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चापलूसों के चंगुल में फंसकर हो जाते हैं हकीकत से दूर
इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  April 04, 2016

आपातकाल के ठीक पहले देवकांत बरुआ कांगे्रस के अध्यक्ष थे। उस वक्त इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। बरुआ ने एक खास उद्घरण के जरिये भारतीय राजनीति के इतिहास में अपनी जगह सुरक्षित कर ली। उन्होंने कहा था: इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया यानी भारत ही इंदिरा है और इंदिरा ही भारत है।
शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू भी शायद इतिहास की किताबों में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में उनकी हालिया टिप्पणी सुनकर तो यही लगता है। उन्होंने कहा कि मोदी देश को ईश्वर का उपहार हैं, वह गरीबों के मसीहा हैं और मोदी ही वह व्यक्ति हैं जो देश के लिए जरूरी बदलाव लाएंगे। नायडू की इन अतिउत्साही टिप्पणियों को लेकर तमाम तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं। एक कयास यह भी है कि राज्यसभा में उनका कार्यकाल जल्द समाप्त होने वाला है और उनको पार्टी के सबसे बड़े नेता के प्रति वफादारी तो दिखानी ही होगी।
ऐसा भी नहीं है कि मोदी का चापलूसी से कभी पाला ही नहीं पड़ा। अभी कुछ ही महीने पहले भाजपा सांसद विजय गोयल ने उनकी तुलना महात्मा गांधी से करते हुए कहा था कि दोनों साबरमती के संत हैं। गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने अपने फेसबुक पेज पर हाल ही में लिखा था कि नास्त्रेदमस ने भविष्यवाणी की थी कि वर्ष 2014 में भारत में एक नेता सत्ता में आएगा और वह वर्ष 2026 तक सत्ता में रहेगा। इसके बाद ऐसी खबरें आईं कि मोदी की तीन फुट ऊंची मूर्ति कौशांबी जिले में एक शिव मंदिर में स्थापित की गई है। आश्चर्य नहीं कि यह मूर्ति विश्व हिंदू परिषद के एक नेता ने स्थापित करवाई थी जो मंदिर का पुजारी भी है।
निश्चित तौर पर मोदी अथवा स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी यह दावा नहीं कर सकते कि चापलूस अनुयायियों पर उनका एकाधिकार है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसका लुत्फ ठाकरे ने भी उठाया, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के चापलूस अनुयायियों की कोई कमी नहीं। चापलूसी का सबसे बड़ा उदाहरण तब नजर आया जब जयललिता के जेल में रहने के दौरान शपथग्रहण समारोह में तमाम मंत्री आंसू बहाते नजर आए।
लेकिन चापलूसी पर केवल नेताओं का एकाधिकार थोड़े है। आपका कार्यस्थल भी शायद ही इसका अपवाद हो। एक लोकप्रिय कार्टून में दिखाया गया कि कैसे एक अच्छी वेशभूषा वाले व्यक्ति अपने साथी से कह रहे हैं कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत मुंहदेखी बात करने वाले व्यक्ति के रूप में की थी और अब वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में विकसित हुए हैं जो अंतत: अपने बॉस के पक्ष में रहता है।
चापलूस व्यक्ति दरअसल आपके आसपास सबसे चतुर व्यक्ति भी हो सकता है क्योंकि उनको पता होता है कि संगठन के ढांचे से किस तरह का व्यवहार करना है। वे यह देख सकते हैं कि कौन उभरने वाला है और किसके सितारे गर्दिश में हैं। वे सीधे बॉस की तारीफ नहीं करते हैं क्योंकि इससे वे नजर में आ सकते हैं। इसके बजाय वे यह सुनिश्चित करते हैं बात घूमफिरकर बॉस तक पहुंचे। इसके लिए वे उन लोगों को पहचानते हैं जो बॉस के करीबी हैं। अब वे उनके सामने बॉस की तारीफ करते हैं। मसलन बॉस द्वारा किसी संकट को हल करने की तारीफ या उसकी प्रेरक शक्ति की तारीफ। यह तरीका अक्सर कामयाब हो जाता है। आखिर कौन ऐसा बॉस होगा जो खामोशी से तारीफ करने वाले की अनदेखी करेगा? कुछ अत्यधिक चतुर चापलूस बैठक में बात की शुरुआत विरोधी विचार से करते हैं। वे बॉस की राय के ठीक उलट बात से शुरुआत करते हैं और धीरे-धीरे अपने बॉस की बात से सहमत हो जाते हैं। उनके पास यही इकलौता रास्ता होता है। आखिरकार चापलूसी उनके लिए इकलौता बचाव है क्योंकि उनको अपने काम के बारे में कुछ खास पता नहीं होता। उनके भीतर असुरक्षाबोध होता है क्योंकि उनको पता होता है कि उनके नीचे काम करने वाले लोग उनसे बेहतर, सूचित और सक्षम हैं।
कारोबारी जगत के शीर्षस्थ लोगों का इस संस्कृति का शिकार हो जाना आसान है। अपने अनुकूल बातों को सुनना और विरोधी बातों को नकारना मानवीय प्रवृत्ति है। इसके अलावा वे ऐसे लोगों से घिरे रहते हैं जिनसे अगर चलने को कहा जाए तो वे रेंगना शुरू कर देते हैं। लेकिन जरा इस बात के बारे में सोचिए। ये लोग आपको अच्छा महसूस करा सकते हैं लेकिन हकीकत में बतौर नेता ये आपके लिए अच्छे नहीं हैं। इस बात के अनगिनत उदाहरण हैं जहां बड़े कारोबारी नेता हकीकत से कट गए क्योंकि उनकी धारणा बनाने वालों में ऐसे लोगों की भरमार हो गई। यही वजह थी कि ऐसे नेताओं के इर्दगिर्द रहने वाले हां जी, हां जी करने वाले संगठन से भी अधिक ताकतवर हो गए। उन्होंने अधिक योग्य उम्मीदवारों की जगह छीने रखी।
इससे निजात पाना आसान है: कारोबारी नेताओं को अपनी इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा जिसके तहत वे विरोधी विचार वाले लोगों की बात नहीं सुनना चाहते या उनको दंडित करना चाहते हैं। विडंबना यह है कि हममें से अधिकांश लोग उन नेताओं से नफरत करते हैं जो चापलूसी के शिकार हो जाते हैं लेकिन हम खुद यह जान नहीं पाते कि कब हम खुद ऐसे लोगों के चंगुल में फंस गए। बात एकदम स्पष्टï है। चयन मोदी को करना है।

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