बिजनेस स?टैंडर?ड - गोवा से यूरोप वाया पुर्तगाल!
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गोवा से यूरोप वाया पुर्तगाल!
रंजीता गणेशन /  04 21, 2016

बिजनेस स?टैंडर?ड गोवा से यूरोप वाया पुर्तगाल!

बड़ी संख्या में गोवावासी भारतीय नागरिकता त्यागकर पुर्तगाल की नागरिकता ले रहे हैं। वर्ष 2015 में 2,000 से अधिक लोगों ने ऐसा किया। इस पूरे रुझान की परतें खोल रही हैं रंजीता गणेशन 

बिजनेस स?टैंडर?ड गोवा से यूरोप वाया पुर्तगाल!लाइन में सबसे आगे खड़े एंटोनियो टेलिस अपनी योजना बताते हुए अपना एक हाथ अपनी कमर पर रख लेते हैं और पूरा वजन एक पांव से दूसरे पांव पर डालते हैं। इस बीच वह पानी की बोतल से जल्दी जल्दी पानी पीते हैं। 42 साल के पेस्ट्री शेफ एंटोनियो पिछले कई सप्ताह से अपना काफी समय एल्टिन्हो स्थित पुर्तगाली महावाणिज्य दूतावास में बिताते हैं। वह तथा उन जैसे सैकड़ों अन्य गोवावासी पुर्तगाल की नागरिकता हासिल करने का आवेदन कर चुके हैं।

टेलिस कहते हैं कि यहां एक ही नीति कारगर है। सुबह जितनी जल्दी यहां आ सकते हैं आ जाएं। ताकि आप शाम को अपने काम निपटा सकें। सुबह के 8.30 बज चुके हैं और वह पिछले सात घंटे से अपनी पत्नी और बेटे के साथ प्रतीक्षारत हैं। टेलिस जैसे कुछ लोग जहां यह मानते हैं कि दूतावास में जल्दी आना ठीक है, वहीं कुछ अन्य लोग ऐसे भी हैं जो कतार से बचने के लिए अस्वस्थ होने का हवाला देते हैं। बाहर सीढिय़ों पर प्रतीक्षा करते हुए ऐसे लोग कागजात का लेनदेन करते और थकी मुस्कान देते नजर आए। ये दोस्तियां अस्थायी हैं। शौच के लिए लोगों को पहाड़ी पर मौजूद झाडिय़ों की मदद लेनी पड़ती है।

दस बजने में अभी नौ मिनट बाकी हैं और लोग अचानक एक अनुशासित पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। दरवाजा खुलता है और चार गार्ड बाहर आकर आने वालों की छंटनी का काम शुरू करते हैं। जल्दी ही लोगों को अलग अलग विभागों में भेजा जाता है। ये लोग भीतर जाकर जरूरत के मुताबिक दस्तावेज जमा करने, राष्टï्रीय पहचान पत्र हासिल करने और पुर्तगाली पासपोर्ट हासिल करने का काम करते हैं।

हाल के वर्षों में गोवा, दमन और दीव आदि पुर्तगाल की पूर्व कॉलोनियों के लोग लगातार पुर्तगाली नागरिकता के लिए आवेदन कर रहे हैं। सन 1961 में भारत में विलय के पहले सदियों तक पुर्तगाल ने गोवा पर राज किया। यही वजह है कि सन 1961 से पहले जन्मे गोवावासियों और उनके बच्चों तथा नाती-पोतों को पुर्तगाल तब तक पुर्तगाली नागरिक मानता है जब तक कि उनके जन्म और शादियों का पंजीकरण लिस्बन सेंट्रल रजिस्ट्री में होता है। एक बार नागरिकता हासिल हो जाने के बाद वे तत्काल यूरोपीय संघ के सदस्य हो जाते हैं और उनको अबाध यातायात, स्वास्थ्य सुविधाओं और यूरोप में रोजगार जैसी तमाम सुविधाएं मिलने लगती हैं। अनेक आवेदकों का असली लक्ष्य है ऐसा करके ब्रिटेन में प्रवेश करना।

