजार की नई हकीकतों पर गौर करेंगी।
अरोड़ा जब इस मंत्रालय के सचिव बने तभी इनमें से तमाम पहल शुरू की गईं या उनमें तेजी आई।
इन मसलों को लेकर मंत्रालय का दृष्टिïकोण अधिक व्यावहारिक और परिणामोन्मुखी हो गया, संभवत: इसलिए कि अरोड़ा इससे पहले बतौर मुख्य कार्याधिकारी इंडियन एयरलाइंस की कमान संभाल चुके हैं, जिसने बेहद प्रतिस्पर्धी बाजार में बेहतरीन प्रदर्शन किया था। पिछले हफ्ते ही मंत्रालय में अपना कार्यकाल पूरा करने वाले अरोड़ा ने जिस कार्यशैली का नमूना पेश किया, अगर केंद्रीय मंत्रालयों के और सचिव भी उसी नक्शेकदम पर चलें तो नई दिल्ली के तमाम भवनों से चलने वाला शासन क्रांतिकारी बदलाव के साथ बेहतरी की ओर अग्रसर होगा।

Keyword: Information, ministry, Schemes,
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