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स्वागतयोग्य इजाफा
संपादकीय /  April 12, 2016

देश में इंजीनियरिंग शिक्षा महंगी हो गई है। खासतौर पर शीर्षस्थ शिक्षण संस्थानों में। यह स्वागतयोग्य कदम है और ऐसी कई समितियों की अनुशंसा के अनुरूप भी है जो चाहती थीं कि अपनी लागत के मसले पर ये संस्थान सरकार पर कम से कम निर्भर रहें। इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि शुल्क वृद्घि का प्रभाव वंचित वर्ग के छात्रों पर नहीं पड़े। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के स्नातक पाठ्यक्रम का शुल्क बढ़ाते हुए आईआईटी परिषद ने  एक लाख रुपये से कम सालाना पारिवारिक आय वाले अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों का शिक्षण शुल्क माफ कर दिया है। जिन परिवारों की वार्षिक आय पांच लाख रुपये से कम होगी उनका दो तिहाई वार्षिक शिक्षण शुल्क माफ रहेगा। शुल्क वृद्घि इसलिए भी अपरिहार्य हो चली थी क्योंकि वर्ष 2016 के बजट में सरकार द्वारा वित्तपोषित संस्थानों के लिए एक नई वित्तीय व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया है। बजट के मुताबिक उच्च शिक्षा के वित्त पोषण के लिए एक संस्था बनाई जानी है। यह अद्र्घ संप्रभु संस्था बॉन्ड बाजार से धन जुटाएगी और उसे शिक्षण संस्थानों को कर्ज के रूप में देगी। योजना यह थी कि इन शैक्षणिक संस्थानों का परिचालन व्यय जहां इनके आंतरिक संसाधनों से निकल जाएगा वहीं उनका पूंजीगत खर्च प्रस्तावित संस्था से ऋण लेकर निकाला जा सकेगा। 

 
इससे असंबद्घ लेकिन ऐसे ही फैसले में देश के कुछ शीर्ष प्रबंधन संस्थानों ने भी अपने प्रमुख स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में 7 से 30 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी कर दी। बढ़ती महंगाई से तालमेल कायम रखने के लिए ऐसा करना आवश्यक था। कई मामलों में तो मौजूदा शुल्क वृद्घि ने पुराने आईआईएम और नए आईआईएम के बीच अंतर को कम ही किया है। यह भी एक वांछित कदम है क्योंकि इन शीर्ष शिक्षण संस्थानों के शुल्क में इस कदर सब्सिडी की आवश्यकता नहीं है। इतना ही नहीं आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए शुल्क में पर्याप्त रियायत की व्यवस्था की गई है। इस पूरे प्रकरण में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की कोई खास भूमिका नहीं थी। मसौदा आईआईएम विधेयक शुल्क वृद्घि जैसे मसलों पर उसका दायरा बढ़ाता है लेकिन सौभाग्य से अभी वह प्रवर्तित नहीं है। 
 
शुल्क वृद्घि स्वागतयोग्य है लेकिन आईआईटी और आईआईएम को इस बात पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि वे अपने संस्थानों के उत्कृष्टïता स्तर में सुधार लाने के लिए क्या कदम उठा सकते हैं। सलाहकार और पेटेंट आदि क्षेत्रों में इनका प्रदर्शन अपर्याप्त है और अगर वे अपनी वित्तीय स्वायत्तता बढ़ाने को लेकर गंभीर हैं तो उनको इन बातों पर ध्यान देना होगा। इससे भी अहम बात यह है कि शोध की गुणवत्ता और संख्या में सुधार करने के अलावा उन्हें वैश्विक समकक्षों की तुलना में देसी शिक्षण सामग्री और किताबें आदि प्रस्तुत करनी चाहिए। उदाहरण के लिए अधिकांश आईआईएम अभी भी शिक्षण के लिए विदेशी सामग्री का प्रयोग करते हैं क्योंकि वहां शोध पर बहुत अधिक जोर नहीं दिया गया है। इन संस्थानों को अपना कारोबारी मॉडल भी बदलने की आवश्यकता है। मौजूदा स्वरूप में ये संस्थान अपने काम की फंडिंग विविध कार्यक्रमों के जरिये करते हैं, वह अपनी तयशुदा सीमा तक पहुंच रहा है। सरकार की बात करें तो अगर वह इन संस्थानों के सूक्ष्म प्रबंधन की चाह पर काबू कर पाती है तो यह बहुत अच्छी बात होगी। हम मसौदा आईआईएम विधेयक के रूप में सरकार का ऐसा प्रयास देख चुके हैं। इसके बजाय मंत्रालय को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आखिर इन संस्थानों के लिए सही माहौल कैसे विकसित किया जाए? एक स्पष्टï तरीका तो यह है कि इन संस्थानों के निदेशकों और वरिष्ठï प्रोफेसरों के वेतन को बाजार से जोड़ा जाए ताकि केवल देशभक्ति ही इस रोजगार में आने की इकलौती प्रेरणा बनकर न रह जाए।
Keyword: education, IIT, fees,,
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