वाणिज्य दूतावास के सूत्रों की मानें तो हर रोज 50 से 60 पासपोर्ट जारी किए जा रहे हैं। सन 2015 में औसतन 2,000 लोगों ने अपने भारतीय पासपोर्ट त्यागे हैं। वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है क्योंकि अनिवासी गोवावासियों ने भी विदेशों में अपने भारतीय पासपोर्ट जमा कराए हैं। जानकारी के मुताबिक करीब 40,000 गोवावासियों ने लिस्बन में अपने जन्म का पंजीकरण कराया है जबकि अनाधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक यह आंकड़ा 3 लाख से 4 लाख हो सकता है।

पासपोर्ट के अलावा भी कई चीजें महत्त्वपूर्ण

यह मुद्दा उस समय विवादास्पद हो गया जब पता चला कि कई राजनेताओं, पुलिस अधिकारियों और नौकरशाहों ने पुर्तगाली पासपोर्ट ले लिये हैं। दो विधायकों ग्लेन टिक्लो और कैटानेा सिल्वा के बारे में पता चला कि वे भी पुर्तगाली नागरिक हैं। गायक रेमो फर्नांडिस के बारे में भी ऐसी ही खबर है। गोवा में आरटीआई कार्यकर्ता चाहते हैं कि ऐसे लोगों के खिलाफ दोहरी नागरिकता का मामला चले। ऐसे लोगों पर देशविरोधी व्यवहार अपनाने का आरोप लगाया जा रहा है।

बहरहाल, अपनी बेटी को विदेश भेजने के इच्छुक एक सेवानिवृत्त सेल्स एक्जीक्यूटिव कॉर्डेनिको डीकोस्टा कहते हैं कि केवल पुर्तगाल का पासपोर्ट मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इस सिलसिले में अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है। कुछ देश दोहरी नागरिकता देते हैं जबकि भारत ऐेसा नहीं करता। ऐसे में लोगों को यही सलाह दी जाती है कि वे क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय और विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय में जाकर अपना भारतीय पासपोर्ट जमा कर दें और विदेशी नागरिक के रूप में पंजीकरण करा लें। ऐसा करते ही उनका मतदान का अधिकार, सरकारी नौकरी का अधिकार और कृषि भूमि पर स्वामित्व तत्काल समाप्त हो जाता है।

आज भले ही गोवा के केबल ऑपरेटर पुर्तगाली चैनल दिखाते हों लेकिन सन 1961 में गोवा के भारत में विलय के बाद पुर्तगीज भाषा व्यवस्थित तरीके से विद्यालयों से बाहर कर दी गई। पुर्तगाल सन 1974 तक गोवा पर भारत की संप्रभुता मानने से इनकार करता रहा। वह इसे ओवरसीज टेरिटरी कहता रहा। हालांकि सन 1974 में वहां सरकार बदलने के बाद हालात बदल गए। उसके बाद हालात सुधरे और गोवा के लोगों को पुर्तगाल की नागरिकता लेेने का अवसर प्रदान किया गया। एल्टिन्हो कार्यालय खुलने के पहले नागरिकता बदलने का काम दिल्ली या मुंबई में स्थित दूतावासों में होता था। अफवाह है कि यह कार्यालय एक साल में बंद हो जाएगा। इसके बाद यहां भीड़ अचानक बढ़ गई है।

बिजनेस स?टैंडर?ड गोवा से यूरोप वाया पुर्तगाल!पुर्तगाली नागरिकता के अवसर ने कारोबार के नए अवसर भी तैयार किए हैं। पासपोर्ट एजेंट लोगों को कागजात तैयार करने में मदद कर रहे हैं। वे उन्हें जन्म और विवाह के प्रमाणपत्र भी दिला रहे हैं। कागजात को अंग्रेजी से पुर्तगीज और पुर्तगीज से अंग्रेजी में बदलने का भी रोजगार जोर पकड़ रहा है। पुर्तगीज अनुवादकों की मांग बढ़ रही है। पंजिम में सलाहकार सेवा देने वाले एल्विनो परेरा के पास हर महीने ऐसे 30 से 40 आवेदन आते हैं। उनके पिता एक एडवोकेट थे और वह 15 साल तक पासपोर्ट के कारोबार में शामिल रहे। उनके पास अनुवाद का काम परेरा से अधिक आता है।

परेरा कहते हैं कि तमाम ऐसे छोटे मोटे एजेंट पंजिम और मडगाव में उभर आए हैं जो कम पैसे लेकर काम करते हैं लेकिन वे दस्तावेजों में छेड़छाड़ भी कर देते हैं। यही वजह है कि उन जैसे लोग ऐसा शुल्क वसूल करते हैं जिसका वह खुलासा नहीं कर सकते। एक अनुमान के मुताबिक कागजी कार्रवाई के मुताबिक यह शुल्क एक लाख रुपये से 5 लाख रुपये के बीच हो सकता है। मडगाव के एक प्रमुख सलाहकार ब्रूनो गोमिंडे कहते हैं कि पंजाब और हरियाणा से भी लोग इस संबंध में जानकारी हासिल करना चाह रहे हैं। हेरल्ड और द गोअन जैसे स्थानीय अंग्रेजी दैनिकों के वर्गीकृत खंड में एजेंटों के विज्ञापन भरे रहते हैं जो लोगों की इस काम में मदद करने की बात कहते हैं। इनमें नाम बदलने के कई विज्ञापन भी होते हैं। उनका संबंध भी आवेदनों से ही होता है।

महावाणिज्यदूत रुई बसेरिया के कार्यालय ने यह कहते हुए साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया कि वह नहीं चाहते कि इस मामले में कुछ भी लिखा जाए। इससे पहले बिज़नेस स्टैंडर्ड के स्तंभकार सुनील सेठी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि गलत और फर्जीवाड़े वाले आवदेनों को सही आवेदनों से बदला जाएगा। दोनों ही देशों में अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त एजेंट और वकील अवैध प्रवासियों को गलत जन्म प्रमाण पत्र और पारिवारिक इतिहास तैयार करने में मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा था, 'यह बहुत जटिल मसला है। लोग किसी भी हद तक जा रहे हैं। गलत तरीके से अपना अतीत तैयार करने के लिए वे कब्रगाहों तक में जा रहे हैं। अच्छी बात है कि ऐसे मामले बहुत ज्यादा नहीं हैं। अनुमान लगाया जाए तो 10 में से एक मामला ऐसा है।'

गोवा में हमेशा से खानाबदोशों की संख्या ज्यादा रही है। पुर्तगाली शासन के वक्त वे अक्सर पुर्तगाल के अधीन अंगोला और मोजाम्बीक आदि देशों में काम के लिए जाया करते थे। कुछ लोगों ने मुंबई और पश्चिम एशिया में भी रोजगार किया। ये रोजगार मुख्यतया खानपान, स्वागत और जहाजों से संबंधित थे। जैसे-जैसे देश में रोजगार अवसर कम होते गए, वैसे ही पुर्तगाली नागरिकता की पेशकश ने उनके लिए अवसर के नए द्वार खोल दिए।

जैसा देश वैसा भेष

पास्कल फर्नांडिस (बदला हुआ नाम) गोवा में अपना कारोबार शुरू करने के पहले सऊदी अरब और मुंबई में काम कर चुके हैं। जब गोवा में कारोबार शुरू करने की कोशिश नाकाम हो गई तो उन्होंने मेडिकल रिप्रजेंटेटिव के रूप में काम करना शुरू कर दिया। यहां उनका वेतन तकरीबन 20,000 रुपये था। खर्च बढऩे के साथ साथ यह राशि कम पडऩे लगी। वह चाहते हैं कि उनके बच्चे को भी बढिय़ा जीवन और शिक्षा मिले। ठीक वैसे ही जैसे उनके ब्रिटेन में रहने वाले रिश्तेदारों को मिलती है।

लंबी आवेदन प्रक्रिया उनके लिए खुशियां लेकर आई है। वह कहते हैं कि चर्चा में स्पष्ट रिकॉर्ड रखे जा सकते हैं। इस रिकॉर्ड की मदद से वह अपने परिवार को सन 1800 तक तलाश कर सके हैं। हालांकि हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि उनके जन्म और विवाद का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है। पुर्तगाल की अर्थव्यवस्था की हालत बहुत अच्छी नहीं है। जाहिर है नागरिकता को लेकर उपजी इस मुहब्बत का भी पुर्तगाल से कुछ खास लेनादेना नहीं है। असल वजह यह है कि लोग लंदन और उसके आसपास जाना चाहते हैं। ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय मूल के पुर्तगाली नागरिक ही वहां 10,000 से अधिक लोगों का ऐसा समूह बनाते हैं जो यूरोपीय संघ के एक देश के साझा नागरिक होने के साथ-साथ ऐसे लोग भी हैं जिनका जन्म यूरोप में नहीं हुआ।

बिजनेस स?टैंडर?ड गोवा से यूरोप वाया पुर्तगाल!यूके में उनकी संख्या वर्ष 2015 की पहली तिमाही में 20,000 के करीब थी। स्विंडन नामक एक औद्योगिक कस्बे में करीब 12,000 गोवायी मूल के कैथलिक रहते हैं। हालांकि यह ब्रिटेन के रोजगार बाजार की सबसे बेहतर जगह नहीं है। वे अक्सर पैकेजिंग इकाइयों, सुपर मार्केट और एयरपोर्ट आदि पर काम करते हैं। यूरोपीय संघ के नागरिक होने के नाते उनको मुफ्त चिकित्सा सहायता और बेराजगारी भत्ता आदि मिलते रहते हैं। वहां जिंदगी महंगी जरूर है लेकिन लोगों के पास उपाय भी हैं। वे गोवा की रिहाइशी शैली आजमाते हैं जहां विभिन्न परिवार अपने घर का एक हिस्सा अन्य लोगों को किराए पर दे देते हैं। एक कमरे में दो या तीन लोग रहते हैं।

पंजिम निवासी पूर्व पत्रकार ओस्वाल्डो फर्नांडिस कहते हैं कि बाहर से आने वालों के व्यवहार में परिवतर्न नजर आता है। कभी बदजुबान रहे बच्चे जब विदेश से वापस आते हैं तो वे निहायत शिष्टï अंदाज में बात करते हैं। राचोल और अगाकेम जैसे गांवों में यह बदलाव स्पष्टï नजर आता है और इसके पीछे युवा ही हैं। अपेक्षाकृत विचित्र सिरिडाओ में अधिकांश पुराने घर जिंदा हो उठे हैं। वहां रंगाई-पुताई का काम चल रहा है, बरामदों में पॉलिश हो रही है और बगीचे निखर रहे हैं। कई घर निर्माणाधीन भी हैं। साफ नजर आ रहा है कि यहां नया पैसा आया है लेकिन अधिकांश घरों में रहवासियों की कमी है। बच्चे विदेशों में काम कर रहे हैं और मां-बाप का समय गोवा और यूके के सफर में कट रहा है। कभी मछुआरों से आबाद रहा यह गांव अब वीरान है। पारंपरिक पेशे को अपनाने वाले भी कम रह गए हैं।

बड़े शहरों में भी बदलाव आ रहा है। बालचंद्र वागले पंजिम में एक लोकप्रिय कपड़ा स्टोर चलाते हैं। वह कहते हैं कि स्थानीय टेलर करीब-करीब समाप्त हो चुके हैं और उनके ग्राहकों के ऑर्डर ओडिशा और आंध्र प्रदेश के टेलर पूरे कर रहे हैं। पंजिम में फॉन्टैन्हास का ओल्ड लैटिन क्वाटर्स इलाका पुर्तगाली शैली के आवासों से भरा हुआ है पर यहां भी केवल बुजुर्गवार ही रह गए हैं।

बदलती जीवनशैली

युवा यहां केवल छुट्टियों के मौके पर आते हैं। कई बंगलों में ताले लगे हुए हैं जबकि कुछ को वाणिज्यिक प्रतिष्‍ठानों में बदल दिया गया है। ऐसा भी नहीं है ब्रिटेन में लोग ऐसे आव्रजकों को लेकर पूरी तरह आंखे मूंदे हुए हैं। प्रवासियों की संख्या बढ़ रही है और इस बीच ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन जून में ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग करने को जनमत संग्रह कराने की तैयारी में हैं।

परंतु सैंद्रा गार्सिया जैसे लोग जो हाउनस्लो में रहते हैं और जो छुट्टियों में सिरडाओ आए हुए हैं उनको पूरा यकीन है कि यह आबादी ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था की मदद ही कर रही है। वह कहते हैं, 'ब्रिटेन के लोग उच्चस्तरीय रोजगार चाहते हैं। तो फिर वे सारे काम कौन करेगा जो हम करते हैं?' एवक्लेटो अफोंसो दर्शनशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। वह दोहरी नागरिकता के आरोपों के आधार पर ही प्रश्न खड़े करते हैं। पंजिम के हिललॉक में स्थित अपने कार्यालय में 73 वर्षीय अफोंसो खुद को शायद गोवा का आखिरी ऐसा व्यक्ति बताते हैं जो वक्त का पाबंद है। वह एक किताब दिखाते हैं जो इस विषय के कानूनी पहलुओं पर केंद्रित है।

बिजनेस स?टैंडर?ड गोवा से यूरोप वाया पुर्तगाल!अफोंसो  कहते हैं कि भारत में पुर्तगाल का औपनिवेशिक शासन इस लिहाज से खतरनाक था कि उसने स्थानीय संस्कृति को खत्म कर अपनी संस्कृति इस पर थोप दी। लेकिन यह ब्रिटिश औपनिवेशिकता से अलग था क्योंकि इसने स्थानीय लोगों को बतौर नागरिक तवज्जो दी। सन 1961 में जब गोवा के लोगों को भारतीय नागरिकता दी गई तो कानूनी तौर पर उनके पुर्तगाल नागरिकता त्यागने की कोई बाध्यता नहीं थी। पुर्तगाल की उनकी राष्‍ट्रीयता खत्म नहीं की जा सकती थी क्योंकि वह एक दूसरे देश का मसला था।

अफोंसो कहते हैं कि हालांकि सन 1954 में पुर्तगाली कानून ने गोवा, दमन और दीव और दादरा तथा नागर हवेली का अपने विदेशी क्षेत्र के रूप में उल्लेख करना बंद कर दिया लेकिन इस इलाकों में रहने वालों की पुर्तगाली नागरिकता समाप्त नहीं की गई। भारतीय नागरिकता अधिनियम के मौजूदा प्रावधान इस अनूठे ऐतिहासिक घटनाक्रम के बारे में कुछ नहीं कहते। हाल में राष्टï्रविरोधी लोगों पर हुई कार्रवाइयों के बाद पुर्तगाली नागरिकता का आवेदन कर हरे लोग इस बारे में कोई बात करने से या तो बचते हैं या फिर वे कहते हैं कि उनका यह कदम पूरी तरह आर्थिक है। पास्कल फर्नांडिस जोर देकर कहते हैं कि उनका यह कदम न तो पुर्तगाल प्रेम की वजह से है, न ही भारत के प्रति उनका लगाव कम हुआ है। वह कहते हैं, 'मैं हमेशा यहां वापस आना चाहूंगा। गोवा के लोग यहां से अपना रिश्ता कभी समाप्त नहीं कर सकते।'

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